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लॉकडाउन के दौरान अच्छी आदतों को पास बुला लें!

Tue, 21 Apr 2020 02:33 AM IST
Raza Murad रजा मुराद
Updated Tue, 21 Apr 2020 02:33 AM IST
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Covid19,coronavirus outbreak,Call good habits close
मुंबई के दादर इलाके में लॉकडाउन के दौरान घर की सीढ़ियों पर बैठकर मोबाइल फोन पर गेम खेलते बच्चे। - फोटो : PTI

एक आशियाना बनाने में इंसान जीवन बिता देता है। एक घर बनाने में वह अपनी पूरी कमाई की आहुति दे देता है, लेकिन अब उसी घर में उसे घुटन महसूस हो रही है। बहुत से लोगों को अब उनके सपनों का आशियाना काटने को दौड़ रहा है। मुझे लगता है कि ऐसे लोगों ने अपने चारों ओर काल्पनिक भय का एक जंगल उगा लिया है।


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मैं कहता हूं कि आप इसे कैद मत समझिए। इसे अपना बचाव समझिए। एक तरह से आपको लंबी छुट्टी दे दी गई है। सब्जी, फल और दूध की दुकानें तो खुल ही रही हैं। मेडिकल स्टोर भी खुले हुए हैं। मनाही बस इस बात की है कि गैर-जरूरी तौर पर आप घर से बाहर न निकलें।

घर में रहकर भी तो आप पूरी दुनिया के संपर्क में हैं। मुझे नहीं लगता कि किसी चीज की रुकावट है। इबादत और पूजा भी घर से हो सकती है। अगर दिल से दुआ मांगी जाए, तो वह जरूर कुबूल होती है। कोरोना सिर्फ वायरस नहीं, बल्कि एक गंभीर संकट का दुष्चक्र है।

एक से दस, दस से सौ और सौ से हजार...ऐसे ही इसका फैलाव हो रहा है। वुहान में किसी एक आदमी को संक्रमण हुआ होगा और आज देखते ही देखते पूरी दुनिया इसके चपेट में आ गई है। कोरोना आपके या हमारे घर खुद चलकर नहीं आएगा। अपनी छोटी-छोटी लापरवाहियों से हम सब इसे दावत दे रहे हैं।

अगर यह घर की दहलीज तक आया, तो खाली हाथ नहीं जाएगा। इसलिए लॉकडाउन को मैं किसी पाबंदी की तरह नहीं ले रहा हूं। मेरा मानना है कि मेरे और मेरे परिवार की सुरक्षा लॉकडाउन और सोशल डिस्टेंसिंग की वजह से ही मुमकिन है, क्योंकि न तो कोरोना की कोई वैक्सीन उपलब्ध है और न ही कोई पुख्ता इलाज।

हमारा तो सारा जीवन स्टूडियो में गुजर गया। बच्चे कब जवान हुए, पता ही नहीं चला। सुबह जब शूटिंग के लिए जाते थे, तो बच्चे सो रहे होते थे और रात में जब हम लौटते थे, तो भी बच्चे सो रहे होते थे। आज मेरे पास वक्त है। किताबें हैं। किस्से हैं। अनगिनत फलसफे हैं। फुर्सत के इन लम्हों में अपनी जिंदगी का हिसाब लगा रहा हूं।

कहां कामयाब रहा, कहां कमी रह गई, उसका इल्म भी तो जरूरी है ! कोरोना ने हम सबको कुछ बढ़िया आदतें सिखा दी हैं। अपनी बात करूं, तो मैं बर्तन धोना सीख गया हूं। कहीं बाहर नहीं निकलना है, तो बिना इस्त्री किए कपड़े भी पहनने लगा हूं। पहले ये सब मेरे लिए मुश्किल था। लेकिन इसी बीच पुलिस और डॉक्टरों पर हमले की खबरों से मन को बहुत चोट पहुंचती है। लोग पुलिस को विलेन न समझें। इस तरह के माहौल में कोरोना के खतरों से जूझते हुए वे अपनी ड्यूटी कर रहे हैं। दिहाड़ी मजदूरों के लिए भी मेरा दिल बहुत दुख रहा है। उनका पेट भरना हम सबकी जिम्मेदारी है।

अगर मेरे पास छह रोटियां हैं और मेरी खुराक चार रोटियों की है, तो मेरा फर्ज बनता है कि मैं कम से कम दो रोटियां जरूरतमंदों में बांट दूं। सरकार अपना काम बखूबी कर रही है, लेकिन जनता को भी अपनी जिम्मेदारी उठानी होगी। अच्छे और बुरे वक्त तो मेहमानों की तरह होते हैं। ये आते हैं और चले जाते हैं।

कुदरत का कानून है कि हर काली रात के बाद ही सवेरा होता है। अगर ये काली रातें न होंगी, तो फिर सुबहों का इंतजार कौन करेगा। कुरान शरीफ में कहा गया है कि अल्लाह सब्र करने वालों के साथ होता है। हम सब एक दूसरे की ताकत बनकर सब्र का यह इम्तिहान दें। यकीनन इसका नतीजा बहुत अच्छा होगा। (लेखक सुप्रसिद्ध अभिनेता हैं।)

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