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देशहित सामने हो, तो मिलकर मुकाबला करें

Shyouraj Singh Bechain श्यौराज सिंह बेचैन
Updated Sun, 12 Apr 2020 01:01 AM IST
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Coronavirus Case News In Hindi: If country interest is in front, then compete together, lockdown india, stay home
कोरोना वायरस - फोटो : PTI

जब भारत में कोरोना ने दस्तक दी ही थी, तब मैंने अमेरिका में चिकित्सा सेवा से जुड़े और हिंदी कवि रामबाबू गौतम से पूछा था कि अमेरिका में कोरोना से लड़ने की क्या तैयारियां चल रही हैं? इस प्रश्न के जवाब में वह अतिरिक्त उत्साह से कह रहे थे, 'यह अमेरिका है। यहां का मेडिकल सिस्टम बहुत चुस्त-दुरुस्त है।


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यहां कोरोना कुछ नहीं बिगाड़ पाएगा। यहां इंडिया की तरह लॉकडाउन भी नहीं किया जाएगा।' उनके कहने का भाव यह था कि जो शक्ति अमेरिका के पास है, वह भारत के पास नहीं है। पर अब जब अमेरिका ने भारत से मलेरिया की दवा मांगी है, तब वीडियो कॉल में रामबाबू गौतम बेहद भयाक्रांत दिखे।

मैंने जब उनसे पूछा कि भय और संकट की इस स्थिति में क्या वह कुछ लिख पा रहे हैं? उनका कहना था, 'हां, लिख रहा हूं, क्योंकि मैं और कुछ तो कर ही नहीं सकता। पत्नी-बच्चे तक मुझसे दूरी कर सैकेंड फ्लोर पर हैं।'

कोरोना वायरस के कारण अमेरिका में स्थिति बद से बदतर हो रही है। चीन में हकीकत दिखाई कम, छिपाई अधिक जा रही है। चूंकि मृतकों की संख्या इटली में सर्वाधिक है, इसलिए मैंने इतालवी विदुषी और बनारस से हिंदी पढ़कर गईं तथा हिंदी की दलित कहानियों पर काम कर रहीं वैलेंटीना को वहां की स्थिति जानने के लिए मोबाइल पर मैसेज भेजा।

मैं उनकी आवाज सुनना चाहता था। देर रात इटली से वैलेंटीना का हिंदी में वीडियो आया, 'मैं घर में बंद हूं। अभी तो ठीक हूं, पर मेरा देश बहुत संकट में है। बहुत लोग मर चुके हैं। मैं न्यूज देखती हूं। इंडिया अच्छा कर रहा है।'

यह आश्वस्त करने वाली बात है कि भारत में शुरुआती चौकसी के कारण स्थिति उतनी खराब नहीं है। जब देशहित सामने हो, तो हर लड़ाई मिलकर लड़ी जाती है। लेकिन कोविड-19 से लड़ने के लिए न एक साथ जुझना है और न घर के बाहर निकलना है। भारत की इस सूझ-बूझ ने मानो 80 फीसदी विजय दिला दी है।

निजामुद्दीन की तब्लीगी जमात से संक्रमण में 30 फीसदी वृद्धि न हुई होती, तो भारत सूझ-बूझ के मामले में अभूतपूर्व मिसाल कायम करता। जब क्षति से पूर्णतया बच पाना असंभव हो, तब कम से कम क्षति का विकल्प चुन लेना समझदारी है। लॉकडाउन ने निस्संदेह भारी क्षति से देश को बचाया है। पर रोज कुआं खोद पानी पीने वाले मजदूरों को संकट का सामना करना पड़ा है।

पुलिस ने अच्छा काम भी किया। लेकिन रिक्शावालों, रेहड़ी वालों, ठेले वालों के सामान सड़क पर गिराते-बिखेरते दृश्य वायरल हुए, तो कलेजा मुंह को आने लगा। आसन्न संकट देखते हुए मजदूर गांव पहुंचे, तो वे खुद संकट दिखाई पड़ने लगे। संक्रमित होने की आशंका में उन्हें अलग रखना लाजिमी हो गया।

भारत अपनी इस सफलता पर गर्व भी कर सकता है और संतोष भी कि इटली, ब्रिटेन और अमेरिका जैसे देश, जिन्हें अपनी स्वास्थ्य प्रणाली पर अतिरिक्त भरोसा था, उन्हें कोरोना वायरस से काफी धक्का लगा है। पर यह संकट भारत को आगाह भी करता है कि हमें न केवल चिकित्सा शिक्षा पर, अपितु तकनीकी शिक्षा पर भी ध्यान देना होगा।

चीन से यह वायरस आया जरूर, पर इससे बचाव के सुरक्षा उपकरण भी वही दे रहा है, क्योंकि उसने विज्ञान और तकनीकी को अपनी शिक्षा में जगह बना रखी है। भारत की बड़ी आबादी को अंधविश्वास की गिरफ्त से निकालना होगा। भारत के पास जन शक्ति है, लेकिन जीवनीपयोगी शिक्षा कम है, जो जीवन रक्षा में हमारी मदद करती है।

हमारे देश के कारीगरों को वह सम्मान नहीं मिला, जो मिलना चाहिए था। वह सस्ता, टिकाऊ जूता बनाकर देता था। चमड़ा उद्योग में बड़े पैमाने पर काम होता था। चमड़े की मशक में पानी पिया जा सकता था। लेकिन कारीगरी के पेशों पर जातिभेद की मार पड़ी और आज जूते से लेकर कोट, दस्ताने और कोरोना से बचाव के सारे उपकरण चीन बेच रहा है।

उन भुक्तभोगी मजदूरों के दर्दनाक दृश्य अविस्मरणीय हैं, जो रोटी-रोजी के लिए मुंबई, दिल्ली, पंजाब गए थे। रेलवे टैक पर जान जोखिम पर डाले, दूध पीते बच्चे गोद में लटकाए, तीन-चार दिनों के भूखे-प्यासे गांव जा रहे हैं। हालांकि गांव छोड़कर शहरों में मजदूरी करने भूमिहीन कृषि मजदूर ही जाते हैं।

गांवों में काम होता, रोटी होती, बच्चों की पढ़ाई-दवा होती, तो ये गांव छोड़कर शहरों में आते ही क्यों, झुग्गियों और फुटपाथों की भीड़ क्यों बढ़ाते? क्या ये कभी लौटकर शहर जा पाएंगे या राज्य द्वारा गांवों में ही रोजगार के प्रबंध कर दिए जाएंगे?

मनरेगा तो पहले ही मौत के कगार पर है। कम से कम जिला स्तर पर बेरोजगारों की गणना और उनकी योग्यता-क्षमता के अनुसार उन्हें काम दिए जाएं, तो उन्हें राहत मिलेगी। उनके लिए सरकारें मदद करें, तभी बात बनेगी।

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