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दिल के तार खामोशी के सुर
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सामाजिक दूरी का पालन करते लोग
- फोटो : सोशल मीडिया
सोशल डिस्टेंसिंग मानव समाज के लिए एक अनोखा विशेषण है और लॉकडाउन इसका सबसे दिलचस्प अनुप्रयोग। मुंबई जैसे शहरों के लिए तो कभी ऐसे दृश्य की कल्पना भी नहीं की गई थी। जब से यह शहर बसा, कभी नहीं थमा। लेकिन प्रकृति के आगे सब बेबस है। ईश्वर अपनी लीला दिखा रहा है और हमें यह अहसास भी करा रहा है कि अकेला कारसाज वही है। चारों तरफ छाई इस स्याह खामोशी के बहुत से उजले पक्ष भी हैं। आसमान बेहद साफ और नीला नजर आ रहा है।
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यह मेरे लिए अनोखा अनुभव है। मुंबई में वर्षों के प्रवास के दौरान मैंने केवल भूरा आसमान ही देखा था। रोज सुबह पांच बजे से अमराइयों में कोयल की कूक सुनाई देने लगती है। एक सुर-साधक के लिए इससे बड़ा कोई प्रसाद नहीं हो सकता। आजकल मेरा दिन यहीं से शुरू होता है। शुरू के एक-दो दिन खौफ में बीते, लेकिन अब लॉकडाउन बड़ा सहज लगने लगा है।
सच कहूं तो मैंने इसे अपनी जिंदगी का हिस्सा बना लिया है। समय की कमी के चलते जिन चीजों से दूरी बनी हुई थी, अब उनसे दोस्ती कर ली है। उनके साये में बैठना अच्छा लगने लगा है। योग, मेडिटेशन, रियाज और कंपोजिंग के इर्द-गिर्द समय घूम रहा है और उसके साथ घूम रही हूं मैं भी, मंत्रमुग्ध-सी और चकित। विश्वास नहीं होता, क्या ये दुनिया इतनी खूबसूरत थी।
कुदरत ने इंसानों को पहली बार उनकी हद बताई है। मैं तो कहूंगी कि यह एक गंभीर चेतावनी है। पहले भी दुनिया पर महामारियों का प्रकोप हुआ है, लेकिन ऐसा तो कभी नहीं हुआ था कि शहर दर शहर इस तरह खौफ फैला हो और लोग अपने घरों में सिमटकर रह गए हों। हम लोगों ने अपनी सीमा से बहुत आगे जाकर प्रकृति के कामों में दखलंदाजी की है।
प्रकृति हम इंसानों के पापों का बोझ उठाते-उठाते थक गई है। इससे पहले भी कुदरत ने कई तरीकों से हमें चेताने की कोशिश की थी, लेकिन हम सबने उसके हर इशारे को नजर अंदाज किया। इन दिनों मैं केवल और केवल खुद के साथ हूं। न स्टूडियो, न रिकॉर्डिंग और न ही कोई शो। दोपहर में रोज एक घंटा फेसबुक पर लाइव जाती हूं। अपने प्रशंसकों से बातें करती हूं।
बच्चों के साथ हंसती-खेलती हूं। बड़े शहरों में फेमिली लाइफ जैसी कोई चीज तो रह नहीं गई है। लोग सुबह निकल जाते हैं और शाम को देर से वापस आते हैं। अब ऐसी कमियों की जमकर भरपाई हो रही है। सुबह पांच बजे उठती हूं। योग और मेडिटेशन के बाद रियाज करना शुरू करती हूं। अपनी छत पर एक कप कॉफी लेकर बैठ जाती हूं और आसपास गूंजती खामोशी के साथ सुर मिलाती हूं।
चिड़ियों की चहचहाट में, गूंजते संगीत में डूबती-उतराती हूं। मुझे कुकिंग का बहुत शौक है, तो आजकल इसमें भी हाथ आजमा रही हूं। किताबें पढ़ रही हूं। क्लासिकल फिल्में देख रही हूं। कुदरत ने मौका दिया है खुद के साथ रहने का। आप भी अपने साथ रहिए। खुद को तलाशिए। ख्वाहिशों को तराशिए। जल्द ही हम इस मुसीबत से बाहर निकल आएंगे।
लेकिन उसके बाद हमें मिलकर अपनी धरती मां का ख्याल रखना होगा, जो हमें हवा, पानी और आनाज दे रही है। और वह भी बिना किसी अपेक्षा और प्रतिदान के। हम सब मिलकर वादा करें कि अपने परिवेश के साथ कुछ भी बुरा नहीं करेंगे। आत्मिक भावों से इस धरती को बचाने का अवदान हमें अवश्य करना होगा, अन्यथा आगे भी हम इस तरह की मुश्किलों से रूबरू होते रहेंगे। (लेखिका सुप्रसिद्ध गायिका हैं।)