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भाजपा के लिए जरूरी है 'कांग्रेस युक्त' भारत

Tue, 15 Jun 2021 04:27 AM IST
आलोक मेहता आलोक मेहता
आलोक मेहता Published by: आलोक मेहता Updated Tue, 15 Jun 2021 04:27 AM IST
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'Congress-yukt' Bharat is essential for BJP
सोनिया-राहुल गांधी (फाइल फोटो) - फोटो : PTI

चौंकिए नहीं। गंभीरता से विचार कीजिए। भारतीय जनता पार्टी ही नहीं, देश के लोकतंत्र के लिए किसी न किसी रूप और नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी का अस्तित्व जरूरी है। आजादी से पहले और बाद में भी कितनी बार, कितने उप नामों, नए-पुराने नेतृत्व से कांग्रेस बंटती-टूटती-बनती रही है। इस समय भले ही राहुल गांधी के कारण कांग्रेस बुरी तरह दिशाहीन हो गई है और विचारधारा व सिद्धांत केवल पार्टी संविधान एवं घोषणा पत्र तक सीमित रह गए हैं। लेकिन यह तो भाजपाई ही नहीं, देश-विदेश के प्रेक्षक भी स्वीकारेंगे कि कांग्रेस की अखिल भारतीय पहचान है और उसके समर्थक देश के हर हिस्से में रहे थे। पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु जैसे राज्यों के चुनाव ये साबित करते हैं कि भाजपा या कांग्रेस के लिए क्षेत्रीय दलों से मुकाबला करना बहुत कठिन है। जिन राज्यों में इन दो राष्ट्रीय दलों का वर्चस्व रहा और टक्कर रही, वहां बदल-बदल कर ही सही, लेकिन इन्हें सत्ता मिली और उसका लाभ लोकसभा में बहुमत लाने के लिए भी मिला। 


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भाजपा ने अपने बल पर सत्ता में आने के लिए आठ साल पहले 'कांग्रेस मुक्त भारत' का नारा अवश्य दिया था, लेकिन अनुभव और समय के साथ नारे और दिशा बदलनी भी पड़ती है। इस समय कांग्रेस के कमजोर होने के कारण शरद पवार, ममता बनर्जी, तेजस्वी यादव तथा कुछ अन्य क्षेत्रीय दलों के नेता भाजपा के विरुद्ध मोर्चा बनाकर आगामी लोकसभा चुनाव में सत्ता में आने की भूमिका बनाने में लगे हुए हैं। कांग्रेस अब तक नया अध्यक्ष ही नहीं तय कर पा रही है। सोनिया गांधी एक तरह से कार्यवाहक अध्यक्ष की तरह काम कर रही हैं। राहुल गांधी केवल सांसद रहते हुए भी पार्टी की बागडोर संभालकर चुनावी मैदान और डिजिटल मीडिया पर गरजते-बरसते रहते हैं। पूरी ताकत लगाने पर भी हाल के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की केरल और असम में पराजय तथा बंगाल तथा तमिलनाडु में हालत और बदतर हुई है। 

अनिश्चितता, अविश्वास और विचारधारा के नाम पर कभी जनेऊ कांड, कभी मुस्लिम और कभी सेक्यूलर कार्ड के चक्कर में मतदाता ही नहीं, पार्टी के कार्यकर्ता भी भ्रमित और निराश हो रहे हैं। उन्हें यह समझ में नहीं आता कि वे ममता, ठाकरे, पवार, अखिलेश, लालू या येचुरी की पार्टियों का कब विरोध करें और कब उनका झंडा-निशान लेकर जयगान करें। मोर्चा और गठबंधन होने पर यह संकट क्षेत्रीय दलों के कार्यकर्ताओं और समर्थकों-मतदाताओं के सामने अक्सर आता है। ज्योतिरादित्य सिंधिया, जितिन प्रसाद ने कांग्रेस इसी कारण छोड़ी, क्योंकि न केवल पार्टी दिशाहीन हो गई, बल्कि केंद्रीय नेतृत्व ने भी उन्हें केवल उलझाए रखा। सचिन पायलट, मिलिंद देवड़ा, आरपीएन सिंह ही नहीं, मनीष तिवारी जैसे युवा नेताओं को भी महत्वपूर्ण भूमिका नहीं दी जाती। कमलनाथ, अशोक गहलोत, भूपेश बघेल और कैप्टन अमरिंदर सिंह अपने बल पर प्रदेशों में जमे हुए हैं। 

केंद्रीय नेतृत्व से उन्हें वोट नहीं मिल सकते हैं। हां, पुरानी पार्टी और मुख्य प्रतिद्वंद्वी भाजपा या अकाली होने से मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और पंजाब में विधानसभा चुनावों में सफलता मिल जाती है। अखिलेश यादव और तेजस्वी यादव यह भी स्वीकारते हैं कि पिछले चुनाव में कांग्रेस के साथ समझौते करने से उन्हें भारी नुकसान हुआ। बहरहाल, कोर्ट मार्शल या पोस्टमार्टम करना बहुत तकलीफदेह लगता है। हमारे कई पत्रकार, चिंतक, कार्यकर्ता और राजनेता गठबंधन की राजनीति को सही और अपरिहार्य भी मानते हैं। हमारे संविधान निर्माताओं ने भी शायद व्यापक उदारता के कारण चुनाव के लिए दल की सीमा और लक्ष्मण रेखा तय नहीं की। लेकिन 1967 से लेकर अब तक क्या गठबंधन की सरकारें अधिक सफल हुईं? सबसे बड़ा गठबंधन तो आपातकाल के बाद जयप्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई, चौधरी चरण सिंह, जगजीवन राम, अटल बिहारी वाजपेयी, जॉर्ज फर्नांडीज और मधु लिमये जैसे नेताओं की छत्रछाया में जनता पार्टी के नाम पर बना था, लेकिन वह दो साल भी नहीं टिका। 

राज्यों में तो कई बार गठबंधन बने और बुरी तरह टूटे। अटल बिहारी वाजपेयी या मनमोहन सिंह के राज में घटक दलों के दबाव और भ्रष्टाचार के कारण न केवल भाजपा या कांग्रेस को, बल्कि देश को भी बहुत नुकसान हुआ। लोकतांत्रिक अधिकारों की दुहाई देने वाले क्या यह नहीं मानेंगे कि अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, जापान और फ्रांस सहित दुनिया के किसी भी लोकतांत्रिक देश में तीन-चार से अधिक मुख्य दल नहीं हैं? व्यवहार में दो या तीन दल हैं। हां, केवल जर्मनी में एक सौ साल पहले बीस-तीस दलों का दौर आया था, तो लोगों ने हिटलर को ही नेता स्वीकारा और उसकी परिणति आज तक सब जानते-समझते हैं।

सवाल केवल बहुदलीय व्यवस्था का नहीं है। विचारधारा और प्राथमिकता की दृष्टि से भाजपा एक हद तक उदार हिंदुत्व के साथ उदार अर्थव्यवस्था को खुलकर घोषित करती है। कांग्रेस अपनी धर्मनिरपेक्षता, सीमित उदार अर्थव्यवस्था और गतिशीलता के लंबे-चौड़े पार्टी संविधान के हिसाब से संगठन को चला सकती है। इसी तरह समाजवादी विचारों वाली और अति प्रगतिशील मार्क्सवादी कम्युनिस्ट विचारों वाली पार्टी हो सकती है। समय रहते आत्म मंथन कर क्षेत्रीय पार्टियां भी विचारों और क्षेत्रीय हितों की गारंटी मांगकर ऐसे चार दलों में से किसी को चुन सकती हैं। इससे कम से कम हमेशा टकराव, अनिश्चितता और असंतोष नहीं बढ़ेगा और सही मायने में देश एक साथ प्रगति भी कर सकेगा। 

सौदेबाजी, तात्कालिक हितों पर दलबदल, समय-असमय चुनाव से गरीब जनता को कोई लाभ नहीं होता। इस संदर्भ में जो नेता या पार्टियां इस समय वर्तमान भाजपा सरकार के बेहद अलोकप्रिय होने का दावा कर रही हैं, क्या वे आने वाले महीनों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा सुझाए गए 'एक देश-एक चुनाव' के सिद्धांत को संसद से स्वीकृति दिलाने के लिए तैयार होंगी?
 

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