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अंदरूनी संघर्ष से जूझती कांग्रेस
रशीद किदवई
Updated Tue, 20 Oct 2015 07:36 PM IST
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जयराम रमेश ने हाल ही में राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस के भीतर जो पीढ़ीगत बदलाव की बात छेड़ी है, उसका उद्देश्य थोड़ी सनसनी फैलाना है। मगर, सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इसके पीछे राहुल टीम के खासमखास बनने की खुद जयराम की जो छिपी इच्छा है, वह किसी से भी छिपी नहीं रह गई है।
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वर्तमान में कांग्रेस पार्टी के भीतर सत्ता के जो समीकरण हैं, और जो बेचैनी पसरी है, उसमें खुद राहुल इस स्थिति में नहीं हैं, कि वह किसी तरह के पीढ़ीगत बदलाव को सुनिश्चित कर सकें। गौरतलब है कि उन्हें कांग्रेस का अध्यक्ष बनाने के फैसले को लेकर पार्टी के भीतर तकरीबन विद्रोह जैसी स्थिति बन गई थी। तब, हालांकि सोनिया गांधी की इच्छा नहीं थी, लेकिन पार्टी के वरिष्ठ लोगों ने उन पर अपना कार्यकाल एक साल और बढ़ाने का दबाव बनाया था। फिलहाल जो स्थिति है, उसमें ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी (एआईसीसी) के महासचिवों और दूसरे पदाधिकारियों को चुनने के लिए राहुल स्वतंत्र हैं, मगर ऐसे फैसलों पर अंतिम मुहर सोनिया की ही होगी। नए पदाधिकारियों की नियुक्ति कैसे होगी, अभी इसको लेकर अनुमान ही लग रहे हैं। अनिश्चय मंडराते ऐसे हालात में प्रेस वक्तव्यों के पीछे पुरानी कांग्रेसी शैली की लॉबिंग, आंतरिक दबाव और ऊपर से आने वाले आदेश ही काम कर रहे हैं।
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अब जरा जयराम रमेश को समझ लें। जयराम ऐसे कांग्रेस नेता हैं, जो सर्वाधिक उपयुक्त समय पर अपना पक्ष बदलने के लिए मशहूर हैं। जरूरत पड़ने पर वह प्रणब मुखर्जी के साथ थे और फिर धीरे से पी चिदंबरम की ओर सरक गए। गौरतलब है कि एक समय एआईसीसी के अध्यक्ष पी वी नरसिंह राव ने 24, अकबर रोड में उनके घुसने पर भी रोक लगा दी थी। मगर इसके बावजूद यह चतुर राजनेता उनकी तारीफ करते दिखा। फिलहाल जयराम की कोशिश राहुल गांधी के अहमद पटेल बनने की है। गौरतलब है कि कांग्रेस के भीतर पटेल की सोनिया गांधी से नजदीकी और उनके राजनीतिक सचिव के तौर पर उनकी ताकतवर स्थिति काफी चर्चित रही है।
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60 वर्ष के हो चले जयराम की उम्र अहमद पटेल, कपिल सिब्बल, दिग्विजय सिंह, कमल नाथ, पी चिदंबरम, जर्नादन द्विवेदी, अमरिंदर सिंह, अंबिका सोनी, ऑस्कर फर्नांडीज और पार्टी के दूसरे प्रभावशाली नेताओं से कुछ कम है, जो सभी कांग्रेस के संगठन में मजबूत पद पाने का ख्वाब पाले हुए हैं। जयराम के गणित के मुताबिक अगर राहुल अपनी टीम के लिए 60 वर्ष से ज्यादा या फिर 70 वर्ष की आयुसीमा निर्धारित करते हैं, तो सत्तर की ओर बढ़ रहे या उससे अधिक के हो चुके पटेल, सिब्बल, दिग्विजय, कमलनाथ, सोनी और दूसरे तमाम नेता तो खुद ब खुद दौड़ से बाहर हो जाएंगे। दूसरी ओर, आनंद शर्मा, पृथ्वीराज चव्हाण, ज्योतिरादित्य सिंधिया, जितिन प्रसाद, अशोक तंवर, मानिक टैगोर, गौरव गोगोई और इस कड़ी के दूसरे नेताओं के बीच जयराम खुद को एक बुद्धिजीवी ताकतवर नेता की तरह पेश कर रहे हैं।
फिलहाल कांग्रेस की जो हालत है, उससे कांग्रेस के वरिष्ठ नेता भी बेचैन हैं। दिग्विजय ने सब कुछ भविष्य पर छोड़ रखा है, वहीं कमलनाथ खुद को मध्य प्रदेश कांग्रेस यूनिट के प्रमुख के तौर पर अपनी दावेदारी पेश कर रहे हैं। अमरिंदर अपना ध्यान पंजाब के चुनाव पर रखना चाहते हैं। दूसरी ओर, पटेल, द्विवेदी और सोनी अपनी संभावनाओं को बरकरार रखने के लिए सोनिया की वीटो पावर बनी रहने की उम्मीद कर रहे हैं।
हालांकि अगर राहुल थोड़ी भी समझदारी से काम लें, तो उन्हें समझ आएगा कि पीढ़ीगत बदलाव की बात ही बकवास और भ्रामक है। अपनी समझ के विस्तार के लिए इतिहास की गहराई में जाने का समय अगर उनके पास न हो, तो कम से कम वह थोड़ा ठहरकर पार्टी के भीतर तो झांक कर देख ही सकते हैं। 2012 में बेहद बुरे दौर में भी वरिष्ठ नेता वीरभद्र सिंह ने हिमाचल प्रदेश में पार्टी को जीत दिलाई थी। जब नरेंद्र मोदी एक तूफान के तौर पर विकसित हो रहे थे, तब 1934 में जन्में वीरभद्र सिंह एक चट्टान की मानिंद उनका रास्ता रोकने के लिए खड़े हो गए थे।
पार्टी में सिद्धारमैया, ओमान चांडी और तरुण गोगोई जैसे नेता भी हैं, जो जयराम की कट ऑफ लाइन से ऊपर हैं, और पार्टी के स्तंभ बने हुए हैं। दूसरी ओर, 41 वर्ष के अरुण यादव हैं, जो मध्य प्रदेश में स्थानीय निकाय चुनावों के दौरान कोई खास प्रभाव छोड़ते नहीं दिखे, खासकर तब भी, जब व्यापम घोटाले को लेकर पूरे देश में शिवराज सिंह सरकार की आलोचना हो रही है। हरियाणा में राज्य प्रमुख के तौर पर राहुल द्वारा चुने गए अशोक तंवर भी जूझते ही दिख रहे हैं। कांग्रेस नेतृत्व भी गवाह है कि रामलीला मैदान में कैसे खुद पार्टी के ही लोग तंवर के खिलाफ खड़े दिख रहे थे।
संजय निरुपम साफ तौर पर कह चुके हैं कि राहुल ने जिन लोगों को चुना है, उनको पार्टी के जमीनी कार्यकर्ताओं की ओर से विरोध का सामना करना पड़ रहा है। राहुल को इसे चेतावनी की तरह लेना चाहिए। अगर इन हालात पर काबू पाते हुए पार्टी के वरिष्ठ और युवा नेताओं ने साथ मिलकर उन्होंने काम करना शुरू नहीं किया, तो वह दिन दूर नहीं, जब राहुल के नेतृत्व को पार्टी के भीतर से ही चुनौती का सामना करना पड़ेगा। 1999-2000 में पार्टी के संगठनात्मक चुनावों को नहीं भूलना चाहिए, जिनमें सोनिया ने जितेंद्र प्रसाद, राजेश पायलट और कपिल सिब्बल को हराया था, जो नेहरू-गांधी परिवार के सदस्य को सीधी टक्कर देना चाह रहे थे। राजेश पायलट और जितेंद्र प्रसाद अब नहीं हैं, मगर पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र के ध्वजवाहक सिब्बल जरूर मौजूद हैं। सवाल यह है कि अगर पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने उन्हें आगे लाने का फैसला किया, तब क्या होगा?