जम्मू-कश्मीर की गुत्थी
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उमर अब्दुल्ला ने जम्मू-कश्मीर के चुनावी नतीजों को पेचीदा बताया है। नतीजा पेचीदा है या नहीं, यह अलग बात है, पर जनादेश ने राज्य में सरकार गठन की मुश्किलें तो बढ़ा ही दी हैं। हालांकि चुनाव में हुए रिकॉर्ड मतदान से हमेशा संकटों से घिरे रहने वाले इस राज्य के लोगों के स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों में बढ़ते भरोसे की पुष्टि होती है। सबसे बड़ा दल बनकर उभरने वाली पीडीपी का प्रदर्शन भी उसकी उम्मीद के मुताबिक नहीं रहा। वह 35 का आंकड़ा छूने की उम्मीद कर रही थी, पर उसे 28 सीटों से ही संतोष करना पड़ा। भाजपा को जम्मू में 25 सीटों पर जीत जरूर मिली, मगर घाटी में वह खाता भी नहीं खोल पाई और वहां उसे मात्र दो फीसदी वोट मिले। जबकि विनाशकारी बाढ़ के बाद अपने अव्यवस्थित प्रबंधन के चलते आलोचनाओं से घिरी नेशनल कांफ्रेंस ने उम्मीद से बेहतर प्रदर्शन करते हुए 15 सीटें जीत लीं। इससे पता चलता है कि शेख अब्दुल्ला की पार्टी के समर्थक अब भी पूरी घाटी में फैले हुए हैं। हालांकि महज 12 सीटें जीतने के बावजूद कांग्रेस ने यह तो दिखाया कि राज्य के तीनों क्षेत्रों- जम्मू, घाटी और लद्दाख में उसके लिए समर्थन मौजूद है। इसके अलावा सात निर्दलीय प्रत्याशी भी जीते हैं, जिनमें हुर्रियत से जुड़े सज्जाद लोन की पार्टी भी है, जिसे दो सीटें जीतने में कामयाबी मिली।
भाजपा प्रमुख अमित शाह घोषणा कर चुके हैं कि पार्टी के लिए सारे विकल्प खुले हुए हैं। यानी भाजपा पीडीपी को भी समर्थन दे सकती है, या भाजपा को समर्थन देने के लिए स्वतंत्र और 'अन्य' प्रत्याशियों को राजी करने की कोशिश भी कर सकती है। गौर करने वाली बात है कि कांग्रेस तो भाजपा के साथ जाने वाली है नहीं, ऐसे में 'अन्य' का सीधा मतलब नेशनल कांफ्रेंस से ही है। हालांकि उमर अब्दुल्ला ने भाजपा के साथ किसी भी गठजोड़ की संभावना 99 फीसदी खारिज की है, पर इसकी एक फीसदी संभावना को उन्होंने भी छोड़ रखा है। मगर सवाल यह है कि जनता के नकार का सामना कर रही नेशनल कांफ्रेंस से क्या भाजपा जुड़ना चाहेगी?
चुनावी अभियानों के दौरान दोनों ही पार्टियां एक-दूसरे पर कीचड़ उछालती आई हैं। हालांकि यह तर्क दिया जा सकता है कि एक-दूसरे पर लांछन तो सभी पार्टियां लगाती रहती हैं। गौरतलब है कि सरकार में सहयोगी होने के बावजूद कई मौकों पर कांग्रेस ने नेशनल कांफ्रेंस की आलोचना की। मगर अब चुनावी नतीजे सामने आने के बाद राजनीतिक दलों को सरकार गठन के ज्यादा गंभीर सवाल से निपटना होगा। एक वर्ष पहले जब दिल्ली विधानसभा की त्रिशंकु स्थिति थी, तब वहां राष्ट्रपति शासन लगाना पड़ा था। मगर जम्मू-कश्मीर में ऐसी कोई स्थिति काफी शर्मनाक होगी, वहां के इतिहास और वर्तमान हालात को देखते हुए, खासकर तब, जब इतनी बड़ी तादाद में लोग अपनी सरकार चुनने के लिए अपने घर से निकले हों।
सरकार बनाने के उपलब्ध समीकरणों को देखें, तो साफ है कि पीडीपी और भाजपा के अलावा बनने वाले किसी भी गठजोड़ के अस्थिर साबित होने की आशंका है। पीडीपी-भाजपा गठजोड़ हिंदू बहुल जम्मू और मुस्लिम बहुल घाटी के बीच उभरे उस अंतराल को भरने में भी मददगार साबित होगा, जो आज पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गया है। गौरतलब है कि 1983 के चुनाव में भी ध्रुवीकरण जैसी स्थिति बन गई थी, पर इस बार जैसी नहीं। लिहाजा ऐसी कोई भी सरकार, जो दोनों क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व न करती हो, ऐसी ताकतों को बढ़ावा देगी, जो राज्य को तोड़ने और घाटी में विरोध-प्रदर्शनों को जारी रखने की मंशा रखती हैं।
वैसे पीडीपी-कांग्रेस सरकार बनना भी मुमकिन है, मगर कुछ निर्दलीयों के समर्थन के बावजूद यह एक कमजोर सरकार साबित होगी। यह मजबूत हो सकती है, अगर इसे नेशनल कांफ्रेंस का समर्थन हासिल हो, मगर फिर उमर अब्दुल्ला कह चुके हैं कि वह इस पर तभी विचार करेंगे, जब मुफ्ती खुद उन्हें बुलावा भेजें। इसमें दिक्कत यह है कि ऐसी सरकार जम्मू के लोगों की भावनाओं का प्रतिनिधित्व नहीं करेगी, िजससे आगे परेशानियां खड़ी हो सकती हैं।
पीडीपी-भाजपा गठजोड़ का बनना भी सरल नहीं है, मगर वर्तमान हालात में मुश्किलें तो हर गठजोड़ के साथ हैं। इसमें संदेह नहीं कि पीडीपी और भाजपा दो विपरीत ध्रुव हैं, जिनकी विचारधाराएं भी अलग-अलग हैं, और तमाम मुद्दों पर दोनों एक-दूसरे से असहमति भी जताते आए हैं। भाजपा जब से सत्ता में आई है, वह अनुच्छेद 370 को खत्म करने की बात कर रही है, हालांकि नरेंद्र मोदी ने श्रीनगर की सभाओं में इस पर कुछ नहीं कहा। वहीं भाजपा नेताओं का इस बार जम्मू से किसी हिंदू मुख्यमंत्री का आह्वान घाटी के लोगों की परेशानी का सबब बना। वैसे रिकॉर्ड मतदान वहां के लोगों की इस भावना का भी प्रतिनिधित्व करता है कि भाजपा को रोका जाए, ताकि जम्मू-कश्मीर की विशेष स्थिति को बरकरार रखा जा सके।
मुफ्ती मोहम्मद सईद के लिए भाजपा के साथ हाथ मिलाना तलवार की धार पर चलने जैसा होगा। उनकी पार्टी अनुच्छेद 370 को हटाने का समर्थन कर ही नहीं सकती। फिर पीडीपी का घाटी में जो समर्थन है, उस वजह से उसे भाजपा के साथ हाथ मिलाना नागवार गुजरेगा। मगर उनकी सबसे बड़ी परेशानी कट्टर हिंदुत्व की वह पुकार है, जो भाजपा के भीतर से समय-समय पर उबाल मारती रहती है। मुफ्ती की अटल बिहारी वाजपेयी के साथ निकटता रही है, जिन्हें भारत रत्न घोषित किया गया है, और पूरे सूबे में जिनके लिए इज्जत है। मोदी ने घाटी के लोगों से कहा था कि वह वाजपेयी की इंसानियत, कश्मीरियत और जम्हूरियत वाली बात पर चलेंगे। यह तभी संभव है, जब मुफ्ती और मोदी के बीच गहरी समझ का माहौल बने और मोदी कट्टर हिंदुत्व की बातें करने वाले संघ को नियंत्रण में रख सकें।