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वायदे और विरोधाभास

Fri, 22 May 2015 09:01 PM IST
एम के वेणु
एम के वेणु Updated Fri, 22 May 2015 09:01 PM IST
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Commitments and paradox

सत्ता में एक वर्ष पूरा करने के उपलक्ष्य में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके मंत्रिमंडल के सदस्यों ने सरकार की नीतियों और उपलब्धियों का बखान करने के लिए गहन अभियान शुरू कर दिया है। अगले पखवाड़े देश भर में करीब सौ रैलियों की योजना बनाई गई है, जिसमें वरिष्ठ भाजपा नेता और केंद्र सरकार के मंत्री सरकार की उपलब्धियों और नीतियों के बारे में बताएंगे।

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दरअसल भाजपा अपने कामकाज के बारे में विस्तार से देश को बताने की कवायद इसलिए करने जा रही है, क्योंकि उसे लगता है, मुख्यधारा का मीडिया उसकी नीतियों का सम्यक मूल्यांकन नहीं करता। मीडिया के प्रति यह कड़वाहट प्रधानमंत्री और उनके कैबिनेट सदस्यों की संवेदनहीन घोषणाओं में दिखाई पड़ी है।
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प्रधानमंत्री ने हाल ही में वित्त मंत्री अरुण जेटली के आवास पर संपादकों और पत्रकारों से अनौपचारिक बातचीत के दौरान मीडिया के कथित राजग विरोधी रवैये की ओर संकेत किया था। उनका यह आकलन हैरान करने वाला है, क्योंकि जैसा कि संपादकीय रुख से पता चलता है, मीडिया का ज्यादातर हिस्सा अब भी घनघोर रूप से राजग सरकार के प्रति सकारात्मक है।
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लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान मोदी ने बार-बार अच्छे दिनों का वायदा किया था, लेकिन उससे उपजी अति आकांक्षाओं के पूरी न हो पाने से छवि पर असर पड़ने के बावजूद मीडिया प्रधानमंत्री को और समय देना चाहता है।

आम तौर पर सभी सरकारें, चाहे वह कांग्रेस की हो या भाजपा की, मीडिया को दोष देने की शुरुआत अपने कार्यकाल के अंतिम चरण में शुरू करती हैं, जब सरकार के कामकाज में शिथिलता आने लगती है और लोग उनके प्रदर्शन का आकलन करने लगते हैं। मगर लगता है कि इस राजग सरकार के मामले में यह मूल्यांकन जल्दी ही शुरू हो गया है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को गंभीरता से विचार करना चाहिए कि ऐसा क्यों हुआ। क्या यह सब मीडिया का पैदा किया हुआ है? इस घटना का वस्तुपरक मूल्यांकन एक अलग ही कहानी बताएगा।

हालांकि यह तर्क बिल्कुल सही है कि राजग सरकार के कामकाज का सम्यक मूल्यांकन तीन से चार वर्ष बाद ही किया जा सकता है, लेकिन तथ्य यह है कि जिन लोगों ने मोदी को वोट दिया है, वे अब भी इस बात को लेकर स्पष्ट नहीं हैं कि सत्ता में एक साल रहने के बाद विभिन्न मुद्दों पर मोदी और भाजपा का रुख क्या है। भाजपा दरअसल स्पष्ट राजनीतिक संदेश न दे पाने की गंभीर समस्या से जूझ रही है।

यह इतना साफ है कि पार्टी को भूमि अधिग्रहण अध्यादेश पर (जिसका कृषक समुदाय में अच्छा संदेश नहीं गया) अपनी बात रखते हुए पूरी तरह से रक्षात्मक होना पड़ा था। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने दुख के साथ कहा, 'कॉरपोरेट जगत के लिए एक इंच भूमि भी अधिगृहीत नहीं की जाएगी।'

इससे पहले खुद मोदी ने कहा था कि 'सरकार मुकेश अंबानी के लिए जमीन अधिग्रहण नहीं कर रही।' इसके बजाय भाजपा लोगों को यह समझाने की कोशिश कर रही है कि 'अधिगृहीत जमीनों का उपयोग सरकार ग्रामीण अधिसंरचनाओं, सिंचाई और गरीबों के आवास' के लिए करेगी।

इससे पहले मैंने कभी भी किसी सरकार को इतनी महत्वपूर्ण, गरीब समर्थक नीति के बारे में इतने रक्षात्मक स्वर में बताते हुए नहीं देखा। शासन में एक साल पूरा करती भाजपा अपने बारे में बन रही धारणा की गंभीर समस्या से जूझ रही है और इसीलिए गरीब-समर्थक दिखने की कोशिश कर रही है। संघ परिवार से जुड़े बाबा रामदेव ने भी सार्वजनिक तौर पर कहा कि राहुल गांधी की वजह से भूमि अधिग्रहण अध्यादेश के मुद्दे पर सरकार की किसान-विरोधी छवि बनी है।

भूमि अधिग्रहण और इससे उपजी भावनाएं तो एक लक्षण है। असली रोग तो और गंभीर है। नरेंद्र मोदी को पिछले डेढ़ वर्षों में देश के लोगों से किए वायदे के विरोधाभासों का विश्लेषण करने की जरूरत है। सच्चाई यह है कि आज उनकी सरकार का कामकाज एक साल पूर्व की गई उनकी प्रमुख घोषणाओं के बिल्कुल विपरीत है। उदाहरण के लिए मोदी के विशिष्ट वैचारिक संदेश को देखा जा सकता है, जो उन्होंने दिल्ली में सार्वजनिक तौर पर कहा था कि 'मेरे आर्थिक दर्शन को सिर्फ एक शब्द में समझा जा सकता है-ट्रस्टीशिप।' ट्रस्टीशिप पूरी तरह से गांधीवादी अवधारणा है, जिसमें समाज के सभी संसाधनों का संरक्षण और प्रयोग लोगों की ओर से किया जाता है। उसके बाद प्रधानमंत्री ने कई अवसरों पर दोहराया है कि उनकी सरकार गांधी, लोहिया और दीनदयाल उपाध्याय के सिद्धांतों पर आधारित आर्थिक नीतियों का अनुसरण करेगी।

भाजपा को स्वयं से एक सीधा सवाल करना चाहिए कि भूमि अधिग्रहण के मुद्दे पर गांधी, लोहिया और दीनदयाल उपाध्याय क्या प्रतिक्रिया देते। इस पर वैचारिक स्पष्टता के लिए भाजपा गांधीवादियों, लोहियावादियों और दीनदयाल उपाध्याय की नीतियों पर काम कर चुके विद्वानों को एक मंच पर लाकर उनके सामने अपना यह सवाल रख सकती है। नरेंद्र मोदी को इस पर जवाब देना होगा। गरीब से गरीब लोगों तक कल्याणकारी योजनाएं पहुंचाने के लिए गांधी को कभी एक केंद्रीकृत और ताकतवर सरकारी अमले पर भरोसा नहीं था।

भाजपा सोचती है कि सरकार किसानों से बिना उनकी सहमति के लाखों एकड़ भूमि अधिगृहीत कर लेगी और गरीबों का कल्याण करेगी। जबकि जबरन भूमि अधिग्रहण गांधी के लिए अभिशाप बन गया होता। दीनदयाल उपाध्याय का हृदय उन 90 फीसदी किसानों के लिए खून के आंसू रोता, जिनके पास तीन एकड़ से भी कम जमीन है। आज ये किसान एक शक्तिशाली और केंद्रीकृत राज्य के सामने खुद को असहाय पाते हैं, जो उसकी स्थिति को समझना नहीं चाहती।


इसलिए सबसे पहले मोदी को अपने बुनियादी संदेश को सही तरीके से लोगों तक पहुंचाना होगा। जन-धन योजना लागू करना और दुर्घटना एवं जीवन बीमा के दायरे में आठ करोड़ लोगों को लाना बहुत अच्छी बात है, लेकिन यदि मूलभूत दार्शनिक ढांचा सही नहीं होगा, तो यह तात्कालिक राहत बनकर ही रह जाएगा। कुछ भी संघटित रूप से होना चाहिए, सतही तौर पर नहीं। इसी ढांचे से कामकाज का सही प्रवाह होगा।

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