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इबोला के खिलाफ सामूहिक युद्ध

Fri, 08 Aug 2014 08:27 PM IST
निकोलस क्रिस्टॉफ
निकोलस क्रिस्टॉफ Updated Fri, 08 Aug 2014 08:27 PM IST
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Collective war against Ibola

तेईस जुलाई की सुबह डॉ केंट ब्रेंटली की जब नींद खुली, तो उन्हें बुखार था। उन्होंने तुरंत खुद की जांच की, और तीन दिन बाद आई जांच रिपोर्ट ने उनकी आशंका को सच साबित कर दिया। वह इबोला वायरस का शिकार हो चुके थे। तैंतीस वर्षीय ब्रेंटली ने अपने एक दोस्त को ई-मेल किया और लिखा कि इबोला वायरस की विभीषिका के बारे में किसी भी सामान्य इन्सान से अधिक जानकारी होने के कारण वह 'काफी डरे हुए' हैं। वह पिछले कई हफ्तों से पश्चिम अफ्रीका में इस बीमारी से जूझते लोगों का इलाज कर रहे हैं, और देख रहे हैं कि कैसे इस वायरस का रोगी उल्टियां कर रहा है, उन्हें आंतरिक रक्तस्राव हो रहा है और कभी-कभी कैसे उनके शरीर के ऊपरी हिस्सों से भी खून बहने लगता है। ऐसा मरीज पहले कमजोर हो जाता है और फिर मौत की नींद में सो जाता है।'

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कुछ लोग रोगियों का इलाज कर रहे डॉ. ब्रेंटली और एक दूसरे मिशनरी नैंसी रिटबोल के इबोला वायरस की चपेट में आने के लिए न सिर्फ उन्हें जिम्मेदार ठहरा रहे हैं, बल्कि इन दोनों के अटलांटा लौटने और एक अस्पताल में इलाज करने की संभावना पर भी उन्हें घनघोर आपत्ति है। जैसा कि डोनाल्ड ट्रंप ने लिखा है, खतरों को देखते हुए उन दोनों को अमेरिका नहीं लौटना चाहिए। उन्होंने ट्वीट किया है, अफ्रीकियों की मदद करने के लिए जाने वाले लोग महान हैं, पर उन्हें इसके नतीजे के बारे में भी जान लेना चाहिए।
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यह मानसिकता जहां इसका खुलासा करती है कि विश्व स्वास्थ्य के प्रति हमारी रुचि क्यों नहीं है, वहीं यह भी बताती है कि सहानुभूतिशील न होने के पीछे राष्ट्रीय स्वार्थ भी काम करता है। ब्रेंटली और रिटबोल हमारे नायक तो हैं ही, वे इस वैश्विक संक्रमण से जल्दी ही निपटने के लिए जरूरी प्रयास करने की तरफ भी इशारा कर रहे हैं। वे कृतज्ञता और प्रशंसा के पात्र हैं, क्योंकि लाइबेरिया में वे न सिर्फ हमारी, बल्कि स्थानीय निवासियों की भी रक्षा कर रहे थे।
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मानव मस्तिष्क सार्वजनिक स्वास्थ्य की तुलना में अल-कायदा जैसे आतंकी खतरों के प्रति ज्यादा संवेदनशील होता है, जबकि संक्रामक रोग आतंकवाद से ज्यादा खतरनाक हैं। सेंटर्स फॉर डिजीज कंट्रोल ऐंड प्रीवेंशन के आंकड़ों के अनुसार, अमेरिका में आज भी लगभग 15,000 लोग हर वर्ष एड्स की वजह से मरते हैं। लिहाजा अच्छा यही होगा कि संक्रामक रोगों के प्रसार को रोकने के बजाय हम उसके स्रोत या उसकी जड़ों को कमजोर करें। समारिटन पर्स समूह के, जिसके लिए ब्रेंटली काम करते हैं, केन इसहाक कहते हैं, 'अगर हम इबोला को वहीं घेरने की कोशिश नहीं करेंगे, तो यकीन मानिए, आने वाले दिनों में हम दूसरी जगहों पर भी इससे लड़ रहे होंगे।'

वैसे विश्व बैंक ने इबोला से लड़ने के लिए 20 करोड़ अमेरिकी डॉलर की मदद का वायदा किया है, लेकिन अगर इस राशि का छोटा हिस्सा भी पहले दे दिया जाए, तो इस संक्रमण के प्रसार को रोका जा सकता है। इस तथ्य को युगांडा में चल रहे उस अमेरिकी समर्थित कार्यक्रम से समझा जा सकता है, जिसका हवाला सीडीएस के निदेशक डॉ थॉमस फ्रीडेन देते हैं। इस योजना के अंतर्गत इबोला के इलाज और उसके निदान के लिए स्वास्थ्यकर्मियों को प्रशिक्षण दिया जा रहा है। इसका सकारात्मक असर हुआ है। वर्ष 2011 में 12 वर्ष की एक लड़की की मौत इबोला वायरस के कारण हुई थी, लेकिन उसके आसपास का कोई भी व्यक्ति इस संक्रमण से प्रभावित नहीं हुआ। यह एक बड़ी उपलब्धि है।

फ्रीडेन को वह भारतीय मरीज अब भी याद है, जिसे दवा-प्रतिरोधी टीबी होने के कारण इलाज के लिए न्यूयॉर्क लाया गया था। वह काफी जटिल मामला था और उसके इलाज में एक लाख अमेरिकी डॉलर का खर्च आया था। बाद में, उस मरीज के गांव में एक कार्यक्रम शुरू किया गया, जिसके बाद महज 10 अमेरिकी डॉलर में ही इस खतरनाक रोग से बचा जा सकता था।

इबोला के बारे में न्यूयॉर्क के अस्पतालों को सतर्क तो कर दिया गया है, पर सच यह है कि इसका इलाज काफी जटिल है। यह मुझसे बेहतर भला कौन जान सकता है, क्योंकि मैं भी कभी इस रोग का एक संदिग्ध मरीज था। यह वर्षों पहले की बात है। तब मैं जापान में था। कांगो में इबोला वायरस की महामारी फैलने के कारण मैं टोक्यो लौटा था। करीब एक हफ्ते बाद मुझे तेज बुखार हो गया। वह मलेरिया की तरह था। इसलिए मैं यह पता लगाने में जुट गया कि टोक्यो के किस अस्पताल में मलेरिया का बेहतर इलाज होता है। स्वास्थ्य अधिकारियों ने ज्यों ही 'कांगो' और 'बुखार' शब्द सुने, उन्होंने तुरंत स्वास्थ्यकर्मियों से भरा एक एंबुलेंस मेरे घर पर भेज दिया। उन लोगों ने ऐसे कपड़े पहन रखे थे, मानो वे अंतरिक्ष यात्री हों। मेरे पड़ोसी इन दृश्यों को देखकर दंग थे। पर अस्पताल के इमरजेंसी कक्ष का डॉक्टर इन रोगों के विषय में नहीं जानता था। उसने मेरे बाजू पर एक टीका लगाया, कंधा हिलाया और फिर मुझे वापस घर जाने को कह दिया। अगले दिन मुझे मलेरिया होने की जानकारी दी गई।

लिहाजा ब्रेंटली या रिटबोल को लापरवाह नहीं कहना चाहिए, जो खुद आज इबोला के संक्रमण का शिकार हो चुके हैं। बल्कि उन्हें ऐसे नायकों की अग्रिम पंक्ति में रखना चाहिए, जिन्होंने अमेरिकी और अफ्रीकी, दोनों को बचाने की कोशिश की है। कभी-कभी हम भूल जाते हैं कि स्वास्थ्यकर्मी कुछ खतरनाक जोखिमों का बहादुरी से सामना करते हैं- फिर चाहे वह एचआईवी हो, टीबी हो या फिर इबोला। सुखद है कि अटलांटा में ब्रेंटली और रिटबोल का स्वास्थ्यकर्मी स्वेच्छा से इलाज कर रहे हैं। ऐसे स्वास्थ्यकर्मी तो प्रशंसा के पात्र हैं ही, साथ ही, हमें उन सभी स्वास्थ्यकर्मियों को भी सलाम करना चाहिए, जो इबोला वायरस के संक्रमण का प्रसार रोकने के लिए अफ्रीका और अमेरिका में दिन-रात जुटे हुए हैं।


यहां ब्रेंटली को डॉक्टरी शिक्षा देने वाले प्रोफेसर रिचर्ड गुंडरमैन के शब्द याद आते हैं, 'केंट के विषय में सुनकर दुखी होना स्वाभाविक है। लेकिन अगर वह हमारी मानसिकता नहीं झकझोर पाता, तो मुझे आश्चर्य होगा। जो लोग उनसे असहमत हैं, उन्हें जानना चाहिए कि एक जहाज बंदरगाह पर भले सुरक्षित रह सकता है, पर जहाज सिर्फ बंदरगाह पर खड़ा रहने के लिए नहीं होता।'

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