उन अबलाओं की भी सुध लीजिए
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
शशि थरूर ने दिल्ली की बलात्कार पीड़िता के नाम से कानून बनाने की बात कहकर कुछ गलत नहीं किया। भंवरी देवी जैसी कितनी ही पीड़िताएं अपनी पहचान के साथ सक्रिय हैं। बल्कि नाम जाहिर होने से लोगों की सहानुभति भी मूर्त रूप में सहायक होती है। बल्कि ऐसा भी हो सकता है कि कानून का नाम पीड़िता के नाम पर रख दें और उसकी उपधाराओं के नाम देश की उन दलित बेटियों के नाम पर रखे जाएं, जिन्हें पिछले दिनों हरियाणा और देश के दूसरे इलाकों में बहुत कुछ सहना पड़ा।
दिल्ली की उस दुर्भाग्यपूर्ण घटना पर देश का जनमत जिस तरह जाग्रत हुआ, वह सचमुच स्वागतयोग्य है। पर इस सचाई से आंखें नहीं मूंदनी चाहिए कि इसी दौरान दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश, गुजरात, बिहार और मध्य प्रदेश में दलित महिलाओं के साथ भी बलात्कार हुए, इनकी निजता का किसी को ख्याल नहीं था। हरियाणा में एक दलित पिता ने अपनी बेटी के साथ हुए हादसे की पीड़ा में खुदकुशी कर ली, लेकिन केंद्र सरकार ने इसे गंभीरता से नहीं लिया। यहां तक कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के दौरे के बाद भी अपेक्षित हलचल नहीं हुई।
बलात्कार हमेशा कमजोरों का ही होता है। चूंकि औरतें शारीरिक तौर पर पुरुष की तुलना में कमतर हैं, इसलिए वे इसकी शिकार होती हैं। इस तर्क को और आगे बढ़ाएं, तो हम पाते हैं कि पुरुषवर्चस्ववादी व्यवस्था में बलात्कार की शिकार ज्यादातर वही होती हैं, जो समाज के निचले तबके से आती हैं। लेकिन हरियाणा के मामले सुबूत हैं कि ऐसे में अक्सर पुलिस थानों में शिकायत तक दर्ज नहीं होती, सजा की तो बात ही छोड़ दीजिए। उत्तर प्रदेश के बदायूं जनपद की दातागंज तहसील में पिछले दिनों एक दलित स्त्री से बलात्कार हुआ, तो सरकार न सिर्फ चुप्पी लगा गई, बल्कि उस स्त्री के लिए वकील की फीस देने के लिए भी कोई आगे नहीं आया। यह उस समाज और देश की सचाई है, जिसके इक्कीसवीं सदी में आगे बढ़ने की निरंतर बातें की जा रही हैं।
हालांकि इससे भी इनकार नहीं कि दामिनी के मामले के बाद पुलिस, प्रशासन और समाज पर दबाव बना है। यह इस तरह का पहला मामला था, जिसकी गूंज न सिर्फ राष्ट्रीय, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सुनी गई। इसकी वजह उस हादसे की भयावहता थी। उन दरिंदों ने न सिर्फ उस युवती के साथ अमानुषिक अत्याचार किया, बल्कि उनकी मंशा उसे और उसके दोस्त की जान लेने की थी। इस दुस्साहस का परिचय देश की राजधानी में सरकार और पुलिस-प्रशासन की नाक के ठीक नीचे दिया गया। ऐसे में जनाक्रोश का भड़कना स्वाभाविक था।
यद्यपि इस तरह की बढ़ती घटनाओं से एक नकारात्मक संदेश यह भी जा रहा है कि लड़कियों को बाहर पढ़ने मत भेजो, उन्हें अकेला मत छोड़ो, उन्हें देर रात तक बाहर न रहने दो। लेकिन इससे तो लड़कियों की शिक्षा-दर और कम हो जाएगी, जिससे उनका विकास कुंठित होगा। अतः इस स्थिति का सामना करने के लिए देश भर में लाखों कन्या विद्यालय प्राथमिकता के आधार पर खोले जाने चाहिए। इसके अलावा गृह मंत्री तीस फीसदी महिला पुलिस की भर्ती तुरंत करने की बात कर चुके हैं। महिला पुलिस की संख्या बढ़ने पर निश्चय ही फर्क पड़ेगा। इसके अलावा स्कूली स्तर पर एनसीसी के दायरे को और व्यापक करना भी जरूरी है। इसका लाभ यह होगा कि लड़कियां बाहरी दुनिया के प्रति साहसी बनेंगी।
लेकिन जब तक समाज नहीं बदलेगा, तब तक शायद ही कोई बड़ा बदलाव आए। अभी तक तो उस घटना से आहत, भावुक लोग महिलाओं के प्रति नजरिया बदलने की बात कर रहे हैं। लेकिन वे सचमुच अपना नजरिया बदलते हैं या नहीं, यह देखने की बात होगी। अगर समाज बदलेगा, तभी यह मानसिकता भी पैदा होगी कि हर बलात्कार मानवता पर हमला है। फिर दलित बेटियों के साथ हो रही बर्बरता पर चुप्पी नहीं ओढ़ी जाएगी, तब पुलिस थानों में उनकी शिकायतें लिखी जाएंगी, और इन बेटियों के हक में आवाज बुलंद करने के लिए भी लोग इंडिया गेट और जंतर-मंतर पर उमड़ेंगे। जब ऐसा होगा, तभी पता चलेगा कि दामिनी के साथ हुई बर्बरता ने सचमुच हमारे समाज को बदला है। तभी देश की सैकड़ों-हजारों दलित बेटियों को न्याय मिल पाएगा।