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पर्यावरण: कथनी-करनी के बीच उबल रही है पृथ्वी, राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर मानसिकता बदलने की दरकार

Wed, 02 Aug 2023 07:33 AM IST
Shankar Ayair शंकर अय्यर
Updated Wed, 02 Aug 2023 07:33 AM IST
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सार
पर्यावरण संबंधी चुनौतियों से निपटने के लिए लोगों की मानसिकता बदलनी जरूरी है। लोग मौसम में आ रहे बदलावों को किसी अन्य जगह हो रही घटनाओं का नतीजा मानते हैं। राजनीतिक स्तर पर भी इसे आज की नहीं, बल्कि भविष्य की समस्या के तौर पर देखा जाता है।
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Climate Change wildfire Earth is boiling due to inaction need to change mindset at political and social level
wildfire - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

इसे अमेरिका और मैक्सिको की सीमाओं का प्रतीक कहना काफी हद तक मुनासिब होगा। सगुआरो कैक्टस 16 मीटर की ऊंचाई तक बढ़ता है। इसकी दर्जन भर शाखाएं मनुष्य की भुजाओं की तरह दिखती हैं। इसका वजन तकरीबन दो टन तक हो सकता है और यह भीषण गर्मी में भी 150 साल तक अपना अस्तित्व बचाए रखने के लिए जाना जाता है। इसकी आनुवांशिक कोडिंग ऐसी होती है, जो इसे बेहद शुष्क व गर्म माहौल में भी बचाए रखती है। यही वजह है कि इसे 'दक्षिण-पश्चिम के प्रहरी' की उपाधि मिली हुई है। लेकिन अब इसकी प्रतिष्ठा संकट में है। एरिजोना और कई राज्यों में लगातार 30 दिन तक तापमान 42 डिग्री से ऊपर रहने की वजह से सगुआरो कैक्टस मुरझा रहे हैं। मौसम की यह मार केवल भौगोलिक या राजनीतिक हद तक सीमित नहीं है।



विश्व मौसम विज्ञान संगठन के अनुसार, पृथ्वी की सतह का वैश्विक औसत तापमान इस जुलाई में अब तक का सबसे ज्यादा रहा है। जुलाई में इतिहास के तीन सर्वाधिक गर्म दिन दर्ज किए गए। इतना ही नहीं, वर्ष के इस समय में समुद्र का अब तक का अधिकतम तापमान भी दर्ज हुआ। उत्तरी गोलार्ध का बड़ा हिस्सा गर्म हवाओं की चपेट में है। कनाडा से लेकर यूनान तक के जंगल आग से धधक रहे हैं। अमेरिका के दो-तिहाई राज्यों में गर्म हवाओं के चलते अलर्ट घोषित हुआ है। स्पेन के कैटेलोनिया में रिकॉर्ड 45.4 डिग्री, इटली के सार्डिनिया में 48.2 डिग्री, चीन के शिनजियांग में 52.2 डिग्री और ट्यूनीशिया के ट्यूनिस में रिकॉर्ड 49 डिग्री तापमान दर्ज किया गया है।


बात सिर्फ गर्म हवाओं की नहीं है। मुंबई में जुलाई की बारिश ने सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। भारी बारिश और ब्यास व यमुना नदियों के उफान ने पंजाब, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, दिल्ली और उत्तर प्रदेश में कहर बरपाया है। अभी पिछले हफ्ते बाढ़ के पानी ने गुजरात के जूनागढ़ से लेकर छत्तीसगढ़ के रायपुर और असम के जोरहाट तक देश भर में कई जिंदगियों, घरों और आजीविकाओं को तबाह कर दिया। ग्लोबल वार्मिंग की भयावहता ध्रुवीय क्षेत्रों के आंकड़ों से भी जाहिर होती है।

नेशनल स्नो ऐंड आइस डाटा सेंटर ने खुलासा किया कि जुलाई में अंटार्कटिका के आस-पास के क्षेत्र की समुद्री बर्फ 1981 से 2010 तक के औसत से कहीं ज्यादा तेजी से पिघली है और वहां की बर्फ औसत से 26 लाख वर्ग किलोमीटर कम हुई है, जो कि तकरीबन अर्जेंटीना के क्षेत्रफल के बराबर है। वहीं, आर्कटिक क्षेत्र में बर्फ 1981 से 2010 के औसत से 13 लाख वर्ग किलोमीटर कम हुई है। 1979 के बाद से अब तक आर्कटिक क्षेत्र की समुद्री बर्फ में 19.9 लाख वर्ग किलोमीटर की कमी आई है, जो कि मैक्सिको के कुल क्षेत्रफल के बराबर है।

हालांकि, यह जो कुछ हो रहा है, उसकी भविष्यवाणी पहले ही की जा चुकी है। 1990 के बाद से आईपीसीसी (जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी पैनल) की पांच रिपोर्टें पर्यावरण में आ रहे इन बदलावों को लेकर व्यापक साक्ष्य प्रस्तुत करती आ रही हैं। आईपीसीसी की पहली रिपोर्ट के तीन दशक बीत जाने के बाद दुनिया ज्यादा गर्म हुई है और यही गर्म हवाएं, कथनी और करनी में फर्क भी स्पष्ट कर रही हैं। अभी कुछ ही दिन पहले संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने घोषणा की कि, 'ग्लोबल वार्मिंग का युग खत्म और ग्लोबल ब्वॉइलिंग का युग शुरू होता है।' दूसरे शब्दों में कहें, तो 'पृथ्वी का तापमान बढ़ रहा है', यह कहने के बजाय 'पृथ्वी ने उबलना शुरू कर दिया है', कहना ज्यादा मुनासिब होगा।

इस संदर्भ में दिखाई जा रही उदासीनता के नतीजे विभिन्न अध्ययनों ने बताए हैं। 2008 में आईपीसीसी की तकनीकी रिपोर्ट में कहा गया, 'उपलब्ध रिकॉर्ड और पर्यावरण के संबंध में लगाए गए अनुमान' तमाम ऐसे साक्ष्य पेश करते हैं, जो बताते हैं कि पर्यावरण में आ रहे बदलावों से ताजा पानी के स्रोतों को खतरा है और इनसे चीन, पाकिस्तान और भारत जैसे देशों के लोगों पर, जो ग्लेशियर की बर्फ पिघलने पर निर्भर हैं, प्रतिकूल असर पड़ेगा। भारत में किसानों ने अनुभव किया है कि किस तरह से बढ़ता तापमान, बारिश का बदलता पैटर्न और मौसम में भीषण बदलाव फसल उत्पादन पर असर डाल रहे हैं। महासागरों के गर्म होने और उनकी अम्लीयता बढ़ने से मत्स्य पालन और जलीय कृषि का उत्पादन बाधित होता है। आईपीसीसी के छठे आकलन में पाया गया कि, 'पर्यावरण में आए बदलावों से पैदा होने वाली खाद्य असुरक्षा और आपूर्ति में अस्थिरता और गैर-पर्यावरणीय जोखिमों के बढ़ने की आशंका भी बढ़ रही है।'

अफसोस की बात है कि इस दिशा में हम अब तक लक्ष्य निर्धारित करने से आगे नहीं बढ़ पाए हैं। इलेक्ट्रिक वाहनों की ओर बढ़ते कदम का जश्न मनाया जा रहा है। लेकिन पूरी दुनिया में बिकने वाली साढ़े छह करोड़ से ज्यादा कारों में इलेक्ट्रिक कारों की हिस्सेदारी बमुश्किल एक करोड़ है। इस क्षेत्र में अगुआ बने चीन में आधे से ज्यादा बिजली पैदा करने वाले संयंत्र कोयले पर आधारित हैं। पवन और सौर जैसे नवीकरणीय ऊर्जा पर जोर दिए जाने के बावजूद पूरी दुनिया में जितनी बिजली का उत्पादन होता है, उसका 30 फीसदी से भी कम हिस्सा नवीकरणीय ऊर्जा से प्राप्त होता है। कोयला आधारित संयंत्रों से होने वाले उत्सर्जन में भी बढ़ोतरी हुई है।

पर्यावरणीय बदलावों का मुद्दा और इससे निपटने के लिए तैयार की गई नीतियों का एक मानव जनित पहलू भी है। वर्ष 1800 में विश्व की आबादी लगभग एक अरब थी। इसे दो अरब तक पहुंचने में 127 साल लगे। लेकिन इसके सात से आठ अरब तक होने में महज 12 साल ही लगे! पर्यावरण के मुद्दों पर उठाए जा रहे कदमों में जरूरतों, इच्छाओं और बर्बादी की गलत परिभाषा की वजह से दिक्कतें आ रही हैं। लोग मौसम में आ रहे बदलावों को किसी अन्य जगह हो रही घटनाओं का नतीजा मानते हैं। राजनीतिक स्तर पर इसे मुद्दा तो माना जाता है। लेकिन इसे आज की नहीं, बल्कि भविष्य की समस्या के तौर पर देखा जाता है।

बड़े पैमाने पर उत्सर्जन करने वाले विकसित देश विकासशील देशों पर कोयले या कच्चे तेल के अतिशय उपयोग का आरोप लगाते रहते हैं। प्रति व्यक्ति उत्सर्जन की ऊंची दर वाले दरअसल विकसित देश ही हैं। संसाधनों और तकनीकी पर इन्हीं देशों का नियंत्रण है और इसकी कीमत साझा करने के लिए ये इच्छुक भी नहीं हैं। वर्ष 2009 में अमीर देशों ने अल्प विकसित देशों में पर्यावरण संबंधी चुनौतियों से निपटने के लिए 2020 तक प्रति वर्ष 100 अरब डॉलर जुटाने का वायदा किया था, जो अभी पूरा होना बाकी है। कुल मिलाकर, आज जो कुछ हो रहा है, भविष्य के लिए उसके भयावह निहितार्थ हैं। एक टिकाऊ भविष्य  सुनिश्चित करने की खिड़की तेजी से बंद होती दिख रही है।

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