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विश्लेषण: विपक्षी एकजुटता का अर्थ, गांधी जयंती के बाद ही सामने आएगी जमीनी हकीकत
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इंडिया गठबंधन की बैठक
- फोटो :
PTI
विस्तार
विपक्षी गठबंधन 'इंडिया' नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा और एनडीए सरकार के खिलाफ एक मनोवैज्ञानिक युद्ध छेड़ने में कामयाब रहा है। अब, सत्ताधारी दल पर भी दबाव है कि वह बाजी को पलटने के लिए कदम उठाए। 'इंडिया' गठबंधन के सभी घटकों का एकजुट और तकरीबन 400 लोकसभा सीटों पर ‘एक के सामने एक’ की रणनीति पर सहमत होना महत्वपूर्ण है। 2014 और 2019 में चुनाव से पहले विपक्षी दलों में ऐसी एकजुटता के दर्शन नहीं हुए थे। दूसरी ओर, 18 जुलाई को हुई 'इंडिया' की बैठक के वक्त एनडीए के भीतर जैसी हलचल दिखी थी, ठीक उसी तरह, 'इंडिया' की मुंबई बैठक के दौरान भी एनडीए सरकार ने तलवार खींचने वाले अंदाज में संसद का विशेष सत्र बुला लिया है।
यह आकलन वाकई विचारणीय है कि चाहे 'एक-देश, एक-चुनाव' का मुद्दा हो या महिला आरक्षण, समान नागरिक संहिता, यूनिवर्सल इनकम योजना हो या जनसंख्या नियंत्रण विधेयक, 'इंडिया' गठबंधन के सहयोगियों को सरकार को झकझोरने में काफी आनंद मिलता है। ‘सी’ वोटर के आंकड़े भी कम महत्वपूर्ण नहीं हैं, जो 'इंडिया' के 43 फीसदी के सामने एनडीए को 45 फीसदी वोट शेयर मिलने के संकेत दे रहे हैं। यह दो फीसदी का जो फर्क है, वह काफी कम है, खासकर यह देखते हुए कि 2019 में 105 लोकसभा सीटों पर भाजपा को तीन लाख या उससे भी ज्यादा वोटों से जीत हासिल हुई थी।
महिला आरक्षण विधेयक में महिला मतदाताओं को लुभाने का दम है। इससे 180 अतिरिक्त लोकसभा सीटें जुड़ने का जो अनुमान लगाया जा रहा है, उसमें जातिगत समीकरणों को साधने की चुनौती को ध्यान में रखते हुए एनडीए के भीतर राजनीतिक सर्वस्वीकार्यता को पाना आसान नहीं होगा। स्मरणीय है कि 1951-52 और 1957 के चुनावों के दौरान भी अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति से सांसद निर्वाचित हुए थे।
ममता बनर्जी, नीतीश कुमार, एमके स्टालिन और अरविंद केजरीवाल उन नेताओं में शामिल हैं, जो महिला मतदाताओं में अपनी लोकप्रियता के लिए मशहूर हैं। इसी तरह, 'एक-देश, एक-चुनाव' का विचार देश में व्यापक आधार रखने वाले मध्य वर्ग के लिए तो प्रभावशाली लगता है, पर व्यवहार में संविधान के पांच अनुच्छेदों 83, 85, 172, 174 और 356 में महत्वपूर्ण संशोधन लाना असंभव नहीं, तो कठिन जरूर है, क्योंकि इसके लिए विपक्षी दलों समेत राजनीतिक दलों की सर्वसम्मति जरूरी है। फिलहाल इसके कोई संकेत नहीं दिखते।
हालांकि मोदी सरकार 'एक-देश, एक-चुनाव' के मुद्दे को आगे बढ़ाने के लिए उत्सुक दिख रही है। उसने इसकी व्यवहार्यता की जांच की जिम्मेदारी पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को सौंपकर एक अभूतपूर्व कदम उठाया है। भारत में पूर्व राष्ट्रपतियों की एक शृंखला रही है, लेकिन सेवानिवृत्ति के पश्चात इनमें से किसी को भी कोई जिम्मेदारी या फिर किसी पैनल की अध्यक्षता नहीं दी गई है।
एक साथ चुनाव आयोजित होने पर एक अनुमान के अनुसार, 28 लाख मतपत्र यूनिट और 24 लाख कंट्रोल यूनिट की जरूरत पड़ेगी। 'एक-देश, एक-चुनाव' की व्यवस्था लागू होने के बाद इन मशीनों का इस्तेमाल पांच साल में एक बार ही होगा। अगर व्यवहारिक नजरिये से देखें, तो आम चुनावों के साथ करीब 12 राज्यों में विधानसभा चुनाव होने की संभावना होगी। वे राज्य जहां मई, 2024 से छह महीने पहले या बाद में विधानसभा चुनाव होने हैं, उनमें राजस्थान, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, मिजोरम, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश, ओडिशा, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, हरियाणा, महाराष्ट्र और झारखंड शामिल हैं।
नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार बंगाल, पंजाब, कर्नाटक और दिल्ली में किस तरह मध्यावधि चुनाव की स्थितियां तैयार करती है, वह तो फिलहाल समझ से परे है। लेकिन, महत्वपूर्ण बात यह है कि एक साथ चुनाव होने से क्या वाकई मोदी और भाजपा को फायदा मिलेगा; खासकर, जब दिल्ली और ओडिशा में हुए पिछले चुनाव और 2018 में मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनावों में काफी विविधतापूर्ण वोटिंग पैटर्न दिखा था?
दूसरी ओर, 'इंडिया' गठबंधन अपने विस्तार की कोशिशों में जुटा है। मुंबई में इसे पीजेंट ऐंड वर्कर्स पार्टी (पीडब्ल्यूपी) को साथ जोड़ने में कामयाबी मिली है। गठबंधन के सहयोगी अब वंचित बहुजन अघाडी को जोड़ना चाहते हैं, जिसमें प्रकाश आंबेडकर शामिल हैं। वे आंध्र में चंद्रबाबू के नेतृत्व वाली टीडीपी और गुजरात व राजस्थान के कुछ हिस्सों में प्रभाव रखने वाली भारतीय ट्राइबल पार्टी के अलावा, बसपा को भी जोड़ने की कोशिश में हैं। हालांकि, टीडीपी और बसपा, दोनों फिलहाल 'इंडिया' से जुड़ने को तैयार नहीं हैं, पर विधानसभा चुनावों के बाद 'इंडिया' गठबंधन फिर से इसके लिए कोशिश करने के लिए तैयार है।
एनडीए के लिए चिंता की दूसरी वजहें भी हैं। 'इंडिया' के सहयोगियों के बीच किसी तरह का मतभेद सामने नहीं आ रहा है। कुछ खटास के बाद दिल्ली में भी आप का सहयोग अवश्यंभावी दिख रहा है। केजरीवाल चाहते हैं कि सीटों को शेयर करने का फॉर्मूला 30 सितंबर तक फाइनल कर लिया जाए। वहीं, ममता बनर्जी चाहती हैं कि एक संयुक्त एजेंडे की घोषणा दो अक्तूबर तक कर दी जाए। ऐसी खबरें मिल रही हैं कि मुंबई में हर पार्टी के लोगों को शामिल करते हुए एक संयुक्त सोशल मीडिया टीम गठित करने का भी निर्णय लिया गया है। विपक्षी गुट के तीसरे सम्मेलन के बाद संयुक्त सोशल मीडिया टीम की दो सितंबर को मुंबई में ही बैठक प्रस्तावित है। इसके पीछे विचार यह है कि 'इंडिया' के सभी घटकों की सोशल मीडिया पर पहुंच का इस्तेमाल करते हुए ज्यादा से ज्यादा लोगों तक साझा संदेश पहुंचाया जा सके।
अब यह छिपा नहीं है कि राजनीतिक युद्ध ज्यादा कड़वाहट के साथ जमीन की तुलना में सोशल मीडिया पर अधिक लड़े जाते हैं। ऐसे में, सहयोगियों के बीच सोशल मीडिया पर एकता दिखनी महत्वपूर्ण है। कम शब्दों में कहें, तो विपक्षी दलों में एकता का बरकरार रहना खुद में एक अच्छी खबर है। पटना और बंगलूरू के बाद 'इंडिया' के सहयोगियों का 26 से 28 पर पहुंचना, इनके 24 या 22 दलों तक घटने से ज्यादा महत्वपूर्ण है। दो अक्तूबर से इन विपक्षी नेताओं द्वारा जमीनी लड़ाई का आगाज करने के बाद ही स्पष्ट तस्वीर उभरेगी। आखिरकार, लोकतंत्र में लड़ने के लिए मैदान में उतरना सबसे जरूरी होता है।