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नेपाल में चीन की भाषायी कूटनीति : निवेश के बाद अब भाषा को अपना हथियार बनाया है

Thu, 20 Jun 2019 05:15 AM IST
Raman Singh शशांक
शशांक Published by: Raman Singh Updated Thu, 20 Jun 2019 05:15 AM IST
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China's language diplomacy in Nepal
मंडारिन शिक्षक - फोटो : a

हमारे पड़ोसी देश नेपाल में चीन लगातार अपनी दखल बढ़ाता जा रहा है। आर्थिक क्षेत्र में बड़े पैमाने पर निवेश के बाद अब उसने भाषा को अपना कूटनीतिक हथियार बनाया है और अपनी मंडारिन भाषा को बढ़ावा देने के लिए नेपाल के निजी स्कूलों को मुफ्त में भाषा सिखाने वाले शिक्षक उपलब्ध कराने का लालच दिया है। मीडिया में छपी खबरों के मुताबिक, नेपाल के कई बड़े निजी स्कूलों ने अपने यहां के छात्रों के लिए मंडारिन भाषा की पढ़ाई को अनिवार्य बना दिया है।


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नेपाल स्थित चीनी दूतावास ने यह प्रस्ताव दिया है कि वह स्कूलों को मंडारिन पढ़ाने वाले अच्छे शिक्षक उपलब्ध कराएगा। यही नहीं, दूतावास ने उन शिक्षकों का वेतन देने का प्रस्ताव भी रखा है और कहा है कि उन शिक्षकों के रहने और खाने-पीने आदि की व्यवस्था स्कूल प्रबंधन स्वयं करे।

दरअसल काफी समय से नेपाल अपने देश में रोजगार सृजन के लिए कोई स्थायी उपाय की तलाश में है। चीन से करीब डेढ़ लाख यात्री हर वर्ष नेपाल पर्यटन के लिए आते हैं, लेकिन नेपाल इस आंकड़े को दस लाख के आसपास पहुंचाना चाहता है। इसके लिए जरूरी है कि नेपाल के लोगों को चीनी भाषा की ज्यादा जानकारी हो, जो चीन से आने वाले पर्यटकों के लिए गाइड का काम कर सकें।

पहले भी कुछेक सौ लोग नेपाल से स्कॉलरशिप पर चीन मंडारिन भाषा सीखने जाते रहे हैं। लेकिन हाल के वर्षों में चीन के साथ नेपाल के रिश्ते में प्रगाढ़ता आई है, चीन ने बेल्ट ऐंड इनीशिएटिव रोड परियोजना से नेपाल को जोड़ा है और नेपाल ने भी सक्रियतापूर्वक इसे अपनाया है। अब मंडारिन भाषा की अनिवार्य पढ़ाई इसमें एक नया पहलू है। जाहिर है, इसका असर नेपाल और चीन के रिश्तों पर तो पड़ेगा ही, भारत पर भी पड़ेगा।

हाल के वर्षों में चीन ने हमारे दूसरे पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान से भी नजदीकी बढ़ाई है, लेकिन पाकिस्तान को इस तरह का प्रस्ताव नहीं दिया गया है। संभवतः इसकी मुख्य वजह यह है कि चीन नेपाल के साथ भारत के रिश्तों और हितों को नुकसान पहुंचाना चाहता है। नेपाल-भारत के बीच रोटी-बेटी के रिश्ते हैं। भारत और नेपाल के बीच खुली सीमा है, वहां के लोग भारत में बिना वीजा के आकर आराम से काम कर सकते हैं। तो चीन इन रिश्तों को प्रभावित करके वहां अपना दूरगामी हित साधना चाहता है।

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