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सरकारी तंत्र की उपेक्षा के मारे बच्चे
कोमल कुशवाहा
Updated Sun, 13 Aug 2017 06:25 PM IST
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कोमल कुशवाहा
गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज में भारी संख्या में मस्तिष्क ज्वर से पीड़ित बच्चों की मौत बेहद दुखद है। एक तरफ हम आजादी का जश्न मनाने की तैयारी कर रहे हैं, दूसरी तरफ कई दर्जन माएं अपने नौनिहालों के शोक में विलाप कर रही हैं। यह सरकारी तंत्र की लापरवाही और संवेदनहीनता का ही एक और उदाहरण है। आखिर यह नौबत क्यों आई, इसे समझने के लिए इस रोग से जुड़े तथ्यों पर गौर करना प्रासंगिक लगता है।
गोरखपुर मेडिकल कॉलेज में जापानी इनसेफेलाइटिस (मस्तिष्क ज्वर) के मरीज दूर-दूर से आते हैं। बिहार के सात-आठ जिलों से, नेपाल के समीपवर्ती इलाकों से और उत्तर प्रदेश के करीब 12 जिलों के लगभग दो सौ से ढाई सौ किलोमीटर की दूरी से यहां मरीज आते हैं, क्योंकि आसपास के इलाकों में इस बीमारी के इलाज के लिए कोई बड़ा अस्पताल नहीं है। इसलिए यहां मरीजों की बहुत भीड़ होती है। 2005 तक मस्तिष्क ज्वर के ज्यादातर मरीजों में यह देखा गया कि उन्हें जेई (जापानी इन्सेफेलाइटिस) विषाणु से यह रोग होता है। 1978 से रोग हर साल बढ़ता गया, शुरू में इस रोग से काफी मौतें होती थीं। सौ में से पचास-साठ मरीजों की मौत हो जाती थी। 1985 तक इस पर कोई ध्यान नहीं दिया गया, जबकि 1978 में ही इस विषाणु की पहचान हो गई थी और इसकी जांच के लिए जो किट बनी थी, वह गोरखपुर के विषाणु से ही बनी थी। इसलिए उसका नाम गोरखपुर विषाणु, 1978 रखा गया था। जो भी सरकारें 1978 से 2005 तक सत्ता में थीं, उन्होंने इस पर बहुत ध्यान नहीं दिया, इसलिए इस रोग का प्रकोप बढ़ता गया।
वर्ष 2004-05 में इस अस्पताल में कुछ ऐसे मरीज आए, जिनमें जेई विषाणु नहीं पाए गए। उस विषाणु की जांच में तीन-चार साल लग गए। ग्वालियर, पुणे आदि की प्रयोगशालाओं में जांच करवाने से पता चला कि उन रोगियों में इंटेरोवायरस है, जिसका नाम अब बदलकर पारइको वायरस रख दिया गया है। इस वायरस के रोगी बहुत ज्यादा मिले, लेकिन इस शोध को आईसीएमआर के लोग मानने को तैयार नहीं थे। उन्होंने इस शोध को स्वीकार नहीं किया और इसकी जांच के लिए जो किट बने थे, उसे भी स्वीकार नहीं किया। नतीजतन यह मसला 2005-13 तक चलता रहा। 2013 में आईसीएमआर ने बंगलूरू से एक डॉक्टर को जांच के लिए भेजा, उन्होंने जांच की, तो बताया कि स्क्रब टायफाइड से इन्सेफेलाइटिस हो रहा है। स्क्रब टायफाइड विषाणु नहीं है, कीटाणु है, जो बड़ा बैक्टरिया होता है। उसके बाद आईसीएमआर ने आदेश जारी कर दिया कि जिन बच्चों को बुखार हो और मस्तिष्क ज्वर के लक्षण दिख रहे हो, उन सभी बच्चों का स्क्रब टायफाइड का इलाज किया जाए।
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मस्तिष्क ज्वर की जांच आसान है, अगर रीढ़ के पानी की जांच की जाए। रीढ़ के पानी की जांच में अगर प्रोटीन, सेल्स और लिफोंसेड्स बढ़े हुए मिलें, और-दो हफ्ते से नीचे का बुखार है और बच्चा बेहोश है, तो यह मस्तिष्क ज्वर कहलाएगा। विषाणुजनित मस्तिष्क ज्वर की पहचान आसान है, लेकिन कौन सा विषाणु है, इसकी जांच के लिए बहुत बड़ी प्रयोगशाला की जरूरत होती है। स्क्रब टायफाइड की जांच के लिए भी बहुत बड़ी प्रयोगशाला चाहिए। हमारे देश में वायरल रिसर्च करने वाले लोग बहुत कम हैं। दिल्ली के अलावा आईसीएमआर की अपनी कई क्षेत्रीय प्रयोगशालाएं हैं, उनमें दो-चार लोग ही काम करते हैं यानी उसका बहुत बड़ा सेटअप नहीं है। इसलिए हमारे देश में इस रोग से संबंधित अनुसंधान का काम बहुत ज्यादा नहीं हुआ।
सलिए सरकारी स्तर पर जेई वायरस के वैक्सीन बनाने का काम नहीं हुआ, सिर्फ निजी कंपनियां ही जेई वायरस की वैक्सीन बनाती हैं, लेकिन वह भी व्यापक स्तर पर नहीं हो रहा है। एंटरोवायरस का किट भी सरकार ने स्वीकार नहीं किया, इसलिए उसका काम भी धरा का धरा रह गया। सबसे महत्वपूर्ण काम 1978 में हुआ था, क्योंकि उसमें मस्तिष्क (ब्रेन) की बायप्सी कराई गई थी, जिसमें ब्रेन में जेई वायरस पाया गया था। दूसरी बार हमने 2009 ब्रेन की बायप्सी कराई थी, जिसमें ब्रेन में एंटरोवायरस पाया गया था। जेई विषाणु का प्रसार अब भी जारी है, जो वातावरण में, चिड़िया में पाया जाता है, लेकिन जेई विषाणु का सबसे बड़ा होस्ट सूअर है, धान के खेतों में पनपने वाला मच्छर इसका वाहक है। एंटेरोवायरस दूषित खान-पान से फैलता है, जबकि स्क्रब टायफाइड चीलर के लार्वा से फैलता है।
मौजूदा मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सांसद रहते हुए इन्सेफेलाइटिस के खिलाफ संसद में काफी आवाज उठाते रहे, लेकिन सरकारी तंत्र में बैठे अधिकारीगण उन्हें गुमराह करते रहे। आज अगर इतनी ज्यादा मौतें हुई हैं, तो इसकी एक बड़ी वजह अधिकारियों की लापरवाही भी है। पिछली सरकार ने शुद्ध पेयजल की आपूर्ति के लिए ग्रामीण इलाकों में बड़ी संख्या में टैंक बनवाए थे, लेकिन उनका ठीक से रख-रखाव नहीं हो सका।
वास्तव में गोरखपुर मेडिकल कॉलेज में बुनियादी अवसंरचना की भारी कमी है। यहां ज्यादातर मेडिकल स्टाफ अस्थायी हैं, उनकी नियुक्ति में भी काफी भ्रष्टाचार है। और तो और, यहां डॉक्टर भी संविदा पर रखे गए हैं। कर्मचारियों की संख्या भी काफी कम है। जितनी संख्या में यहां मरीज आते हैं, उस अनुपात में सुविधा की भारी कमी है। अभी वहां ऑक्सीजन आपूर्ति की क्या व्यवस्था है, उसके बारे में तो मुझे नहीं पता, लेकिन जब मैंने ऑक्सीजन की आपूर्ति के लिए पाइपलाइन की व्यवस्था शुरू की थी, तो पांच कंपनियों से उसकी आपूर्ति होती थी। इसके अलावा आपात व्यवस्था के लिए हर रोज सिलिंडर मंगवाए जाते थे।
बुनियादी सुविधाओं के अभाव में इतने बच्चों की मौत निश्चित रूप से दुखद और शर्मनाक है, जिसका संज्ञान प्रदेश ही नहीं, केंद्र सरकार को भी लेना चाहिए और पूर्वांचल की इस महामारी को खत्म करने के लिए जरूरी कदम उठाने चाहिए। इसके लिए सबसे जरूरी है एक केंद्रीय इन्सेफेलाइटिस केंद्र की स्थापना। साथ ही, इस रोग से संबंधित अनुसंधान कार्य को बढ़ावा देना चाहिए। इसके लिए अलग से बजट होना चाहिए, जो आज तक किसी सरकार ने नहीं किया। बीआरडी मेडिकल कॉलेज के अलावा अन्य अस्पतालों में भी इस रोग के प्रभावी इलाज की व्यवस्था होनी चाहिए। जेई का टीका सभी बच्चों का लगवाने की व्यवस्था होने के साथ शौचालय एवं स्वच्छ पेयजल सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
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गोरखपुर मेडिकल कॉलेज में जापानी इनसेफेलाइटिस (मस्तिष्क ज्वर) के मरीज दूर-दूर से आते हैं। बिहार के सात-आठ जिलों से, नेपाल के समीपवर्ती इलाकों से और उत्तर प्रदेश के करीब 12 जिलों के लगभग दो सौ से ढाई सौ किलोमीटर की दूरी से यहां मरीज आते हैं, क्योंकि आसपास के इलाकों में इस बीमारी के इलाज के लिए कोई बड़ा अस्पताल नहीं है। इसलिए यहां मरीजों की बहुत भीड़ होती है। 2005 तक मस्तिष्क ज्वर के ज्यादातर मरीजों में यह देखा गया कि उन्हें जेई (जापानी इन्सेफेलाइटिस) विषाणु से यह रोग होता है। 1978 से रोग हर साल बढ़ता गया, शुरू में इस रोग से काफी मौतें होती थीं। सौ में से पचास-साठ मरीजों की मौत हो जाती थी। 1985 तक इस पर कोई ध्यान नहीं दिया गया, जबकि 1978 में ही इस विषाणु की पहचान हो गई थी और इसकी जांच के लिए जो किट बनी थी, वह गोरखपुर के विषाणु से ही बनी थी। इसलिए उसका नाम गोरखपुर विषाणु, 1978 रखा गया था। जो भी सरकारें 1978 से 2005 तक सत्ता में थीं, उन्होंने इस पर बहुत ध्यान नहीं दिया, इसलिए इस रोग का प्रकोप बढ़ता गया।
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वर्ष 2004-05 में इस अस्पताल में कुछ ऐसे मरीज आए, जिनमें जेई विषाणु नहीं पाए गए। उस विषाणु की जांच में तीन-चार साल लग गए। ग्वालियर, पुणे आदि की प्रयोगशालाओं में जांच करवाने से पता चला कि उन रोगियों में इंटेरोवायरस है, जिसका नाम अब बदलकर पारइको वायरस रख दिया गया है। इस वायरस के रोगी बहुत ज्यादा मिले, लेकिन इस शोध को आईसीएमआर के लोग मानने को तैयार नहीं थे। उन्होंने इस शोध को स्वीकार नहीं किया और इसकी जांच के लिए जो किट बने थे, उसे भी स्वीकार नहीं किया। नतीजतन यह मसला 2005-13 तक चलता रहा। 2013 में आईसीएमआर ने बंगलूरू से एक डॉक्टर को जांच के लिए भेजा, उन्होंने जांच की, तो बताया कि स्क्रब टायफाइड से इन्सेफेलाइटिस हो रहा है। स्क्रब टायफाइड विषाणु नहीं है, कीटाणु है, जो बड़ा बैक्टरिया होता है। उसके बाद आईसीएमआर ने आदेश जारी कर दिया कि जिन बच्चों को बुखार हो और मस्तिष्क ज्वर के लक्षण दिख रहे हो, उन सभी बच्चों का स्क्रब टायफाइड का इलाज किया जाए।
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मस्तिष्क ज्वर की जांच आसान है, अगर रीढ़ के पानी की जांच की जाए। रीढ़ के पानी की जांच में अगर प्रोटीन, सेल्स और लिफोंसेड्स बढ़े हुए मिलें, और-दो हफ्ते से नीचे का बुखार है और बच्चा बेहोश है, तो यह मस्तिष्क ज्वर कहलाएगा। विषाणुजनित मस्तिष्क ज्वर की पहचान आसान है, लेकिन कौन सा विषाणु है, इसकी जांच के लिए बहुत बड़ी प्रयोगशाला की जरूरत होती है। स्क्रब टायफाइड की जांच के लिए भी बहुत बड़ी प्रयोगशाला चाहिए। हमारे देश में वायरल रिसर्च करने वाले लोग बहुत कम हैं। दिल्ली के अलावा आईसीएमआर की अपनी कई क्षेत्रीय प्रयोगशालाएं हैं, उनमें दो-चार लोग ही काम करते हैं यानी उसका बहुत बड़ा सेटअप नहीं है। इसलिए हमारे देश में इस रोग से संबंधित अनुसंधान का काम बहुत ज्यादा नहीं हुआ।
सलिए सरकारी स्तर पर जेई वायरस के वैक्सीन बनाने का काम नहीं हुआ, सिर्फ निजी कंपनियां ही जेई वायरस की वैक्सीन बनाती हैं, लेकिन वह भी व्यापक स्तर पर नहीं हो रहा है। एंटरोवायरस का किट भी सरकार ने स्वीकार नहीं किया, इसलिए उसका काम भी धरा का धरा रह गया। सबसे महत्वपूर्ण काम 1978 में हुआ था, क्योंकि उसमें मस्तिष्क (ब्रेन) की बायप्सी कराई गई थी, जिसमें ब्रेन में जेई वायरस पाया गया था। दूसरी बार हमने 2009 ब्रेन की बायप्सी कराई थी, जिसमें ब्रेन में एंटरोवायरस पाया गया था। जेई विषाणु का प्रसार अब भी जारी है, जो वातावरण में, चिड़िया में पाया जाता है, लेकिन जेई विषाणु का सबसे बड़ा होस्ट सूअर है, धान के खेतों में पनपने वाला मच्छर इसका वाहक है। एंटेरोवायरस दूषित खान-पान से फैलता है, जबकि स्क्रब टायफाइड चीलर के लार्वा से फैलता है।
मौजूदा मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सांसद रहते हुए इन्सेफेलाइटिस के खिलाफ संसद में काफी आवाज उठाते रहे, लेकिन सरकारी तंत्र में बैठे अधिकारीगण उन्हें गुमराह करते रहे। आज अगर इतनी ज्यादा मौतें हुई हैं, तो इसकी एक बड़ी वजह अधिकारियों की लापरवाही भी है। पिछली सरकार ने शुद्ध पेयजल की आपूर्ति के लिए ग्रामीण इलाकों में बड़ी संख्या में टैंक बनवाए थे, लेकिन उनका ठीक से रख-रखाव नहीं हो सका।
वास्तव में गोरखपुर मेडिकल कॉलेज में बुनियादी अवसंरचना की भारी कमी है। यहां ज्यादातर मेडिकल स्टाफ अस्थायी हैं, उनकी नियुक्ति में भी काफी भ्रष्टाचार है। और तो और, यहां डॉक्टर भी संविदा पर रखे गए हैं। कर्मचारियों की संख्या भी काफी कम है। जितनी संख्या में यहां मरीज आते हैं, उस अनुपात में सुविधा की भारी कमी है। अभी वहां ऑक्सीजन आपूर्ति की क्या व्यवस्था है, उसके बारे में तो मुझे नहीं पता, लेकिन जब मैंने ऑक्सीजन की आपूर्ति के लिए पाइपलाइन की व्यवस्था शुरू की थी, तो पांच कंपनियों से उसकी आपूर्ति होती थी। इसके अलावा आपात व्यवस्था के लिए हर रोज सिलिंडर मंगवाए जाते थे।
बुनियादी सुविधाओं के अभाव में इतने बच्चों की मौत निश्चित रूप से दुखद और शर्मनाक है, जिसका संज्ञान प्रदेश ही नहीं, केंद्र सरकार को भी लेना चाहिए और पूर्वांचल की इस महामारी को खत्म करने के लिए जरूरी कदम उठाने चाहिए। इसके लिए सबसे जरूरी है एक केंद्रीय इन्सेफेलाइटिस केंद्र की स्थापना। साथ ही, इस रोग से संबंधित अनुसंधान कार्य को बढ़ावा देना चाहिए। इसके लिए अलग से बजट होना चाहिए, जो आज तक किसी सरकार ने नहीं किया। बीआरडी मेडिकल कॉलेज के अलावा अन्य अस्पतालों में भी इस रोग के प्रभावी इलाज की व्यवस्था होनी चाहिए। जेई का टीका सभी बच्चों का लगवाने की व्यवस्था होने के साथ शौचालय एवं स्वच्छ पेयजल सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
-लेखक बीआरडी मेडिकल कॉलेज, गोरखपुर के पूर्व प्रमुख हैं