फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Chhath puja is the gift of agricultural culture, every person has sun, every man has moon

कृषि संस्कृति का उपहार है छठ, नदियों से है गहरा रिश्ता, जल की प्रतिष्ठा से इस पर्व का संबद्ध

Sun, 03 Nov 2019 12:48 AM IST
Parichay Das परिचय दास
Updated Sun, 03 Nov 2019 12:48 AM IST
विज्ञापन
Chhath puja is the gift of agricultural culture, every person has sun, every man has moon
छठ पूजा - फोटो : PTI

छठ पर्व यानी ऊर्जा, ऊष्मा और लगाव। सूर्य को दिया जाने वाला अर्घ्य वस्तुतः अपने अंदर की अग्नि को प्रज्वलित करना है। हर व्यक्ति में सूर्य है, हर आदमी में चंद्रमा है। हर किसी में ऋतुएं बसती हैं। ये हमारे भीतर के समंजन व रंजकता तथा रंग को दर्शाती हैं। एक तरह से यह स्मृति का आलेखन है। हमारे यहां चंद्रमा की शीतलता को मन से जोड़ते हैं- चंद्रमा मनसो जातः।


loader

छठ पर्व यानी ऊर्जा, ऊष्मा और लगाव। सूर्य को दिया जाने वाला अर्घ्य वस्तुतः अपने अंदर की अग्नि को प्रज्वलित करना है। हर व्यक्ति में सूर्य है, हर आदमी में चंद्रमा है। हर किसी में ऋतुएं बसती हैं। ये हमारे भीतर के समंजन व रंजकता तथा रंग को दर्शाती हैं। एक तरह से यह स्मृति का आलेखन है। हमारे यहां चंद्रमा की शीतलता को मन से जोड़ते हैं- चंद्रमा मनसो जातः।

इसी तरह तेजस्विता को सूर्य से जोड़ते हैं। तेजस भाव के बिना मनुष्य की क्या बिसात? इसीलिए तेज के लिए प्रार्थनाएं की जाती हैं। अनेक मंत्र इसके लिए हैं। सूर्य ऋग्वेद काल से ही महत्त्वपूर्ण देवता रहे हैं। हमारे जीवन, पर्यावरण, उपस्थिति के लिए सूर्य ही मुख्य आधार हैं। सूर्य स्वास्थ्य का हेतु हैं। वही अंधकार को हराते और ज्योति उपलब्ध करते हैं।

लोक जीवन में सूर्य हमारे घरेलू मित्र, सखा, देवता सब कुछ हैं। छोटे-छोटे बच्चे सूर्य से सघन आत्मीयता रखते हैं। छठ के समय का सूर्य तो अत्यंत आकर्षक है-कड़ी ताप से रहित। मऊनाथ भंजन के देवलास (देवलार्क) में सूर्य की प्राचीन मूर्ति है, जिसमें वह सात घोड़ों से जुते रथ को हांकते हैं। देवलार्क का अर्थ है-देवल+अर्क यानी सूर्य का मंदिर। अनेक ध्वजों पर सूर्य के चिह्न देखे जा सकते हैं।

सूर्य सबका है

कोई देवता हमारे लोक का साथी यों ही नहीं बन जाता। वह हमारे दुख-सुख का साथी होता है। सूर्य हमें ऊष्मा देते हैं, रंग देते हैं। हमारे जीवन को रहने योग्य बनाते हैं। जो किरणें हमारी मनुष्यता से परावर्तित होती हैं, वही आलोक रचती हैं। सूर्य की रोशनी हमारे भीतर के उत्सव की संज्ञा है। सूर्य सबका है :  हर धर्म, जाति, संप्रदाय, भाषा, क्षेत्र, देश सबका। प्रकृति को अर्थ देने का कार्य सूर्य का है।

महत्वपूर्ण यह है कि सूर्य षष्ठी को दिया जाने वाला अर्घ्य लोकमन में छठी मइया को दिया जाता है। छठी मइया लोक संरचना में हित करने वाली देवी बन जाती हैं। जितने फल मिल सकते हैं, चढ़ाए जाते हैं। विशेष बांस से बनी दउरियों में फल नदी के तट पर ले जाए जाते हैं तथा चढ़ते व उतरते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। नदी या तालाब या समुद्र में घुटने पानी तक खड़े होकर साधनापूर्वक व्रती उन्हें नमन करते हैं, श्रद्धा देते हैं।

यह श्रद्धा हम अपने को ही देते हैं, यदि पूछिए तो। श्रद्धा रहित जीवन भी कोई जीवन है! चढ़ते और उतरते सूर्य, दोनों को प्रणाम करने का अर्थ है : हम सम भाव से किसी के उत्कर्ष और अपकर्ष में साथ बने रहते हैं। यह क्या बात हुई कि चढ़ते समय तो साथ रहे, लेकिन उतरते समय साथ छोड़ दिया।

एक पृथ्वी हमारे पास है, लेकिन अपनी पृथ्वी हम बार-बार रचते हैं

नदियों से छठ का गहन रिश्ता है। यानी जल की प्रतिष्ठा से यह पर्व संबद्ध है। जल जीवन है। पूरे विश्व में दो तिहाई जल ही है। संसार की रचना वैज्ञानिक ढंग से जल-थल-नभ के दुर्लभ संयोग से संभव हुई है। शरीर में जल का हिस्सा बहुतायत में है। जल को शुद्ध बनाए रखना आवश्यक है। गंगा, यमुना तथा अन्य नदियों की शुद्धता आवश्यक है।

उपासना के समय या उसके बाद नदियों-तालाबों-समुद्र को प्रदूषित करना उपासना के विरुद्ध कार्य है। यदि हम संवेदनशील नहीं हुए और इसी तरह जल, वायु तथा पृथ्वी प्रदूषित होती रही, तो हम रहेंगे कहां, यह सवाल उठेगा। कूड़ा-कचरा फैलाना अनुष्ठान का अंग नहीं। यह वैज्ञानिकता हमारे भीतर होनी चाहिए कि जो हम पृथ्वी को देते हैं, पृथ्वी वही हमको देती है।

एक पृथ्वी हमारे पास है, लेकिन अपनी पृथ्वी हम बार-बार रचते हैं। हमें स्वच्छ, स्वस्थ और मंगलमयी पृथ्वी रचनी चाहिए। सूर्य के रंग न केवल बाहरी रंग हैं, अपितु हमारे भीतरी रंग भी हैं। छठ लोक का पर्व इसलिए है, क्योंकि इसमें हमारी लय,  हमारी संस्कृति, हमारे लोक गीत, हमारे संदर्भ, हमारी सभ्यता जुड़ी है।

इसीलिए यह हमारी अस्मिता भी बन गया है। पर्वों का अस्मितागत परिवर्तन एक सामाजिक और चेतनागत प्रक्रिया है। इससे हमारे समाजों में गतिशीलता आती है। मेले केवल संस्कृति की प्राथमिकता नहीं रह जाते हैं। वे परिवर्तन के कारक बन जाते हैं। आवश्यकता इस बात की है कि वहां गरिमा के अनुकूल कार्यक्रम हों। वे हमारे साहित्य-कलाओं का उन्नयन करें। यदि दुर्गा पूजा पर विविध आकर्षक व गरिमामय कार्यक्रम हो सकते हैं, तो छठ पर स्तरीय प्रस्तुतियां क्यों नहीं हो सकतीं?

मेलों व अनुष्ठान स्थलों का जन-प्रबंधन भी करना उचित है

भोजपुरी-मैथिली-मगही-बजिका, अंगिका आदि के श्रेष्ठ साहित्य को दृश्य रूप में नाटकीयता के साथ इस समय मंच पर उतार सकें, तो अच्छा। इसके लिए साल भर से रूपरेखा बनानी चाहिए। मेलों व अनुष्ठान स्थलों का जन-प्रबंधन भी करना उचित है। यह हमारे देश में अब तक बेहतर नहीं हो सका है। इसीलिए घटनाएं घट जाती हैं।

घाटों को स्वच्छ, निर्मल रखना शासन व जन, दोनों का दायित्व है। छठ को कृषि संस्कृति का उपहार मानना चाहिए। कृषि को बचाने का प्रयत्न भी आवश्यक है। हमारी सुंदरता हमारी भीतरी तेजस्विता से आती है। छठ इसी का हेतु है। इसीलिए अर्घ्य हम बाहर व भीतर, दोनों तरह से देते हैं। अपने भीतर के सूर्य को बचाना अपनी जिजीविषा और आत्मसम्मान को बचाना है। हमारे हजारों रंग सूर्य की रोशनी में चमकें, हमारी कामना है।
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Next Article

Followed