फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Changing equations from U.S. restrictions

अमेरिकी प्रतिबंध से बदलते समीकरण

Sun, 21 Oct 2018 05:13 PM IST
prashant dikshit प्रशांत दीक्षित
Updated Sun, 21 Oct 2018 05:13 PM IST
विज्ञापन

अगर कच्चे तेल की कीमतों को बढ़ाने वाले कारकों का निकट भविष्य में समाधान नहीं मिला, तो देश और देशवासियों के लिए गंभीर परिस्थितियां पैदा होने वाली हैं। इसकी वजह यह है कि भारत इस रणनीतिक कार्रवाई का सबसे प्रमुख शिकार है। ऐसी दो ताकतें हैं, जो जान-बूझकर और गंभीर रूप से तेल की कीमतों के संतुलन को अस्थिर कर रही हैं। पहला कारक है, ईरान के खिलाफ अमेरिकी राष्ट्रपति की नीतियां और दूसरा उतना ही महत्वपूर्ण कारक है, रूस, ईरान, और उत्तर कोरिया पर द्वेषपूर्ण प्रतिबंध। अमेरिकी संसद ने प्रतिबंध के माध्यम से अमेरिका के दुश्मनों से निपटने संबंधी कानून (सीएएटीएसए) पारित किया है। स्पष्ट रूप से ईरान पर दोनों तरह के प्रतिबंध लागू हैं।


loader

सबसे पहले तो अमेरिका ने 2015 में ईरान और वैश्विक शक्तियों के समूह (पी5+1 यानी अमेरिका, ब्रिटेन, रूस, फ्रांस, चीन व जर्मनी एवं यूरोपीय संघ) के बीच हुए परमाणु समझौते से बाहर निकलने का फैसला किया। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने फैसला किया कि अमेरिका ईरान के कथित परमाणु कार्यक्रम को रोकने के लिए हुए 2015 के ऐतिहासिक समझौते से बाहर आ जाएगा और फारस की खाड़ी के राष्ट्र ईरान पर वित्तीय प्रतिबंध फिर से लागू करेगा। हकीकत में इसका मतलब ईरान से तेल का निर्यात रोकने के लिए ऐतिहासिक कदम उठाना था। इस घोषणा के तुरंत बाद कच्चे तेल की कीमत 2014 के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई और कच्चे तेल की बेंचमार्क कीमत 2.5 फीसदी बढ़कर 76.75 डॉलर प्रति बैरल हो गई।
 
ट्रंप प्रशासन ने तर्क दिया कि वह परमाणु समझौता, जिसके चलते तेहरान के परमाणु कार्यक्रम को रोकने के बदले में कुछ आर्थिक प्रतिबंधों को हटाया गया था, त्रुटिपूर्ण था, क्योंकि इसने कुछ अन्य चीजों के अलावा ईरान के अस्थिर व्यवहार पर कुछ नहीं कहा, यानी बैलिस्टिक मिसाइल के विकास को सीमित नहीं किया। पिछले ओबामा शासन द्वारा लिए गए निर्णयों के उलट यह एकतरफा आश्चर्यजनक बदलाव था। ओबामा ने 2015 के समझौते में स्वेच्छापूर्वक हिस्सा लिया था।
 
ट्रंप की घोषणा के बाद कंपनियों को ईरानी तेल और ईंधन क्षेत्र में नए सौदे करने की इजाजत नहीं है। अगस्त तक, ईरान सरकार के ऋण या मुद्रा में लेन-देन और देश के ऑटोमोबाइल क्षेत्र या ईरानी सोने और अन्य धातुओं से संबंधित खरीद समाप्त हो गए थे। नवंबर में, ईरान के तेल और ऊर्जा क्षेत्र, शिपिंग और बंदरगाहों और बीमा सेवाओं से जुड़े सौदों को ट्रंप प्रशासन के प्रतिबंधों के तहत प्रतिबंधित किया जाएगा। असल में ट्रंप प्रशासन ने तब तक नरमी की इजाजत नहीं दी है, जब तक कि ईरान के तेल की आपूर्ति शून्य तक नहीं पहुंच जाती। वर्ष 2010-11 से सऊदी अरब के बाद ईरान भारत का दूसरा सबसे बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता देश है, लेकिन इसके संदिग्ध परमाणु कार्यक्रमों के खिलाफ इस पर लगे पश्चिमी प्रतिबंधों ने बाद के वर्षों में उसे सातवें स्थान पर पहुंचा दिया। वर्ष 2013-14 एवं 2014-15 में भारत ने ईरान से क्रमशः 11 और 10.95 टन तेल खरीदा। 2015 के समझौते के बाद इन प्रतिबंधों को खत्म कर दिया गया। अगले वर्ष ईरान से आपूर्ति 12.7 टन हो गई, जो बाद में 27.2 टन तक पहुंच गई।

रिफाइनरियों के लिए ईरानी तेल खरीदना आकर्षक है, क्योंकि ईरान खरीद के लिए 90 दिनों का क्रेडिट प्रदान करता है, जो अन्य उत्पादकों द्वारा दिए जाने वाले समय से तीन गुना ज्यादा है।

हालांकि एक ही संतोषजनक पहलू है कि समझौते के अन्य साझेदार-ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी और रूस ने इस समझौते को छोड़ने के लिए अमेरिकी कदम की आलोचना की, और वे अब तक इन प्रतिबंधों में शामिल नहीं हुए हैं। यह भारत के लिए मददगार है, क्योंकि वह ईरान का तेल खरीदने के लिए यूरोपीय बैंकों से भुगतान जारी रख सकता है। इसके अलावा नई दिल्ली ने तेल के बदले में ईरान को गेहूं, सोया से बने खाद्य पदार्थ और उपभोक्ता वस्तुओं की आपूर्ति करके प्रतिबंधों को बेअसर करने की इच्छा जताई है। लेकिन यह बेहद अनिश्चित है कि यूरोपीय देश अमेरिकी हमले का सामना करने में सक्षम होंगे या नहीं। इसी तरह अगर भारत ईरान से तेल खरीदना जारी रखता है, तो उसके अपने उभरते रणनीतिक रिश्तों में भारी तनाव आएगा, जो अनिवार्य रूप से चीन के बढ़ते रणनीतिक प्रभाव के मद्देनजर बनाया गया था। पिछले सितंबर में अमेरिकी रक्षा सचिव के साथ 2+2 बैठकों के दौरान इन संकेतों को स्पष्ट रूप से देखा गया था।

दूसरी तरफ दुनिया का सबसे बड़ा कच्चे तेल का खरीदार और ईरान का सबसे बड़ा ग्राहक चीन ने स्पष्ट रूप से घोषणा की है कि उसने अमेरिका के एकतरफा प्रतिबंधों का विरोध किया और जुलाई से मासिक तेल आयात में 26 फीसदी की बढ़ोतरी की। पिछले महीने ईरान के तेल निर्यात का 35 फीसदी हिस्सा उसी ने खरीदा। स्पष्ट रूप से अमेरिकी प्रभाव के तहत उसके आने की संभावना नहीं है।

अब हमें अमेरिकी प्रभाव की दोगुनी रणनीतिक प्रकृति को समझना होगा। ईरान के खिलाफ प्रतिबंध के अलावा अमेरिकी संसद द्वारा पारित सीएएटीएसए कानून ने स्पष्ट रूप से भारत को भी अपनी लपेट में ले लिया है। सीएएटीएसए कानून को अगर सख्ती से लागू किया गया, तो उसमें इतनी क्षमता है कि भारत के पारंपरिक साझेदार रूस के साथ रक्षा खरीद को बुरी तरह से प्रभावित कर सकता है। इसके अलावा अमेरिका के साथ भारत के बढ़ते रक्षा एवं सुरक्षा संबंधों के लिए भी यह परीक्षा की घड़ी होगी।
 
हमें यह भी स्वीकार करना होगा कि रूस और चीन के बीच बहुत पुराने ऐतिहासिक रिश्ते हैं। नियमित बैठकों के बावजूद अनसुलझे सीमा विवाद के कारण चीन के साथ हमारा संबंध भी प्रतिकूल ही है। जैसा कि देखा जा सकता है कि ईरान के खिलाफ अमेरिकी प्रतिबंध न केवल भारत पर अत्यधिक आर्थिक दबाव बना रहा है, बल्कि वैश्विक खिलाड़ियों को ध्रुवीकृत कर रहा है, और काफी हद तक शीतयुद्ध जैसी स्थिति पुनर्जीर्वित कर रहा है। और इसलिए भारत के लिए वह वक्त आ गया है कि संभवतः देश के महत्वपूर्ण हितों के लिए उसे अपने पारंपरिक गुट निरपेक्ष रुख पर वापस लौटना पड़े। 

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Next Article

Followed