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संत की प्रेरणा से बदला जीवन
शिवकुमार गोयल
Updated Thu, 08 Aug 2013 07:02 PM IST
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दक्षिण भारत की महिला संत औव्वैयार बचपन में ही अनाथ हो गई थीं। एक सद्गृहस्थ संत ने, जो प्रभु भक्ति के गीत रचते थे, उनका पालन-पोषण किया। अपने धर्मपिता के भक्ति गीतों ने औव्वैयार को भगवत भक्ति की प्रेरणा दी।
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दस वर्ष की आयु होते ही वह भी भक्ति गीतों की रचना करने लगीं। अपने इष्ट देवता विघ्नेश्वर की पूजा-उपासना में वह लीन रहतीं। कठोर तप और साधना के बल पर उन्हें अलौकिक सिद्धि प्राप्त हुई। अनेक बीमार और दुखी उनके पास पहुंचते, तो वह उन्हें जड़ी-बूटियों से निर्मित औषधि देतीं और भगवान का भजन करने और सात्विक जीवन जीकर निरोगी बनने की प्रेरणा देतीं। वह स्वयं गांवों और नगरों का भ्रमण कर लोगों को सदाचार का उपदेश देतीं।
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एक बार वह किसी गृहस्थ के द्वार पर भिक्षा मांगने पहुंचीं। उन्होंने देखा कि पति-पत्नी किसी बात पर झगड़ते हुए एक-दूसरे को कटु वचन कह रहे हैं। यह देखकर वह वापस लौटने लगीं। गृहस्वामी उन्हें पहचान गया और उनसे भोजन ग्रहण करने की प्रार्थना करने लगा। औव्वैयार ने कहा, तुम दोनों भविष्य में न लड़ने का संकल्प लो और प्रेम से रहना सीखो, मैं तभी भोजन करूंगी। क्रोध में आकर गालियां देने वाले का दिया भोजन मेरी बुद्धि को भ्रष्ट कर देगा।
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दोनों ने तत्काल क्रोध त्यागने का संकल्प लिया। औव्वैयार ने कोन्नेर वेंतन, अरने विचारम जैसे लोकप्रिय ग्रंथ भी लिखे।