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क्रिकेट से बदलेगी फिजां

Thu, 21 May 2015 08:44 PM IST
मरियाना बाबर
मरियाना बाबर Updated Thu, 21 May 2015 08:44 PM IST
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Change will come from cricket

इस हफ्ते पाकिस्तान से अच्छी और बुरी दोनों तरह की खबरें आईं। यह एक ऐसा देश है, जहां वर्षों से अच्छी खबरें कम ही सुनने में आती हैं।इसलिए, कई वर्षों बाद जब यह सुनने को मिला कि लाहौर जिम्बाब्वे के खिलाफ एक अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट मैच की मेजबानी करेगा, तो गद्दाफी स्टेडियम के बाहर टिकट पाने के लिए उत्साहित प्रशंसकों की हलचल फिर से दिखाई दी।

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दरअसल, भारत की तरह पाकिस्तान में भी क्रिकेट को लेकर दीवानगी का आलम है। खासकर, जब भारत और पाकिस्तान की टीमें एक-दूसरे के खिलाफ मैच खेल रही होती हैं, तो पाकिस्तान की गलियां बिल्कुल वीरान हो जाती हैं, क्योंकि उस वक्त हर कोई अपने टेलीविजन सेट से चिपका होता है।
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यहां की आम सोच यह है कि क्रिकेट का असली मजा तभी है, जब भारत और पाकिस्तान की टीमें आमने-सामने हों। जिम्बाब्वे टीम के पाकिस्तान आने की खबर पर पाकिस्तान की ट्वेंटी-20 क्रिकेट टीम के कप्तान शाहिद आफरीदी कहते हैं, ''ऐसा महसूस हो रहा है कि छह वर्ष के पतझड़ के बाद क्रिकेट का बसंत लौट रहा है।''
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गौरतलब है कि सुरक्षा वजहों के चलते कोई भी अंतरराष्ट्रीय टीम पाकिस्तान आने से हिचकती है। मगर इस बार पंजाब सरकार खिलाड़ियों की सुरक्षा के मद्देनजर कोई ढील देने के मूड में नहीं है। मार्च, 2009 में इस खूबसूरत और ऐतिहासिक लाहौर शहर में मेहमान श्रीलंका टीम पर आतंकवादी हमला हुआ था।

उसके बाद से यहां अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट पर विराम-सा लग गया था। उस अफसोसनाक हमले में आठ लोगों की मौत हुई थी। जिम्बाब्वे क्रिकेट बोर्ड के सदस्य ओजेस युटे ने लाहौर पहुंच कर कहा, ''पाकिस्तान की अकेलेपन की पीड़ा को हम महसूस कर सकते हैं। वर्षों तक जिम्बाब्वे ने भी यह सब झेला है, इसलिए अकेलेपन की इस राजनीति से हम अच्छे-से वाकिफ हैं। हमें अपने बीच की इन दीवारों को गिराना होगा।''

अच्छे बुरे का फर्क खत्म

दूसरी उत्साहजनक खबर अफगानी और पाकिस्तानी खुफिया एजेंसियों के बीच हुए समझौते से जुड़ी है। साथ-साथ काम करने और प्रशिक्षण से जुड़े इस समझौते से यह सुनिश्चित होगा कि आतंकवादी पाक-अफगान सीमा को आसानी से पार न कर सकें, और अच्छे व बुरे तालिबान का फर्क समाप्त हो। इस समझौते में माना गया है कि पाकिस्तान तालिबान और अफगान तालिबान, दोनों ही आतंकवादी हैं।

दरअसल, अतीत में पाकिस्तान की अफगान नीति गंभीर रूप से असफल रही थी, जिसका खामियाजा देश अब तक भुगत रहा है। मगर गलतियों से सबक लेते हुए सेना प्रमुख जनरल राहिल शरीफ, आईएसआई प्रमुख जनरल रिजवान अख्तर और प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने अपने-अपने स्तर पर यह सुनिश्चित किया है कि अफगानिस्तान की अंदरूनी राजनीति में दखल देने के बजाय वे अपने पड़ोसी देश के साथ साथ वैसा ही सम्मानजनक व्यवहार करेंगे, जिसका वह हकदार है।

इस मामले में एक बड़ा बदलाव तब देखने में आया, जब नवाज शरीफ ने काबुल में अफगान तालिबान को आतंकवादी मानते हुए घोषणा की, कि पाकिस्तान, अफगानिस्तान के साथ मिलकर उनका खात्मा करेगा। इस घोषणा का नतीजा अफगान नेशनल डाइरेक्टोरेट ऑफ सिक्युरिटी और पाकिस्तानी आईएसआई के बीच एक एमओयू पर मंजूरी के तौर पर सामने आया। उल्लेखनीय है कि अफगानिस्तान में आईएसआई को लेकर संदेह का माहौल है।

अफगानिस्तान यह मानता आया है कि आईएसआई की शह पर पर ही अफगान तालिबान उसके यहां दिक्कत पैदा करता आया है। खुफिया एजेंसियों के बीच सहयोग के बगैर दोनों देशों के लिए आतंकवाद के चंगुल से मुक्त हो पाना मुमकिन नहीं था। आने वाले कुछ महीने बताएंगे कि क्या दोनों देशों के बीच के अविश्वास की खाई में कुछ कमी आ पाई और पूरे क्षेत्र से आतंकवाद को जड़ से उखाड़ने में कुछ कामयाबी मिल सकी?

फर्जी डिग्री
अब उस बुरी खबर की बारी, जिसने पूरे पाकिस्तान को हिला कर रख दिया है। फर्जी डिग्री बनाने के मामले में दुनिया के सबसे बड़े घोटाले की जड़ें कराची में मिली हैं। मेरे एक मित्र न्यूयॉर्क टाइम्स के डेक्लान वॉल्श की खोज सवाल उठाती है कि आखिर क्या वजह हो सकती है कि एक आईटी कंपनी 'एक्जेक्ट' का खुलासा करने में पाकिस्तानी मीडिया नाकामयाब रहता है, और एक विदेशी पत्रकार कामयाब हो जाता है?

पाकिस्तानी सरकार और खुफिया एजेंसियों की नाक के नीचे ऐसा संगीन अपराध तंत्र काम कर रहा था, और किसी को कुछ पता ही नहीं था। यह भी हो सकता है कि सरकारी तंत्र यह जानना ही न चाह रहा हो, कि पूरी दुनिया में किस तरह फर्जी डिग्रियां ऑनलाइन बेची जा रही हैं, और करोड़ों डॉलर कमाए जा रहे हैं।

दिलचस्प यह है कि कंपनी के सीईओ शोएब अहमद शेख ने केवल 26 रुपये बतौर टैक्स जमा किए हैं। एक्जेक्ट खुद को दुनिया की अग्रणी आईटी कंपनी कहती है। जो फर्जी डिग्रियां यह बेच रही है, उन पर अमेरिका के विदेश मंत्री जॉन केरी तक के हस्ताक्षर मिलते हैं। पीपीपी के सीनेटर ऐतिजाज अहसान कहते हैं, ''आखिर क्या वजह है कि पाकिस्तानी ही ऐसी जालसाजियों में सबसे आगे रहते हैं।''


भारतीय मीडिया के ऑनलाइन संस्करणों में इसी एक्जेक्ट कंपनी के नए टेलीविजन चैनल 'बोल' के विज्ञापन चल रहे हैं। हालांकि अब इस चैनल का भविष्य संकट में दिख रहा है, क्योंकि इसमें पैसा एक्जेक्ट का ही लगा है। पहले के समय के विपरीत पाकिस्तान सरकार काफी तेजी दिखा रही है। कंपनी के कराची और इस्लामाबाद के दफ्तरों पर छापा पड़ा है। हालांकि यह कंपनी न्यूयॉर्क टाइम्स के आरोपों का खंडन कर रही है। पाकिस्तानी सीनेट की स्थायी समिति अब देश के अब तक के सबसे बड़े घोटाले की जांच करने जा रही है।

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