मुस्लिमों के प्रति नजरिया बदलें
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आज मुसलमानों के खिलाफ जिस तरह का वैश्विक माहौल देखने को मिल रहा है, उससे लगता है कि सारी दुनिया के मुस्लिमों को अलग-थलग करने की कोशिश की जा रही है। भारत में मुस्लिम प्रतिनिधि सफाई देते फिर रहे हैं कि कोई भी बर्बर और असभ्य मुस्लिम संगठन सारे मुसलमानों का प्रतिनिधित्व नहीं करते। पूर्व से ही देश के मुस्लिमों के खिलाफ एक सुनियोजित रणनीति के तहत कई तरह के विचार फैलाए जाते रहे हैं। जैसे, दुनिया के सारे आतंकवादी मुसलमान हैं, अपने धर्म को लेकर मुसलमान कट्टर होता है, वह हिंसा पर विश्वास करता है, वह देश में शरीयत कानून लागू करना चाहता है, देश एवं राज्य की सरकारें अपने वोट बैंक के लिए उन्हीं के हित में सोचती हैं, आबादी बढ़ाने के लिए एक मुस्लिम दंपति कई संतानों को जन्म देता है, आदि-आदि। इस तरह की कई अनर्गल बातें यहां सुनने को मिल जाती हैं।
वैश्विक स्तर पर अगर हम मुस्लिम देशों की पड़ताल करें, तो तस्वीर बिल्कुल ही दूसरी निकल कर आती है। इंडोनेशिया दुनिया का सबसे बड़ा मुस्लिम देश है। वह पूर्णरूप से एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है। उसकी कुल आबादी में 88 प्रतिशत मुस्लिम, 13 फीसदी ईसाई, तीन फीसदी हिंदू साहित कई अन्य धर्म के लोग वहां निवास करते हैं। इंडोनेशिया का राष्ट्रीय सरकारी स्लोगन भारत की तरह ही 'विविधता में एकता है।' सही मायने में दुनिया की सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी धर्मनिरपेक्ष देशों में ही रहती है। दुनिया के ज्यादातर मुस्लिम देशों में तुर्की, माली, सीरिया, नाइजीरिया और कजाकिस्तान जैसे मुस्लिम आबादी वाले बड़े देश धर्मनिरपेक्ष हैं। दुनिया के सिर्फ छह देशों ने ही घोषित तौर पर शरीयत कानून को अपनाया है।
यह प्रचार, कि अधिकांश आतंकी मुस्लमान हैं, सत्य नहीं है। यदि हम आतंक की सरकारी परिभाषा स्वीकार करें, तो गैरकानूनी गतिविधि प्रतिबंध कानून के तहत प्रतिबंधित आतंकी संगठनों में एक तिहाई भी मुस्लिम आतंकी संगठन नहीं है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सबसे ज्यादा बम धमाका करने वाला संगठन श्रीलंका का एलटीटीई रहा है। एलटीटीई को आत्मघाती बम धमाकों का जनक भी कहा जाता है। यह गैर मुस्लमानों का संगठन रहा है। साउथ एशिया टेरेरिज्म पोर्टल के अनुसार, वर्ष 2005 से 2014 के बीच सबसे ज्यादा लोग अतिवादी मुस्लिम संगठनों के बजाय पूर्वोतर के उग्रवादियों और एक खास विचारधारा से जुड़े लोगों द्वारा मारे गए हैं।
सरकार द्वारा तय की गई आतंकवाद की परिभाषा भी विरोधाभासी है। किसी बम धमाके में बीस लोगों की मौत आतंकवाद है। जबकि 1984 में दिल्ली और 2002 गुजरात में हजारों लोगों की हत्या कर दी गई थी। इसी तरह वर्ष 2008 में ओडिशा में 68 और हाल ही में मुज्जफरनगर में हुए दंगों में 40 लोग मारे गए। हर दंगों की तैयारी इनकी भी योजनाबद्ध तरीके से की गई थी। फिर इन दंगों को सरकार आतंकवाद से क्यों नहीं जोड़कर देखती?
भारतीय मुस्लमानों के बारे में यह बात भी जोर-शोर से उठाई जाती रही है कि वे कई शादियां कर अपनी आबादी हिंदुओं की आबादी के बराबर लाना चाहते हैं। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के मुताबिक, युवा मुस्लिम महिलाओं और हिंदू महिलाओं की प्रजनन दर समान है। मुस्लिम परिवारों में प्रजनन की आंशिक वृद्धि की मुख्य वजह हिंदुओं की तुलना में अशिक्षा और गरीबी का अनुपात ज्यादा होना है। जहां शिक्षा का स्तर ठीक है, वहां ज्यादा अंतर नहीं दिखाई देता। 25 प्रतिशत मुस्लिम आबादी वाले राज्य केरल में प्रजनन दर देश में सबसे कम है। गरीबी, अशिक्षा और सुविधाओं का अभाव बच्चों की संख्या निर्धारित करने वाला बड़ा कारक है और यह हर समुदाई पर लागू होता है।
सच्चर कमेठी की रिपोर्ट में यह तथ्य है कि मुस्लिम आबादी में बैंकों की शाखाएं, बस स्टॉप, सड़कों की संख्या आदि पड़ोसी हिंदू बहुल इलाके से कम हैं। हिंदुओं की तुलना में मुसलमानों की बड़ी आबादी कच्चे मकानों में रहती है। गरीबी के आंकड़ों को देखें, तो भारतीय मुसलमान अन्य किसी समुदाय की तुलना में अधिक गरीबी में गुजर-बसर करते हैं। तीन फीसदी से भी कम मुसलमान भारतीय प्रशासनिक एवं भारतीय पुलिस सेवा में हैं, जबकि उनकी आबादी 13 फीसदी से ज्यादा है। कुल मिलाकर सच्चर कमेटी ने मुसलमानों के हालात को समाजिक-आर्थिक रूप से दलितों-आदिवासियों के हालात जैसे ही बताया है। मुस्लिमों के खिलाफ हर स्तर पर चलने वाले झूठे प्रचार से गलत धारणाओं को स्थापित करने की अनवरत कोशिश चलती रहती है, जो न समाज के हित में है और न ही देश के हित में।