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बदलना होगा पानी को लेकर रवैया

Sat, 28 Jun 2014 07:25 PM IST
पत्रलेखा चटर्जी
पत्रलेखा चटर्जी Updated Sat, 28 Jun 2014 07:25 PM IST
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change the attitude towards water

अमेरिका के एक अग्रणी विचार मंच 'द ब्रूकिंग्स इंस्टीट्यूशन' ने हाल ही में एक रिपोर्ट पेश की कि 'क्या विकास की गति और तरीके का पानी की बढ़ती कमी से कोई संबंध है?' रिपोर्ट में यही महत्वपूर्ण सवाल उठाया गया। रिपोर्ट तैयार करने वाली जूलिया डेवलिन लिखती हैं, 'पश्चिम एशिया और उत्तर अफ्रीका में हालात जिस तरह खराब हुए हैं, मानवीय और राजनीतिक स्थिति जिस तरह बदतर हुई है, उसमें जल संकट का मुद्दा फिलहाल नेपथ्य में भले चला गया है...इसके बावजूद सीरिया में राजनीतिक विद्रोह की जड़ें जल संसाधनों तक पहुंच के मुद्दे से गहरे तक जुड़ी हुई हैं। कुछ लोगों का मानना है कि पानी की कमी पूरे क्षेत्र में मौजूद विकास की विराट संभावनाओं को खत्म कर सकती है।'

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रिपोर्ट के मुताबिक, सीरिया, इराक, जॉर्डन, मिस्र, लीबिया और यमन जैसे देशों में सुरक्षा और संघर्ष विराम के मुद्दों पर अंतरराष्ट्रीय फोकस बढ़ता जाएगा, लेकिन पानी की कमी के बढ़ते संकट और इसके विकास, स्वास्थ्य और लोगों की जिंदगी पर पड़ने वाले असर को नजर अंदाज नहीं किया जा सकता।
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पानी की कमी से उपजी आशंकाएं पहले से हलचलग्रस्त पश्चिम एशिया के लिए चेतावनी की तरह हैं। मगर इसकी गूंज आर्थिक महाशक्ति के तौर पर उभरते भारत में भी सुनी जा सकती है, जिसकी आबादी दिनोंदिन बढ़ती जा रही है। भारत में जल संकट के आखिर क्या मायने हैं ? राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) में जल संकट पहले ही चिंता का सबब बना हुआ है। एनसीआर की आबादी 2001 में 371 लाख थी, जो 2011 में 460 लाख तक पहुंच गई। 2021 तक इसके 617 लाख का आंकड़ा छूने की आशंका है। इस क्षेत्र में शहरीकरण की गति आबादी से भी तेज है।
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ऐसे में बड़ा सवाल है कि क्या यहां के तमाम लोग अपनी रोजमर्रा की जरूरतों के लिए पर्याप्त पानी पा सकते हैं? फिलहाल ये जरूरतें ज्यादा से ज्यादा बोरवेल की खुदाई के जरिये पूरी हो रही हैं। इस वक्त दिल्ली में चार लाख से भी ज्यादा बोरवेल हैं, जिनमें से ज्यादातर गैर-कानूनी हैं। चाहें फैक्टरियां हों, या ऑफिस,मॉल या सोसाइटीज, इस मामले में कोई भी पीछे नहीं है। इसी के चलते भूमिगत जल स्तर चेतावनी की सीमा तक पहुंच चुका है,और यह लगातार नीचे जा रहा है।

नतीजतन, जल संकट एक आम बात है। दिल्ली में पानी का संकट होता है, तो यह राष्ट्रीय सुर्खियों में आ जाता है, मगर समस्या केवल राजधानी तक सीमित नहीं है। फलते-फूलते गुड़गांव के कई हिस्से गंभीर जल संकट से जूझ रहे हैं। नोएडा की हालत भी कमोबेश ऐसी ही है। उत्तर प्रदेश राज्य भूमि जल प्राधिकरण के इंजीनियरों के मुताबिक नोएडा में ऊंची इमारतों के बढ़ते जाल से समस्या और बढ़ी है। इन्हीं वजहों से लखनऊ में भूमिगत जल स्तर खतरनाक ढंग से लगातार नीचे जा रहा है। भूमिगत जल विभाग की ताजा रिपोर्ट बताती है कि इसमें औसत गिरावट 2010-11 की 73 सेमी. से बढ़कर पिछले वर्ष 84 सेमी. तक पहुंच चुकी थी।

भूमिगत जल के उपयोग के मामले में भारत दुनिया में अव्वल है। देश की आधी से ज्यादा सिंचित कृषि, और पीने के पानी की 85 फीसदी आपूर्ति इसी पर निर्भर करती है। ग्रामीण और शहरी भारत में पानी के स्रोत काफी सीमित हैं। पानी की बढ़ती मांग पूरी करने के लिए पिछले पांच दशकों में पूरे देश में लाखों निजी कुओं की बगैर सोचे-विचारे खुदाई हुई।  इससे भूमि जल स्तर घटा और कई तरह की सामाजिक व आर्थिक परेशानियां भी बढ़ीं। पर्यावरणीय खबरों की एक वेबसाइट 'द थर्ड पोल' में जेम्स फेन लिखते हैं, 'प्रमुख उत्तर भारतीय राज्यों राजस्थान, पंजाब, हरियाणा और राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में अब भी भूमिगत जल का अंधाधुंध दोहन हो रहा है, जबकि नासा और भारतीय वैज्ञानिकों ने पांच वर्ष पहले ही समस्या की गंभीरता के बारे में बता दिया था।'

पानी को लेकर लोगों का यह रवैया कई वजहों से टिकाऊ नहीं कहा जा सकता। फिलहाल भूमि जल का जिस तरह उपयोग हो रहा है, उससे जल संकट वाले इलाकों के लोगों की जिंदगी दिनोंदिन मुश्किल होती जा रही है। इससे न सिर्फ सामाजिक तनाव बढ़ेगा, बल्कि लोगों की आजीविका पर भी असर पड़ेगा। जाहिर है, इसका सबसे ज्यादा असर गरीबों पर होगा। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि जल समस्या का समाधान क्या है। पानी भारतीय संविधान की समवर्ती सूची का विषय है। इसलिए इस पर कानून बनाने का हक केंद्र और राज्य, दोनों को है। मगर अमूमन भूमिगत जल पर नियंत्रण राज्य सरकारें ही रखती हैं।


राज्य सरकारें इसके दोहन पर कड़े फैसले लेने से बचती हैं, क्योंकि उन्हें उन किसानों की नाराजगी का डर है, जिन्हें सिंचाई के लिए पानी की जरूरत होती है। मगर राज्य सरकारें हर उस जगह रेन वाटर हार्वेस्टिंग (वर्षा जल संचयन) को अनिवार्य तो बना ही सकती है, जहां भी भूमि जल के लिए नई खुदाई हो। यह समझना होगा कि जमीन के अंदर तक पानी पहुंचाना भी जरूरी है। वर्ना वह दिन दूर नहीं, जब जमीन के नीचे हमारे लिए कुछ भी नहीं होगा। फिर कमजोर मानसून वाले वर्ष में तो अकेले रेन वाटर हार्वेस्टिंग से भी कुछ होने वाला नहीं। इसके बावजूद यह तकनीक बेहद कम लागत पर पानी की कमी का समाधान पेश करती है,इसलिए सभी सरकारी और निजी इमारतों के लिए इस तुरंत अनिवार्य बना देना चाहिए।

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