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राजकवि की प्रेरणा से बदलाव

Fri, 22 Feb 2013 09:48 PM IST
शिवकुमार गोयल
शिवकुमार गोयल Updated Fri, 22 Feb 2013 09:48 PM IST
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change by inspiretion of rajkavi

धर्मग्रंथों में बताया गया है कि दूसरों की सेवा-सहायता में जीवन बिताने वाला व्यक्ति मोक्ष का अधिकारी हो जाता है। संत समान ऐसे व्यक्ति को देश-समाज में भी काफी प्रसिद्धि मिलती है। इसी से जुड़ा एक प्रसंग जैन संत हेमचंद्र सूरि का है। सौराष्ट्र के गांवों का भ्रमण करते हुए एक बार वह एक गांव में पहुंचे।

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वहां उन्होंने ग्रामीणों की दरिद्रता देखी, तो उनका हृदय करुणा से भर उठा। एक किसान दंपति ने उन्हें हाथों से बुने मोटे कपड़े की पोशाक भेंट की। संत जी ने तत्क्षण राजा द्वारा भेंट में दिए गए शाही वस्त्र उतार कर मोटे वस्त्र धारण कर लिए।
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राजकवि जब वापस राजधानी लौट कर आए, तो महाराज कुमार पाल उनके स्वागत के लिए पहुंचे। उन्होंने उन्हें मोटे वस्त्र धारण किए हुए देखा, तो वह बोले, संत प्रवर, आप राजकवि भी हैं। आपने हमारी सुंदर पोशाक त्यागकर ये मोटे वस्त्र धारण क्यों किए?
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राजन, मैं आपके राज्य के गांवों का भ्रमण कर लौटा हूं। राज्य के अधिकांश लोगों के पास फटे-पुराने कपड़े भी नहीं हैं। उन्हें दो समय भरपेट भोजन भी नहीं मिल पाता। ऐसी स्थिति में राजकवि राजसी ठाठबाट से रहे, कीमती कपड़े धारण करे, क्या यह शोभनीय है?

संत जी के वचन सुनते ही राजा की आंखें खुल गईं। उसने तुरंत गांव-गांव पहुंचकर निर्धनों को वस्त्र देने तथा उन्हें खाद्यान्न उपलब्ध कराने का आदेश दिया।

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