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क्षेत्रीय दलों से मिलती चुनौती

Tue, 13 Aug 2013 08:06 PM IST
अनुराग दीक्षित
अनुराग दीक्षित Updated Tue, 13 Aug 2013 08:06 PM IST
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challenges from regional parties

अपने अधूरे वायदे तेलंगाना का ऐलान करके कांग्रेस यूपीए-3 का सपना देख रही है, जबकि भाजपा भी मौजूदा सरकार के खिलाफ लोगों के गुस्से को अपने पक्ष में करके सत्ता का ख्वाब संजो रही है, लेकिन सत्ता पाने के लिए जरूरी जादुई आंकड़ा हासिल करना अब इतना आसान नहीं रह गया है। खासकर तब, जबकि क्षेत्रीय जनाकांक्षाएं लगातार बढ़ी हों। तेलंगाना पर कांग्रेस के ऐलान भर से अन्य नए राज्यों की पुरानी मांग भी तेज हो चुकी है। इन मुद्दों को उठाना क्षेत्रीय नेताओं की राजनीतिक मजबूरी भी है और सियासी लाभ का हथकंडा भी।

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मसलन, तेलंगाना की मांग करने वाले के. चंद्रशेखर राव को पिछले चुनाव में 39 फीसदी से ज्यादा वोट मिले थे, जबकि बोडोलैंड की आवाज उठाने वाले असम के सांसद एस के बैसीमुथियारी को कुल पड़े मतों में से 48 फीसदी वोट प्राप्त हुए, जो शरद यादव, कल्याण सिंह, सुमित्रा महाजन जैसे दिग्गज नेताओं को मिले वोट प्रतिशत के बराबर ही है। जाहिर है, यह जन आकांक्षाओं का संकेत भर है, जिन्हें समझने में हमारे बड़े राष्ट्रीय दल अक्सर विफल रहे हैं।
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ऐसे ही सामाजिक, भौगोलिक या भाषायी असंतोष ने पिछले छह दशक में नई क्षेत्रीय ताकतों को पनपने का मौका दिया है। उदाहरण के लिए, 1952 के पहले लोकसभा चुनाव में 14 राष्ट्रीय दल और 39 राज्य स्तरीय दलों ने शिरकत की थी। वहीं वर्ष 2009 के लोकसभा चुनाव में भाग लेने वाले राष्ट्रीय दल घटकर सात रह गए, जबकि राज्य स्तरीय व अन्य गैर मान्यता प्राप्त दलों की संख्या अप्रत्याशित रूप से बढ़कर 360 के पार पहुंच गई!
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पहली लोकसभा में राज्य स्तरीय दलों को केवल 34 सीटें मिली थीं, जबकि पिछले चुनाव में राज्य स्तरीय दलों के 146 सांसद चुनकर आए हैं! वर्ष 2009 के चुनाव में दोनों सबसे बड़े राजनीतिक दलों यानी कांग्रेस एवं भाजपा को महज 47 फीसदी वोट ही मिल सके, जबकि आधे से ज्यादा वोट क्षेत्रीय ताकतों के खाते में गए। साफ है कि क्षेत्रीय मुद्दों की राजनीति करने वाले दल आसानी से सत्ता तक पहुंच रहे हैं।

हालांकि यह कोई नई बात नहीं है। वर्ष 1967 के लोकसभा चुनाव में द्रमुक को तमिलनाडु की तत्कालीन सभी 25 सीटों पर रिकॉर्ड जीत हासिल हुई थी। फिर 1989 से लेकर अब तक केंद्र सरकारें भी क्षेत्रीय ताकतों के रहमोकरम पर ही चलती रही हैं। बदलते सामाजिक व आर्थिक परिदृश्य के बीच राष्ट्रीय स्तर पर छोटे दल तेजी से उभर चुके हैं।

तभी तो अगले लोकसभा चुनाव में फिर से तीसरे मोर्चे की बात की जा रही है। वरिष्ठ भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी भी किसी दल को स्पष्ट बहुमत मिलने पर संशय जाहिर कर चुके हैं। वैसे इसी मुल्क में शुरुआती करीब 17 वर्षों तक लोकसभा में मान्यता प्राप्त विपक्ष ही नहीं बन सका था। जबकि आज वहीं 40 राजनीतिक दलों की भागीदारी है। लोकसभा की 300 से ज्यादा सीटों पर ऐसी ही क्षेत्रीय शक्तियों का दबदबा है।

निस्संदेह, नीति निर्माण में क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व की भागीदारी सहायक साबित होती है, लेकिन इस बहुदलीय व्यवस्था में हालात बिगड़ते भी देर नहीं लगती। आज करीब 1,200 मान्यता प्राप्त दलों में से केवल 150 ही सक्रिय हैं। कुछ दलों पर लगे संगीन आरोपों के चलते स्वयं चुनाव आयोग उनकी मान्यता समाप्त करने का अधिकार मांग चुका है। उधर, राजनीतिक अपराधीकरण को लेकर भी कई दलों पर गंभीर सवाल उठते रहे हैं। ऐसे में, कांग्रेस व भाजपा को आत्म समीक्षा की दरकार है।


क्षेत्रीय दलों को भी राष्ट्रीय मुद्दों पर अपने नजरिये को व्यापक करने की आवश्यकता है। उन्हें समझना होगा कि श्रीलंका के मसले पर विदेश नीति द्रमुक तय नहीं कर सकता! तीस्ता समझौते का भविष्य तृणमूल कांग्रेस निर्धारित नहीं कर सकती! रेल बजट सिर्फ बिहार या बंगाल का नहीं हो सकता! किसी उत्तर भारतीय के मुंबई जाने पर कोई दल रोक नहीं लगा सकता! जाहिर है, क्षेत्रीय ताकतों को परिपक्वता दिखाते हुए रचनात्मक सहयोग के साथ सामने आना होगा, तभी मुल्क का विकास संभव है। वरना ऐसे ही नीतिगत जड़ता और घोटालों के आरोप लगते रहेंगे और सरकारें गठबंधन धर्म की मजबूरी का हवाला देती रहेंगी।

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