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वैश्वीकरण को चुनौती

Sat, 25 Jun 2016 01:37 PM IST
शंकर अय्यर
शंकर अय्यर Updated Sat, 25 Jun 2016 01:37 PM IST
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Challenge to globlisation
शंकर अय्यर

वर्ष 1992 में बिल क्लिंटन ने एक बहुचर्चित टिप्पणी की थी, इट इज द इकोनॉमी स्टुपिड। यानी सारा खेल अर्थव्यवस्था से जुड़ा है। ब्रिटेन के मतदाताओं ने राजनेताओं को संकेत दिया कि वहां कोई अर्थव्यवस्था नहीं है और वास्तव में जहां राजनीति नहीं, वहां अर्थनीति नहीं है।

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बेशक ब्रिटेन के यूरोपीय संघ में रहने या नहीं रहने के फैसले पर हुए जनमत संग्रह में बहुत ज्यादा का अंतर नहीं था और मुकाबला बहुत करीबी था, लेकिन सबसे उल्लेखनीय तथ्य यह था कि जनमत बेहद बहुवचनी था। दोनों राजनीतिक संगठनों टोरी एवं लेबर पार्टी के पूरे देशभर के मतदाताओं ने ब्रिटेन के यूरोपीय संघ से बाहर निकलने के पक्ष में मतदान किया। ब्रिटेन के छोटे शहरों के सभी क्षेत्रों एवं उम्र वर्ग के मतदाताओं ने यूरोपीय संघ छोड़ने के लिए मतदान किया। इस जनमत संग्रह को बहुदलीय तख्तापलट कहा जा सकता है, क्योंकि डेविड कैमरन ने पद से हटने की घोषणा कर दी है। ऐसा प्रतीत होता है कि शीघ्र ही लेबर पार्टी के नेता जर्मी कोर्बिन का भी निष्काषन हो जाएगा। विडंबना देखिए कि दोनों उस पक्ष के साथ थे, जिसकी शर्मनाक हार हुई।
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संदेश बिल्कुल स्पष्ट है-जैसा कि यूरोप और अटलांटिक के चरम राष्ट्रवादी जश्न मना रहे हैं। इत्तफाक से उसी दिन एक नए गोल्फ कोर्स के उद्घाटन के लिए स्कॉटलैंड पहुंचे डोनाल्ड ट्रंप ने संक्षेप में टिप्पणी की कि, यह बहुत बड़ी बात है कि ब्रिटेन के लोगों ने 'अपने देश को वापस हासिल कर लिया' है। जनमत संग्रह में सवाल पूछा गया था कि क्या ब्रिटेन को यूरोपीय संघ में बने रहना चाहिए या उसे छोड़ देना चाहिए। मतदाताओं ने जवाब दे दिया कि देश को अपने भाग्य और नियति पर खुद नियंत्रण करना चाहिए।
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मुख्य सवाल अर्थव्यवस्था से उतना संबंधित नहीं था, जितना राजनीति से जुड़ा था। वास्तव में 3.3 करोड़ लोग जनमत संग्रह में इस बात को लेकर मतदान कर रहे थे कि क्या ब्रिटेन के लोगों को मध्य एवं पूर्वी यूरोप से पलायन करके आए उन तीन लाख 33 हजार लोगों के प्रवेश पर फैसला करने का अधिकार है या नहीं, जिन्होंने ब्रिटेन में रोजगार एवं आवास पर कब्जा जमाया है। जाहिर है, यह अभियान रोजगार को लेकर था, जैसे महाराष्ट्र के राजनेता दूसरे प्रदेशों के लोगों के खिलाफ अभियान चलाते हैं। यह जनमत संग्रह आर्थिक अवसरों को लेकर भी था, लेकिन सबसे बड़ी बात, यह ब्रिटेन के लोगों की संप्रभुता को लेकर था।

निस्संदेह यह एक ऐसी घटना है, जिसके परिणाम अभूतपूर्व हैं। यहां तक कि नतीजे की घोषणा से पहले ही दुनिया भर के बाजार इस राजनीतिक भूकंप से हिल उठे। हमारे देश में सेंसेक्स सुधरने से पहले 1000 अंकों तक लुढ़क गया, पहले ही घंटे में निवेशकों के चार लाख करोड़ रुपये डूब गए। इससे पहले कि रिजर्व बैंक दखल देता रुपया टूटकर 68.17 प्रति डॉलर के स्तर पर पहुंच गया। इस मामले में अनिश्चितता ने संकेत दिया है कि धन डॉलर या सोने में ही सुरक्षित है।

एक बार फिर वैश्विक अर्थव्यवस्था में अनिश्चितता का माहौल है। बैंक ऑफ इग्लैंड के गवर्नर ने पहले ही प्रचार के दौरान संकेत दिया था कि ब्रिटेन यदि यूरोपीय संघ को छोड़ता है, तो 'तकनीकी मंदी' का जोखिम रहेगा। वैज्ञानिकों एवं विशेषज्ञों (उनमें बारह नोबल विजेता भी हैं) ने चेतावनी दी कि नवोन्मेष एवं अनुसंधान को इससे नुकसान पहुंचेगा। जनमत संग्रह से एक हफ्ते पहले अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने चेतावनी दी थी कि यूरोपीय संघ से अलग होने पर ब्रिटेन के लोगों के जीवन स्तर पर असर पड़ेगा, उनकी बचत का मूल्य घटेगा और जीडीपी का 5.5 फीसदी साफ हो जाएगा। ब्रेक्जिट संभवतः वैश्विक व्यापार को चोट पहुंचा सकता है, और ब्रिटेन तथा यूरोप में बेरोजगारी एवं मंदी को बढ़ा सकता है। भले ही ब्रिटेन यूरोप संघ से 2019 में बाहर निकले, लेकिन भारत और भारतीय कंपनियों (ब्रिटेन में बड़ा निवेश करने वाली) को निश्चित रूप से कयामत की भविष्यवाणी से चिंतित होना चाहिए। ब्रेक्जिट का वैश्विक प्रभाव भारत के निर्यात को चोट पहुंचाएगा। कम से कम लघु एव मध्यम अवधि के लिए यह न केवल पूंजी के प्रवाह पर असर डालेगा, बल्कि आठ फीसदी से ज्यादा के विकास दर की महात्वाकांक्षा में भी सेंध लगाएगा। ब्रिटेन का यूरोपीय संघ से अलग होना वास्तविक है और चिंताएं भी असली हैं। पर तात्कालिक चिंताओं से अलग सबसे महत्वपूर्ण चुनौती है, इस जनादेश में छिपा संदेश।

लगता है भय ने अपनी जड़ जमा ली है। अभी हाल तक भारत समेत कई देशों ने पूंजी, वस्तुओं, तकनीकी की मुक्त आवाजाही के विचार को अपनाया और लोगों की मुक्त आवाजाही पर जोर दे रहे थे। बदलती जनसांख्यिकी के चलते विकसित देश की आबादी जहां बुढ़ाने लगी, वहीं विकासशील देश में कामगारों की संख्या बढ़ने लगी और बदलती राजनीति ने माना कि यह विचार अपनाने योग्य नहीं है। चाहे हम पसंद करें या नहीं, लेकिन वैश्वीकरण के विचार को चुनौती मिल रही है और यह ट्रंप के प्रचार अभियान में अच्छी तरह से परिलक्षित होता है, जहां वह प्रवासियों को रोकने के लिए दीवार बनाने और अमेरिका एवं अमेरिकियों के हित में व्यापार नीति में बदलाव का वायदा कर रहे हैं। ऐसी ही भावना यूरोप में भी दिखी, जहां यूरोपीय संघ की विरोधी पार्टियों ने उपलब्ध सीटों के 25 फीसदी पर कब्जा जमाया।


जो सवाल बार-बार उठाया जाता रहा है, वह वैश्वीकरण के परिणामों से निपटने के बारे में राष्ट्रीय सरकारों की शक्ति को लेकर है-चाहे वह शेयर बाजारों में तबाही को लेकर हो, मुद्रा के अवमूल्यन का हो, व्यापार और विकास घटने के कारण रोजगार में कमी का हो। यह एक वैध सवाल है और चिंता का विषय भी। मजे की बात है कि ब्रिटेन जो सभी प्रमुख वादों से बच गया-फासीवाद, साम्यवाद और गणतंत्रवाद ( राजशाही को बचाकर), उसने लोकतंत्रों के लिए सबसे बड़े सवाल को झंडी दिखाई है। यही एक सवाल है, जो वैश्वीकरण के भविष्य के लिए चिंताजनक है।

  वरिष्ठ पत्रकार एवं एक्सीडेंटल इंडिया के लेखक

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