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सामूहिक संस्कृति का उत्सव

Mon, 14 Jan 2019 06:27 PM IST
Raman Singh ममता कालिया
ममता कालिया Published by: Raman Singh Updated Mon, 14 Jan 2019 06:27 PM IST
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Celebration of mass culture
कुंभ

भारत विविधताओं और बहुलताओं का देश है, यह समय-समय पर होने वाले कुंभ के आयोजन से भी स्पष्ट होता है। इस बार अर्ध कुंभ का आयोजन संगम नगरी प्रयागराज में आज से हो रहा है, जो मार्च तक चलेगा। गंगा, यमुना और सरस्वती-तीन नदियों के संगम स्थल प्रयागराज में कुंभ के आयोजन का अपना एक खास और अनूठा महत्व है। यहां देश भर के ही नहीं, बल्कि विदेशों से भी बहुत से लोग पवित्र नदी में स्नान करने आते हैं। इसे एक विशाल आध्यात्मिक अनुष्ठान माना जाता है, लेकिन इसका आध्यात्मिक महत्व ज्यादातर धर्म से जाकर जुड़ जाता है। इस बार के कुंभ की एक खास विशेषता यह है कि यह ऋतुओं के संक्रमण काल यानी अत्यधिक ठंड से समशीतोष्ण मौसम के समकाल पर हो रहा है। लेकिन इसके साथ बहुत सारा कर्मकांड भी जुड़ जाता है, तो मुझे लगता है कि आज कर्मकांड अध्यात्म के ऊपर भारी पड़ रहा है।


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हमारे देश में नदियों को पवित्र माना जाता है और नदी में स्नान का उत्सव तन ही नहीं, मन के मैल को भी धोने का उत्सव होता है। लेकिन आज चारों तरफ ऐसा वातावरण बन गया है कि कर्मकांड को, रूढ़िवादिता को, धर्मांधता को ज्यादा महत्व दिया जा रहा है। जब मैंने पहली बार 1971 में कुंभ देखा था, तो मेरा उस समय का अनुभव है कि तब कुंभ का आयोजन ज्यादा सादा, सहज और स्वाभाविक तरीके से होता था। उस समय कुंभ के आयोजन की आध्यात्मिक गरिमा ज्यादा महसूस होती थी। तब न तो इतनी ज्यादा भीड़ होती थी और न ही इतना ज्यादा ताम-झाम होता था और जहां तक मुझे याद है, तब इस आयोजन में जिम्मेदारी के बहाने राजनेताओं का इतना ज्यादा दखल नहीं होता था। साहित्यकारों को भी उसमें बुलाया जाता था। कलाकारों को बुलाया जाता था। संगीत से जुड़े कलाकारों और उस्तादों को आमंत्रित किया जाता था। मुझे लगता है कि उस समय कुंभ का आयोजन संस्कृति से ज्यादा जुड़ा हुआ होता था। लेकिन पिछले कुछ समय से देखने में यह आ रहा है कि इसमें राजनेताओं की शिरकत और उनका दखल बढ़ गया है। मेरी समझ से कुंभ मेले का राजनीतिक इस्तेमाल गलत है। ऐसा मुझे लगता है कि जैसे-जैसे कुंभ का मेला भव्य हो रहा है, इसकी आध्यात्मिक और सांस्कृतिक गरिमा घटती जा रही है।

हमारे देश की जनता के मन में धर्म और अध्यात्म के प्रति सदियों से आस्था रही है। जनता को जब महसूस होता है कि वहां जाने से उसे जीने की शक्ति और शांति मिलेगी, वह वहां जाती है। उसे मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे और चर्च में जाने से मन को शांति मिलती है और जीने की शक्ति मिलती है, तो वह वहां जाती है और इसमें मुझे कोई बुराई नजर नहीं आती। अगर जनता को गंगा स्नान करने से शक्ति मिलती है, तो वह गंगा स्नान करती है, अगर उसे घंटों किसी मंदिर में बैठकर प्रवचन सुनने से प्रेरणा और शक्ति मिलती है, तो वह ऐसा करती है। इससे उसे शांति और सुकुन मिलता है। कुंभ का मेला एक ऐसा आयोजन है, जहां जनसमुद्र उमड़ पड़ता है। प्रयागराज में होने वाले कुंभ के मेले की भीड़ बहुत ही भव्य होती है। कहा जाता है कि कोई बच्चा अगर एक कुंभ मेले में खो जाता है, तो वह दूसरे कुंभ में ही मिलता है। यह ऐसा समागम है, जहां देश भर के लोग तरह-तरह के कष्ट सहकर पहुंचते हैं। कुंभ की भीड़ में शामिल होकर लोगों में एक सामूहिकता का भाव जगता है, उसे लगता है कि वह भी इस विशाल, बहुल और विविध संस्कृति का हिस्सा है। यहीं नहीं, इस विशाल भीड़ का अनुशासित आचरण भी देखते ही बनता है।

हमारे देश की जनता इतनी भोली और आस्थावान होती है कि उसे जो कहिए, वह मान लेती है। वहां तरह-तरह के साधु-संत प्रवचन देते हैं। अगर इस अवसर का लाभ उठाकर उन्हें स्वच्छता, शिक्षा, बालिका रक्षा, स्त्रियों के प्रति सम्मान आदि की शिक्षा दी जाए, तो मुझे लगता है कि अन्य जागरूकता अभियानों की तुलना में इसका ज्यादा असर पड़ेगा। राजनेताओं को, हमारे संत समाज को इस अवसर का लाभ उठाते हुए, जनता को अच्छे काम करने के लिए प्रेरित करना चाहिए। उन्हें चाहिए कि वे लोगों को नदियों को पवित्र रखने, स्त्रियों के प्रति आदर और सम्मान का भाव रखने, शिक्षा के प्रति जागरूक बनाने, नैतिकता का जीवन जीने और सदाचार-संयम का पालन करने के प्रति प्रेरित करें। कुंभ मेला जैसा विशाल मंच और कहां मिलेगा जागरूकता फैलाने के लिए। अगर हम इस आयोजन का इस तरह सदुपयोग करें, तो भारत को प्रगति के पथ पर तेजी से बढ़ने से कोई नहीं रोक सकता। कहते हैं कि बहुत पहले, जब आवागमन के इतने साधन उपलब्ध नहीं थे, तो साधु-संत महीनों पहले अपने आश्रमों और कुटियों से कुंभ मेले के लिए निकल पड़ते थे और रास्ते में जिस गांव में वे रुकते थे, वहां के लोगों को धर्म-अध्यात्म की शिक्षा देते हुए नैतिक व सदाचारपूर्ण जीवन जीने का उपदेश देते थे। पर मुझे लगता है कि समाज के अन्य क्षेत्रों में मूल्यों के क्षरण के साथ-साथ आज धर्म भी धूमिल पड़ा है, अध्यात्म अस्पष्ट हुआ है, धर्मांधता और कर्मकांड में बढ़ोतरी हुई है। जबकि इक्कीसवीं सदी में आते-आते, तो भारत से धर्मांधता का नाश हो जाना चाहिए था।

कहने का तात्पर्य यह है कि इस विशाल आयोजन का उपयोग समाज को जागरूक करने, उसे अस्वच्छता, अशिक्षा, जाति-वर्ग-धर्म के विभेद, लैंगिक भेदभाव के खिलाफ उठ खड़े होने के लिए प्रेरित करना चाहिए। आज हमारे पास भौतिक सुविधाएं बढ़ी हैं, लेकिन नैतिकता और मूल्यों का क्षरण हुआ है।
 
कुंभ एक बहुत बड़ा वैश्विक आयोजन है। यह भारत की विविधता को समझने का भी एक बड़ा मंच है। यहां विभिन्न रीति-रिवाज, परंपराओं को मानने वाले लोग देश भर से आते हैं और कुंभ की भीड़ को देखकर यह एहसास होता है कि हम बहुलतावादी संस्कृति के वाहक होते हुए भी एक हैं। यह विचारों की संकीर्णता से भी छुटकारा पाने और तन-मन की पवित्रता के साथ राष्ट्रीय प्रगति के लिए जरूरी सोच और ज्ञान को आगे बढ़ाने का भी अवसर है। 

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