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साइबर सुरक्षा पर सावधानी जरूरी

Sun, 14 May 2017 06:57 PM IST
पवन दुग्गल
पवन दुग्गल Updated Sun, 14 May 2017 06:57 PM IST
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Cautious on cyber security
पवन दुग्गल

दुनिया के करीब 99 देशों के हजारों कंप्यूटरों पर जो साइबर हमला हुआ है, वह मानव इतिहास में अब तक का सबसे बड़ा साइबर हमला है। इस हमले से दुनिया भर में सनसनी फैल गई और कई संस्थानों में कामकाज पूरी तरह से ठप हो गया। इस हमले ने दर्शा दिया है कि अब राष्ट्रों को संकीर्ण नजरिये से बाहर आकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सोचना पड़ेगा। इसकी चेतावनी पहले दी जा चुकी थी। पिछले साल विशिष्ट विशेषज्ञों ने चेतावनी दी थी कि 2017 में रैंसमवेयर बहुत तेजी से बढ़ेगा और वह बढ़ा भी। हालांकि साइबर हमले इससे पहले भी हुए हैं, लेकिन वे हमले स्थानीय स्तर पर ही होते थे, जिसमें किसी कंपनी या संस्था के कंप्यूटरों पर हमले होते थे। पर इस बार 99 देश इससे प्रभावित हुए हैं। यह हमला दर्शाता है कि अब सभी राष्ट्रों को गंभीरतापूर्वक विचार कर इससे निपटने की एक ठोस रणनीति तैयार करनी होगी।

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यह साइबर हमला रैंसमवेयर वायरस के जरिये हुआ है। रैंसमवेयर एक कंप्यूटर वायरस है, जिसके तहत आपके कंप्यूटर में आपकी इजाजत के बगैर एक प्रोग्राम आ जाता है और फिर कंप्यूटर में मौजूद तमाम डाटा पर यह ताला लगा देता है। फिर धमकी भरा यह संदेश दिया जाता है कि अगर आपको इन फाइलों को बचाना है, तो इसके लिए फिरौती चुकानी होगी। फिरौती नहीं चुकाने की स्थिति में यह कंप्यूटर के आंकड़े को बर्बाद करने की धमकी देता है। खास बात यह है कि फिरौती की रकम बिटकॉइन मुद्रा में मांगी जाती है और उसके लिए एक समय-सीमा निर्धारित की जाती है। अगर तय समय-सीमा पर रकम नहीं चुकाई जाती, तो फिरौती की रकम बढ़ती जाती है। बिटकॉइन असल में एक आभासी मुद्रा है, जिसका इस्तेमाल डिजिटल भुगतान हेतु किया जाता है। बिटकॉइन मुद्रा के लेनदेन का पता लगाना मुश्किल होता है।
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भारत भी इस हमले से अछूता नहीं रहा और हमारे देश में आंध्र प्रदेश पुलिस के कंप्यूटर भी इसकी चपेट में आ गए हैं। बताया जाता है कि आंध्र प्रदेश पुलिस के पच्चीस फीसदी सिस्टम इससे प्रभावित हुए हैं। ऐसी भी खबरें हैं कि हमारे देश की कुछ कंपनियों ने अपने आंकड़ों को बचाने के लिए फिरौती भी चुकाई है।
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यह हमला विंडो ऑपरेटिंग सिस्टम में मौजूद खामी का फायदा उठाते हुए किया गया है। इसी बीच राहत की बात यह है कि एक ब्रिटिश शोधकर्ता ने किल स्वीच के माध्यम से इस वायरस को आगे फैलने से रोक दिया है। लेकिन रैंसमवेयर से जो नुकसान हुआ था, उसकी भरपाई नहीं हो पाई। अभी तो इस हमले से प्रभावित क्षेत्रों से रिपोर्टें आ ही रही हैं।

बुनियादी रूप से देखें, तो यह साइबर सुरक्षा में सेंध का एक क्लासिक उदाहरण है। भारत समेत अधिकांश राष्ट्र इस तरह की स्थिति से निपटने में अक्षम थे। इस हमले ने बता दिया है कि इंटरनेट, जो मानव मात्र की धरोहर है, उसका दुरुपयोग कर भारी तबाही फैलाई जा सकती है। मैं इस हमले को दो दृष्टिकोण से देखना चाहूंगा। पहला, साइबर अपराधी बहुत ज्यादा शातिर हैं और वे सुरक्षा अधिकारियों से बीस कदम आगे चल रहे हैं। दूसरा, साइबर अपराधी आज डार्क नेट का प्रयोग करते हैं, ताकि उन्हें पहचाना नहीं जा सके। डार्क नेट इंटरनेट का वह हिस्सा है, जहां आप सामान्य सर्च इंजन के जरिये नहीं पहुंच सकते। इसके लिए एक विशेष टूल लेना पड़ता है, जिसे टोर कहा जाता है, जिसका नेटवर्क अज्ञात होता है और उसका पता नहीं लगाया जा सकता है।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इससे निपटने के लिए कोई साइबर कानून या संधि मौजूद नहीं है। ऐसे में कोई प्रभावी कदम नहीं उठाया जा सकता है। बिना कानून के कोई भी जांच करना जटिल जान पड़ता है। मैं 2015 से कहता आया हूं कि दुनिया को साइबर कानून और सुरक्षा पर एक अंतरराष्ट्रीय कानून और संधि की जरूरत है। बेशक आज दुनिया का माहौल काफी विवादग्रस्त है, पर अगर हम उन सिद्धांतों पर शुरुआती पहल करें, जिन पर लगभग सभी राष्ट्र सहमत हैं, तो इससे संबंधित संधि हो सकती है।

अब राष्ट्रीय स्तर की बात करें, तो मुझे लगता है कि साइबर सुरक्षा के लिए भारत पूरी तरह से तैयार नहीं है। भारत में न तो साइबर सुरक्षा से संबंधित कोई कानून मौजूद है और न ही रैंसमवेयर को भारत ने एक दंडनीय अपराध घोषित किया है। भारत का सूचना प्रौद्योगिकी कानून इस संबंध में कुछ नहीं कहता है। अधिकांश भारतवासी आज साइबर सुरक्षा को ज्यादा महत्व नहीं देते। भारत एक मोबाइल-इंटरनेट क्रांति के दौर से गुजर रहा है, जहां लोग प्रकाशन तो करते हैं, लेकिन अपने डिवाइस (उपकरणों) को सुरक्षित नहीं करते। भारत को विशेष कदम उठाते हुए ऐसे हमलों से निपटने के लिए विशिष्ट कानून लाना पड़ेगा और वर्तमान साइबर कानून को भी संशोधित करना पड़ेगा। भारत ने एक साइबर सुरक्षा नीति जरूर बनाई है, लेकिन वह कागजी घोड़ा बनकर रह गया है, क्योंकि उसे लागू नहीं किया गया है। हमारे देश को यह सुनिश्चित करना पड़ेगा कि अगली बार जब इस तरह के हमले हों, तो कौन-कौन से स्टेकहोल्डर क्या-क्या करेंगे, उनकी जिम्मेदारी पहले से परिभाषित हों।

 
आने वाले समय में इससे भी गंभीर हमले हो सकते हैं। इसलिए हमारी तैयारी पुख्ता होनी चाहिए। यह हमला भारत के लिए एक चेतावनी है कि वह अपनी नींद से जागे और अन्य देशों के साथ इस पर पहल करके अपने वैचारिक नेतृत्व का प्रदर्शन करे। लोग इस हमले से बहुत घबरा गए हैं, पर घबराने के बजाय सावधानी जरूरी है। कंप्यूटर का उपयोग करने वाले अपने डाटा का बैकअप रख लें। अज्ञात स्रोतों से आई मेल और उसमंे संलग्न सामग्री को न खोलें। साइबर सुरक्षा को अपने जीवन का अभिन्न हिस्सा बनाएं। तभी हम ऐसे हमलों से होने वाले नुकसानों को कम से कमतर कर सकेंगे। 

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