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चुनौतियों को पीठ दिखाता प्रचार
अनंत मित्तल
Updated Mon, 12 Oct 2015 07:45 PM IST
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बिहार में विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान विकास के मुद्दे का धूमिल पड़ना और जातिवाद तथा निजी हमलों का हावी होना बेहद चिंताजनक है। इससे स्पष्ट है कि सभी राजनीतिक दल राज्य की जमीनी हकीकत यानी कमरतोड़ गरीबी और सामाजिक पिछड़ेपन की चुनौती को पीठ दिखा रहे हैं। बिहार के गांवों में 65 फीसदी आबादी भूमिहीन है और निजी क्षेत्र में राज्य में सबसे बड़े उद्योग बीयर बनाने के कारखाने भर हैं। राज्य की अर्थव्यवस्था बड़े पैमाने पर अपने प्रवासी कमेरे बेटों के मनीऑर्डर पर निर्भर है।
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बिहार में कुल ग्रामीण आबादी में से 6.5 करोड़ लोगों के पास सूई की नोक के बराबर भी जमीन नहीं है। गांवों में सरकारी नौकरी कुल ग्रामीण आबादी में से पूरे चार फीसदी को भी मयस्सर नहीं है। राज्य की कुल ग्रामीण जनसंख्या में से 40 फीसदी लोग विकट महंगाई के इस युग में हर महीने दस हजार रुपये भी नहीं कमा पाते। इसी वजह से बिहार के गांवों में दोपहिया अथवा उससे बड़े निजी वाहन वाले परिवारों की संख्या भी मात्र पौने बारह फीसदी ही है। ये आंकड़े राज्य में पिछली सरकारों द्वारा विकास और सामाजिक न्याय के दावों को झूठा साबित कर रहे हैं। आचार्य विनोबा भावे के भूदान आंदोलन में देश में सबसे अधिक भूमि बिहार के जमींदारों ने ही दान की थी। उसके बावजूद राज्य के एक करोड़, 15 लाख परिवारों के पास झोपड़ी बनाने लायक जमीन नहीं है। यानी करीब साढ़े छह करोड़ लोगों का पेट दिहाड़ी मजदूरी या मनीऑर्डर के सहारे पल रहा है।
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बिहार के ग्रामीण इलाकों में 2.61 प्रतिशत घरों में ही फ्रिज है, जबकि देश में फ्रिज वाले ग्रामीण घरों का औसत ग्यारह फीसदी है। इस पिछड़ेपन का दूसरा कारण बिहार के गांवों में बिजली की किल्लत होना भी है। गांवों में व्याप्त बेकारी, गरीबी और बिजली की कमी बिहार में बच्चों को पढ़ाई-लिखाई से भी वंचित कर रही है। इसीलिए दस करोड़ से अधिक आबादी वाले प्रदेश में छह लाख विद्यार्थी भी सालाना स्नातक स्तर की पढ़ाई नहीं कर पाते।
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इन आंकड़ों ने सरकारी कल्याण योजनाओं की निरर्थकता और प्रशासनिक प्रयासों से देश में गरीबी दूर होने के राजग और संप्रग, दोनों ही सरकारों के दावों की भी पोल खोल दी है। वर्ष 2004 के लोकसभा चुनाव से पहले वाजपेयी सरकार ने दावा किया था कि गरीबों की संख्या घटकर 24 फीसदी रह गई। संप्रग की मनमोहन सिंह सरकार ने पिछले साल दावा किया कि उनके दस साल के कार्यकाल में करीब दस फीसदी लोग गरीबी रेखा से ऊपर उठ गए। पर 2011 की जनगणना के मुताबिक, देश में गरीबों की संख्या कुल आबादी का करीब एक-तिहाई यानी 32 फीसदी से अधिक है।
ऐसे बदतर हालात के बावजूद देश के इस सबसे जागरूक राज्य में राजनीतिक विमर्श फिर से जातिगत भंवर में फंसकर छिछले आरोप-प्रत्यारोप की बलि चढ़ रहा है। साफ है कि बिहार को गरीबी, पिछड़ेपन और जातिगत वैमनस्य के दलदल से निकाल कर विकासोन्मुख करने के बजाय नेताओं का असल मकसद गरीबों के पेट की आग पर राजनीतिक रोटियां सेंकना है। वर्ना न तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को राज्य के लिए सवा लाख करोड़ रुपये के वित्तीय अनुदान की घोषणा के बावजूद बिहार के नेताओं के राजनीतिक डीएनए में खोट निकालने अथवा उनकी तुलना शैतान से करने की जरूरत पड़ती और न ही उन नेताओं द्वारा प्रतिवाद में उन्हें व उनके साथियों को ब्रह्मपिशाच अथवा नरभक्षी बताने की नौबत आती।