ओ मेरे सपनों के सौदागर
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हिंदी सिनेमा ने सपने को लेकर तमाम सुपर डुपर हिट गाने बुने हैं। सपनों में
दरअसल मैं भी उस उपजाऊ भूमि उन्नाव से हूं, जहां जमीन में छिपे सोने से पूरे देश ने अपनी दरिद्रता दूर करने का सपना सजा लिया है। यह अलग बात है कि मेरे पूर्वज वहां की जमीन-जायदाद बेचकर लखनऊ जा बसे। उन्हें अंदर की बात पता नहीं थी। हां, लखनऊ-कानपुर के बीच छोटे से जिले उन्नाव के एक युवक चंद्रशेखर ने देश को आजाद कराने का सपना जरूर देखा था, जो पूरा हुआ है।
कहावत है, घर बसा नहीं, मंगते पहले आ गए। उधर किले की जमीन पर फावड़े की चोट भी नहीं पड़ी थी, भाई लोग नोट गिनने लग गए। कोई यह गणित लगा रहा था कि अगर इतना सोना रुपये में बदला जाए, तो कितना हो जाएगा। किसी ने रुपये की मजबूती को लेकर डॉलर को चुनौती देनी शुरू कर दी थी। लड़खड़ा कर गिरा बाजार उठने को बेताब दिखने लगा।
टीवी चैनलों ने टीआरपी बढ़ाने का सपना देख डाला है। उन्हें लग रहा है कि जब गड्ढे में फंसे बच्चे की लाइव खुदाई दिखाकर मोटी कमाई हो सकती है, तो इस खुदाई से क्यों नहीं? इसे देखकर पूरी दोपहर सास-बहू के चक्कर में काट देने वाली महिलाएं सोने के कंगन और हार का सपना जरूर देखने लग जाएंगी। ऐसा ही हो रहा है। सोने की चमक देखने के लिए महिलाएं आस्था और विश्वास के साथ टीवी स्क्रीन से चिपक गई हैं।
जमीन से सोना निकलेगा या नहीं, इसका पता नहीं, पर नेताओं को लोकसभा चुनाव का एक मुद्दा मिल गया है। कोई कहने लगा जमीन मत खोदो, विदेश में जमा सोना ले आओ। कोई कहता है कि सपने देखने चाहिए, तो किसी को सपनों से परहेज है। कोई कह रहा है कि खुदाई बंद होनी चाहिए, तो कोई खुदाई में निकलने वाले सोने को अपनी थाती बता रहा है।
देश की जनता भी कनफ्यूज है। भोले-भाले लोगों को लगने लगा है कि देश को संभालना अब इन राजनेताओं के बस की बात नहीं है। ऐसे में छप्पर फाड़कर मिलने वाला सोना ही देश की आर्थिक दशा को पटरी पर ला सकता है। देखिएगा, उनकी आंखों में पल रहा सपना टूटने न पाए।