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आज अगर यह कहें कि भारत के शीर्षस्थ नेताओं में सबसे ज्यादा बोझ राहुल गांधी के कंधों पर ही है, तो इसमें अतिशयोक्ति नहीं है। उन पर 125 वर्ष पुरानी पार्टी को पुनर्जीवित करने का बोझ है, जिसके कैडर में विरोधियों से लड़ने की प्रेरणा, उत्साह और जज्बा बिल्कुल ही नहीं दिखता। बल्कि हाल के वर्षों में यह कैडर डरपोक और चापलूस लोगों की ऐसी भीड़ बनकर रह गया है, जिसके लिए आम जनता के मन में न तो कोई सम्मान बचा है, न ही भरोसा। राहुल पर बोझ उस परिवार की परंपरा को आगे ले जाने का भी है, जो नेताओं की पांच पीढ़ियां तो दे चुका है, लेकिन अब उनका करिश्मा और आकर्षण ढलान पर है। उन पर एक ऐसे शख्स से टक्कर लेने की भी जिम्मेदारी है, जिसे न केवल खेल के सारे नियम पता हैं, बल्कि उसे मीडिया और उद्योगपतियों के बड़े वर्ग का समर्थन भी प्राप्त है। अपने राज्य का तीसरी बार मुख्यमंत्री बना यह शख्स अपनी पार्टी के वरिष्ठों को धता बताते हुए न केवल पार्टी का एकमेव चेहरा बनकर उभरा है, बल्कि देश भर में यह छाप छोड़ने की कोशिश भी कर रहा है कि भारत को तमाम संकटों से बचाने में केवल वह ही सक्षम है।
भारतीय राजनीति में उठ रही उस नई लहर से निपटने का बोझ भी राहुल पर ही है, जो न केवल जनता के मोहभंग और निराशा का फायदा उठाने की कला में पारंगत है, बल्कि यह भी जानती है कि सारे नियम-कायदों को ताक पर रखते हुए अपनी अपरंपरागत और जुझारू राजनीतिक शैली से लाखों आम लोगों की उम्मीदों के रथ पर कैसे सवार हुआ जाता है। वह राजनीति के महारथियों से टकराने की हिम्मत दिखाने के साथ-साथ भ्रष्टाचार मुक्त और सच्चे अर्थों मे स्वराज पाने की बात भी कर रही है। नई आर्थिक योजनाओं के जरिये देश के वंचित वर्गों और अल्पसंख्यकों को येन-केन-प्रकारेण रिझाने की जिम्मेदारी भी राहुल पर ही है, ताकि उनकी पार्टी इन वर्गों के वोट पा सकें। उन पर हर सुबह अखबारों और टेलीविजन से आने वाली उन सुर्खियों की बौछारों का सामना करने का भी बोझ है, जो लोकसभा चुनाव में उनकी पार्टी की चूलें हिलने की लगातार भविष्यवाणी कर रही हैं। बावजूद इसके उन गुस्ताख उम्मीदों का क्या करें, जो अब भी कहती हैं कि लोगों का दिल जीतते हुए हार के जबड़े से जीत निकाली जा सकती है।
बड़ा सवाल यह है कि क्या राहुल गांधी में वह हौसला और आत्मविश्वास है, जिसकी बदौलत वह सारे आकलनों को झुठलाते हुए नेहरू-गांधी परिवार के चौथे प्रधानमंत्री बन सकें। इस सवाल का जवाब तो चुनाव का नतीजा ही देगा। वैसे लालू प्रसाद यादव ने एक बार कहा था, 'प्रधानमंत्री वही बन सकता है, जिसके ललाट में लिखा है।'
कांग्रेस के भीतर जिन सांगठनिक बदलावों को लाने की राहुल कोशिश कर रहे हैं, उनके दूरगामी फायदे हो सकते हैं। लेकिन आने वाले महीनों में क्या इससे वाकई कुछ फर्क पड़ेगा? शायद नहीं।
राहुल को यह कटु सच्चाई जाननी चाहिए कि युवा, बुद्धिमान, ईमानदार, नेकनीयत, ऊर्जावान, विदेशों में शिक्षित, मशीनों को समझने वाले जिन सहयोगियों से वह घिरे हैं, वे पार्टी को वोट नहीं दिला सकते, क्योंकि उन लोगों के पास राहुल की सफलता को लेकर कोई नवीन, दूरदर्शी और उचित सलाह नहीं है। चूंकि उन लोगों ने खुद चुनाव नहीं लड़ा है, इसलिए वे आम लोगों से भी नहीं जुड़े हैं और उनकी भावना नहीं समझते।
यह समझना होगा कि मतदाता कांग्रेस को सिर्फ और सिर्फ बतौर नेता राहुल को लेकर अपनी धारणा के आधार पर वोट देगी। यह धारणा इस पर निर्भर होगा कि राहुल उनके लिए क्या कर सकते हैं, उन्हें उन पर कितना भरोसा करना चाहिए, वह दूसरे नेताओं से कितने अलग हैं और क्या वह अपने किए वायदों को पूरा कर सकते हैं। पिछले वर्ष की जून-जुलाई में जब प्याज और आलू की कीमतों में बेतहाशा वृद्धि हुई और वे क्रमशः 90 और 40 रुपये प्रतिकिलो की दर से बिकने लगे, तो महज 40 रुपये प्रतिदिन की कमाई करने वाले आम भारतीयों की चिंता यह थी कि वह अपने परिवार को क्या खिलाएगा? उसे सूचना के अधिकार या व्हिसल ब्लोअर विधेयक या बृहस्पति की एस्केप वेलोसिटी से कोई मतलब नहीं था। आखिर हो भी क्यों न, भूखे भजन न होई गोपाला!
धारणा के मोर्चे पर कांग्रेस को जबर्दस्त मात मिली है। दीगर है कि 1980 के दशक में बिना किसी सुबूत और न्यायिक फैसले के बिना वीपी सिंह ने 'गली-गली में शोर है, राजीव गांधी चोर है' का नारा दिया था, जिस वजह से कांग्रेस को सत्ता से बाहर होना पड़ा था, क्योंकि आम लोगों की धारणा कांग्रेस के खिलाफ थी। आज यह राहुल के लिए दुखद है कि भले ही उन पर कोई दाग नहीं है, लेकिन उनकी पार्टी के बारे में यह धारणा बन चली है कि कांग्रेस भ्रष्टाचार की गढ़ है। लोकपाल विधेयक पास कराने के बावजूद राहुल की यह छवि नहीं बन सकी कि वह भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग छेड़ सकते हैं।
इन सबके बीच सवाल यही है कि इस अंधेरी सुरंग में उम्मीद की किरण किधर है। यह रोशनी इंदिरा गांधी से आ सकती है। एक कमजोर, गूंगी गुड़िया कहे जाने के बाद भी इंदिरा ने शक्तिशाली विरोधियों को पटखनी दी। वीवी गिरि को राष्ट्रपति बनवाने के लिए उन्होंने पार्टी में दोफाड़ करवाई और 1977 के चुनाव में मिली करारी हार के बाद 1982 में बड़ी ताकत बनकर फिर से सत्ता पर काबिज हुईं। क्या राहुल अपने दादी का अनुकरण कर सकते हैं? वैसे महज इंदिरा का जीन राहुल में होने की वजह से ऐसा नहीं हो सकता, राहुल को खुलकर नेतृत्व संभालना होगा, भयमुक्त होकर सियासत के मैदान में उतरना होगा और आग में पकना होगा। इसका कोई संक्षिप्त रास्ता नहीं है। आखिर राहुल के पास खोने के लिए है भी क्या?