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चुनावी दबाव का बजट

Fri, 01 Feb 2019 08:48 PM IST
Raman Singh परंजय गुहाठाकुरता
परंजय गुहाठाकुरता Published by: Raman Singh Updated Fri, 01 Feb 2019 08:48 PM IST
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Budget of Electoral pressure
पीयूष गोयल

नरेंद्र मोदी सरकार का यह आखिरी बजट पूरी तरह चुनावी बजट है। मूलतः यह अंतरिम बजट है, इसलिए बजट से पहले आर्थिक सर्वेक्षण पेश नहीं किया गया। लेकिन चूंकि आगामी मई में नई सरकार आनी है, ऐसे में, होना तो यही चाहिए था कि बड़े आर्थिक फैसले आने वाली सरकार के लिए छोड़ दिए जाते। यही परंपरा है। सवाल यह है कि अंतरिम बजट में ताबड़तोड़ घोषणाओं की जरूरत और जल्दी क्यों थी। लेकिन यह सरकार हर काम अलग ढंग से ही करती है।


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अंतरिम बजट की तीन घोषणाएं बेहद महत्वपूर्ण हैं, और सरकार की महत्वाकांक्षा के बारे में ही बताती हैं। उसने दो हेक्टेयर तक की जोत वाले किसानों को तीन किस्तों में छह हजार-यानी महीने में पांच सौ रुपये-देने की घोषणा की है। तेलंगाना और ओडिशा की सरकारें भी किसानों को इससे अधिक की आर्थिक मदद दे रही हैं। दरअसल कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने पिछले दिनों किसानों के लिए न्यूनतम आय की जो बात कही, उसने सरकार को दबाव में ला दिया और उसी के तहत उसने यह कदम उठाया। इसे एक बड़ा कदम बताया जा रहा है, लेकिन भूमिहीन किसानों को, अपने यहां जिनकी संख्या बहुत अधिक है, इससे कोई लाभ नहीं मिलने वाला।

ऐसे ही पांच लाख तक की व्यक्तिगत आय तक आयकर छूट एक बड़ी घोषणा है। हालांकि इसकी गहराई में जाएं, तो पता चलता है कि इसमें पांच लाख से कम की व्यक्तिगत आय पर ही आयकर छूट का लाभ मिलेगा, उससे अधिक की आय पर नहीं। यह अलग बात है कि आयकर छूट हासिल करने के लिए किए जाने वाले तमाम निवेश किए जाएं, तो ज्यादा लाभ मिलेगा। लेकिन यहां मैं इससे जुड़ी एक दूसरी विसंगति की ओर ध्यान दिलाना चाहूंगा। थोड़े दिनों पहले सरकार ने आर्थिक आरक्षण की घोषणा की, जिसके तहत सालाना आठ लाख रुपये तक की आय वाले गरीब हैं, इसलिए आरक्षण के हकदार हैं। अब सरकार ने पांच लाख तक की आय वाले को आयकर के बोझ से मुक्त कर दिया। यानी हम एक ऐसी व्यवस्था में रह रहे हैं, जिसमें गरीबी के दो मानक हैं। असंगठित क्षेत्र के कामगारों के लिए पेंशन योजना कागज पर बहुत आकर्षक लगती है, लेकिन व्यावहारिक धरातल पर इस पर अमल करा पाना कठिन है। इसकी वजह यह है कि साठ साल की उम्र के बाद तीन हजार रुपये पेंशन पाने के लिए हर महीने पैसे जमा करना इन कामगारों की इच्छाओं पर निर्भर है। इस क्षेत्र की संरचना ही ऐसी है कि उसमें सरकार की किसी योजना को लागू करवा पाना अव्यावहारिक है।

सरकार के साथ मुश्किल यह है कि वह अर्थव्यवस्था की उपलब्धियां गिनाते हुए अपनी कमियां छिपा रही है। वित्त मंत्री ने बजट भाषण में बार-बार कहा कि अर्थव्यवस्था निरंतर मजबूत हो रही है। उन्होंने बेरोजगारी के बारे में कुछ क्यों नहीं कहा। अगर अर्थव्यवस्था सचमुच मजबूत हो रही है, तो बेरोजगारी की दर पिछले पैंतालीस साल में सबसे अधिक क्यों है? हद तो यह है कि राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग द्वारा बेरोजगारी पर दिए गए आंकड़े के बारे में नीति आयोग यह कह रहा है कि कैबिनेट ने इस रिपोर्ट को मंजूरी नहीं दी है। जबकि कैबिनेट कभी इसे मंजूरी नहीं देती। नोटबंदी के दौर में भी अर्थव्यवस्था के मजबूत होने के दावे किए जा रहे हैं। कई मोर्चों पर सरकार के दावों और सच्चाई में फर्क है। जैसे एलईडी बल्ब के बारे में सरकार कुछ कह रही है, आंकड़ा कुछ बताता है, प्रधानमंत्री आवास योजना में भी यही है। सरकारी आंकड़ों के प्रति विश्वसनीयता इस तरह पहले कभी नहीं घटी थी।

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