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अर्थव्यवस्था को गति देने वाला बजट
Fri, 01 Feb 2019 08:53 PM IST
Raman Singh
सी एम वासुदेव
सी एम वासुदेव
Published by: Raman Singh
Updated Fri, 01 Feb 2019 08:53 PM IST
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पीयूष गोयल
कार्यकारी वित्त मंत्री पीयूष गोयल ने जो अंतरिम बजट पेश किया, वह पूरी तरह से आगामी लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है, जिसमें किसानों, मध्यवर्ग, वेतनभोगी समूह (चाहे वे सरकारी नौकरी में हों या निजी क्षेत्र में), पेंशनरों, वरिष्ठ नागरिकों को लुभाने की भरपूर कोशिश की गई है। पिछले कुछ दिनों से राजनीतिक विश्लेषक और मीडिया में भी इस तरह की चर्चा थी कि चुनावी साल में सरकार बजट में लोकलुभावन घोषणाएं करेगी और ऐसा ही हुआ है। यहां एक बात मैं स्पष्ट कर दूं कि आज पेश किए बजट की मियाद तभी तक है, जब तक मौजूदा संसद की मियाद है। नई लोकसभा जब गठित होगी, तो वह साल की शेष अवधि के लिए अपना अलग बजट पेश करेगी।
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पिछले दिनों जब कुछ राज्यों में विधानसभा के चुनाव हुए, तो नतीजे सत्तारूढ़ भाजपा के खिलाफ गए थे। उससे सरकार को यह अंदाजा लग गया होगा कि ग्रामीण क्षेत्रों में और मध्यवर्ग में काफी नाराजगी और असंतोष का भाव है। उसी के मद्देनजर सरकार इस अंतरिम बजट को लोकलुभावन बनाने पर बाध्य हुई है। अब इसका वित्तीय अमल किस तरह होगा, यह देखने वाली बात होगी। मोटे तौर पर देखें, तो इस बजट में राजस्व जुटाने पर कोई जोर नहीं दिया गया है, और जो भी घोषणाएं हुई हैं, वह अतिरिक्त खर्च ही है। वैसे तो यह बजट मात्र दो महीने तक ही चलेगा, क्योंकि 31 मार्च तक तो मौजूदा बजट ही चलेगा और उसके बाद यह बजट लागू होगा। हो सकता है सरकार ने संसाधन जुटाने के लिए कुछ और कोशिशें की होंगी और सरकार को यह भी उम्मीद होगी कि पिछले वर्षों में कर राजस्व में जो बढ़ोतरी हुई है, उससे सरकार को सहुलियत होगी। इसके अलावा जीएसटी के स्थिर होने से भी ज्यादा राजस्व संग्रह की उम्मीद सरकार को हो सकती है और उससे सरकार को ग्रामीण क्षेत्रों के लिए की गई घोषणाओं की भरपाई में कुछ हद तक मदद मिल सकती है।
इस बजट की सबसे प्रमुख बात है कि इसमें आयकर छूट की सीमा को ढाई लाख रुपये से बढ़ाकर पांच लाख रुपये कर दिया गया है। वहीं निवेश करने पर 6.5 लाख रुपये तक की आय पर कर छूट का लाभ लिया जा सकता है। ऐसा मध्यवर्गीय लोगों को लुभाने के लिए किया गया है, जिन्हें जीएसटी और विमुद्रीकरण की वजह से काफी मार पड़ी थी और वे नाराज चल रहे थे। उनकी नाराजगी खत्म करने के लिए सरकार ने इस छूट की घोषणा की है। कार्यकारी वित्त मंत्री पीयूष गोयल ने दावा किया कि इससे करीब तीन करोड़ लोगों को फायदा होगा। आयकर दाताओं की संख्या हमारे देश में कम है। पिछले कुछ वर्षों में आयकरदाताओं की संख्या में जो थोड़ा-बहुत इजाफा हुआ था, उसमें इस छूट से कमी ही आएगी, क्योंकि बहुत से लोग कर दायरे से बाहर हो जाएंगे। जहां हमारे देश में कर आधार बढ़ाने की जरूरत है, वहां पांच लाख रुपये तक की आय को कर मुक्त कर देने से कर आधार घटेगा ही, इससे दीर्घकालीन अर्थों में कर आधार कमजोर ही होगा।
वेतनभोगी तबके के लिए स्टैंडर्ड डिडक्शन को 40,000 रुपये से बढ़ाकर 50,000 रुपये कर दिया गया है। ग्रेच्युटी की सीमा दस लाख रुपये से बढ़ाकर बीस लाख रुपये की गई है, जिससे सार्वजनिक एवं निजी, दोनों क्षेत्रों के वेतनभोगी तबके को फायदा होगा। इसके अलावा 21 हजार रुपये कमाने वालों को सात हजार रुपये बोनस योजना की भी घोषणा की गई है। और काम के दौरान श्रमिकों की मौत पर छह लाख रुपये मुआवजे देने का एलान किया गया है। 60 साल की उम्र के बाद तीन हजार रुपये का पेंशन, 15 हजार सैलरी वाले मजदूरों के लिए पेंशन की भी घोषणा की गई है।
छोटे एवं मंझोले किसानों के लिए भी सरकार ने हर साल छह हजार रुपये तक आर्थिक मदद देने की घोषणा की है। इसे दिसबंर, 2018 से लागू करने की बात कही गई है। यह काफी हद तक किसानों की नाराजगी दूर करने का काम कर सकती है। मैं समझता हूं कि इससे अर्थव्यवस्था पर भी अच्छा असर पड़ेगा। किसानों के लिए जो हर साल छह रुपये आर्थिक मदद की घोषणा की गई है, उससे ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों की क्रय शक्ति बढ़ेगी तथा विनिर्माण और उपभोक्ता वस्तुओं की खपत बढ़ेगी, उससे मैन्युफैक्चरिंग एवं कंज्यूमर इंडस्ट्री को फायदा होगा। जैसे-जैसे लोगों की क्रय शक्ति बढ़ती है, वैसे-वैसे अर्थव्यवस्था को गति मिलती है। टैक्स में छूट देने से भी लोगों की क्रय शक्ति बढ़ती है।
इसमें आशंका थोड़ी यह है कि हमारा देश विकासशील देश है। विकासशील देशों में विकास ज्यादातर निवेश से होता है, जबकि विकसित देशों में खपत (उपभोग) से विकास होता है। इस बजट में उपभोग पर ज्यादा जोर दिया गया है और निवेश पर कम। इससे अल्पकाल के लिए अर्थव्यवस्था को जरूर लाभ मिलेगा, लेकिन दीर्घकालीन अर्थों में अर्थव्यवस्था के विकास के लिए निवेश से ज्यादा बेहतर उपाय नहीं है।
सवाल उठता है कि सरकार इन सारे खर्चों की भरपाई कहां से करेगी। पिछले कुछ समय से कर राजस्व में वृद्धि हुई है, हो सकता है सरकार ने उससे भी इसकी भरपाई करने के बारे में सोचा हो। इसके अलावा निवेश पर खर्च कम करके वह इन सब लोकलुभावन योजनाओं पर ज्यादा खर्च कर सकती है। सरकार इसके अलावा बाजार से भी उधार ले सकती है। लेकिन इससे राजकोषीय घाटा कम करने के लक्ष्य को थोड़ा-सा झटका लग सकता है।
कुल मिलाकर कह सकते हैं, कार्यकारी वित्त मंत्री पीयूष गोयल द्वारा पेश किया गया बजट पूरी तरह से चुनावी लाभ को ध्यान में रखकर पेश किया गया है, जिसमें समाज के विभिन्न तबकों का ध्यान रखा गया है। इसमें नाराज वोटबैंक को फिर से अपने पक्ष में लाने की स्पष्ट कोशिश दिखती है। अब देखने वाली बात है कि सरकार को आगामी चुनाव में इसका कितना राजनीतिक फायदा मिलता है, क्योंकि आज मतदाता ज्यादा सजग है, जो यह जानता है कि इतनी लोकलुभावन घोषणाएं महज चुनाव के कारण की गई हैं, अन्यथा नहीं की जातीं। आने वाले सरकार के लिए ये घोषणाएं चुनौती भी पैदा कर सकती है।