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बिन मांगी सुरक्षा की पीड़ा

बृंदा करात Updated Mon, 01 Dec 2014 02:26 AM IST
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अन्याय की मार झेल रहे लोगों को सूचना का अधिकार (आरटीआई) के तहत जानकारी मांगने के लिए बड़ी हिम्मत करनी होती है। वर्ष 2010 में जब सूचना अधिकार कार्यकर्ताओं पर हमलों का मुद्दा लोकसभा में उठाया गया था, तब कार्मिक, सार्वजनिक शिकायतें व पेंशन मंत्रालय में तत्कालीन राज्यमंत्री वी नारायणस्वामी ने इस तरह के हमलों की जानकारी होने की बात स्वीकार की थी। एक मानवाधिकार संगठन की रिपोर्ट के अनुसार, 2010 के उक्त बयान के बाद से देश भर में 12 सूचना अधिकार कार्यकर्ताओं को मौत के घाट उतारा जा चुका है।
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लेकिन ऐसी हिंसा का सामना सिर्फ कार्यकर्ताओं को ही नहीं करना पड़ता। अपने अधिकारों से वंचित किए गए आम लोगों को भी, जो इसके लिए जिम्मेदार लोगों की शिनाख्त के लिए सूचना अधिकार (आरटीआई) के तहत अर्जी दायर करते हैं, अक्सर धमकियों तथा हिंसा का सामना करना पड़ता है। ऐसी अनेक सूचनाएं हैं, जिनमें मनरेगा के मजदूरों को मजदूरी से वंचित रखने का पता लगाने के लिए आरटीआई का सहारा लेने वालों के साथ गुंडों ने मारपीट की।

ऐसे में, जसोदा बेन की हिम्मत की दाद देनी चाहिए, जिन्होंने हिम्मत करके एक ऐसा कदम उठाया है, जिससे सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोगों को मुश्किलें आ रही हैं। आरटीआई की अपनी अर्जी में उन्होंने जो मुद्दे उठाए हैं, वे गंभीरता से विचार करने की मांग करते हैं। ये मुद्दे प्रधानमंत्री के साथ रिश्ते से बनी उनकी पहचान से उठने वाले मुद्दे हैं।

अभी हाल में ही मोदी सरकार के ही एक और मंत्री ने यह टिप्पणी की कि निजी जीवन में कौन क्या करता है, मीडिया को इसमें नहीं पड़ना चाहिए। बेशक, कोई व्यक्ति, चाहे वह प्रधानमंत्री के पद पर ही क्यों न हो, विवाहित हो या न हो, तलाकशुदा हो, चाहे अपनी मर्जी से अकेला हो या न हो, ये चीजें पूरी तरह निजी दायरे में आती हैं, देश के मामलों में शायद ही उसका कोई असर पड़ेगा। पर दिक्कत तब शुरू होती है, जब किसी के मानवाधिकारों का उल्लंघन होता है।
अगर किसी स्त्री को उसका पति अपनी पत्नी मानने से इन्कार करे, तो उसे कैसा लगेगा? उस औरत को कैसा लगता होगा, जो अपने ऊपर भारी दबाव होने के चलते अपनी भावनाएं प्रकट नहीं कर पातीं।

जसोदा बेन ने अपने साक्षात्कार (मिड डे) में यह कहकर अपनी भावनाओं की फिर एक झलक दी है कि जब उनका मंगलसूत्र टूट गया, तो उन्होंने दोबारा नहीं बनवाया था। पर जब लोकसभा चुनाव में उम्मीदवारी के पर्चे भरते समय मोदी ने अपनी पत्नी के रूप में उनका नाम लिखा,तब खुशी में उन्होंने नया मंगलसूत्र बनवा लिया। उनकी इस टिप्पणी को नरेंद्र मोदी की शादी तथा जसोदा बेन के संदर्भ में मोदी परिवार के बयानों की विसंगतियों की रोशनी में रखकर देखना चाहिए।
नरेंद्र मोदी ने जब वडोदरा में अपने चुनावी शपथपत्र में पहली बार दर्ज किया कि वह शादीशुदा हैं तथा उनकी पत्नी का नाम जसोदा बेन है, उसके अगले ही दिन उनके बड़े भाई सोमभाई मोदी ने एक बयान जारी कर स्पष्टीकरण दिया था कि वह शादी किशोर नरेंद्र पर थोप दी गई थी। वह शादी कभी वास्तविकता नहीं बनी, क्योंकि विवाह के कुछ दिन बाद मोदी ने वह शादी तोड़ दी थी (इंडिया टुडे द्वारा उद्धृत)। पर जसोदा बेन का कहना कुछ और ही है। हाल के साक्षात्कार में उन्होंने कहा है कि उनका विवाह 1968 में हुआ था और वह तीन साल अपने पति के साथ रही थीं, जिसके बाद वह उन्हें छोड़कर चले गए थे।

बाल विवाह के मुद्दों पर काम कर रही महिला कार्यकर्ताएं ऐसे अनेक मामलों से रूबरू होती हैं, जिनमें बचपन में विवाह बंधन में बंधी लड़की का उसका पति वयस्क होने पर परित्याग कर देता है, और उस स्त्री के लिए मायके में लौटने के सिवा कोई विकल्प नहीं होता।

बेशक, ऐसे मामलों में लड़कों को ऐसा करने का हक है, क्योंकि इस तरह की शादी में न तो उनकी सहमति होती है, न लड़की की। ऐसे मामलों में अक्सर लड़कियों को समस्याओं का सामना करना पड़ता है, हालांकि अक्सर ऐसी लड़कियों की दोबारा शादी हो जाती है। अगर नरेंद्र मोदी की शादी ऐसी ही थी, तो उसे खुद-ब-खुद टूट जाना चाहिए था। लेकिन यहां जसोदा बेन एक विवाहिता की निशानियां अपनाए हुए हैं। अदालत का दरवाजा खटखटाने के बजाय उन्होंने अपनी पढ़ाई पूरी की और सरकारी स्कूल में शिक्षक बन गईं। यह उनके साहस का एक और सबूत है।

पर अब उन्हें इसकी कीमत चुकानी पड़ रही है। पिछले तमाम वर्षों में, जब मुख्यमंत्री के रूप में, गुजरात हिंसा के बाद, नरेंद्र मोदी को जेड श्रेणी की सुरक्षा मिली हुई थी, तब भी जसोदा बेन 'सामान्य' तरीके से अपना जीवन बिता रही थीं। चूंकि तब मोदी ने उन्हें अपनी पत्नी के रूप में मान्यता नहीं दी थी, वैसे में, मोदी की सुरक्षा बढ़ाने के बावजूद जसोदा बेन को इसके दायरे में नहीं लाया गया था।

जब जसोदा बेन को पत्नी की मान्यता से वंचित रखा गया, तब भी वह मनमाने तरीके से किया जा रहा था, और अब जब मान्यता दी गई, तब भी यह भी मनमाने तरीके से किया गया। प्रधानमंत्री द्वारा पत्नी घोषित करने के बाद जसोदा बेन पर सशस्त्र सुरक्षा लाद दी गई, जो न उन्होंने मांगी थी, और न ही जिसकी उन्हें जरूरत थी। उनकी आरटीआई की अर्जी पढ़कर दुख होता है। जसोदा बेन को,जो ऑटोरिक्शा या बस में चलने वाली जसोदा बेन को बिन मांगे तथा अनचाहे ऐसे हथियारबंद पुरुष सुरक्षा दे रहे हैं, जिनसे उन्हें खतरा ही महसूस होता है। ये लोग कारों में उनके पीछे-पीछे फिरते हैं और आग्रह करते हैं कि उन्हें 'परिवार का हिस्सा' माना जाए। उन्होंने उचित ही यह जानना चाहा है कि किस नियम के तहत इन लोगों को उनकी सुरक्षा के लिए तैनात किया गया है। उनका यह जानने की इच्छा करना भी बिल्कुल सही है कि अगर ऐसा प्रधानमंत्री की पत्नी होने के चलते किया जा रहा है, तो और कौन से नियम लागू होने चाहिए?

हिंदुत्ववादी विचारधारा जिन पारिवारिक मूल्यों को बढ़ावा देती है, वे अक्सर महिलाओं पर थोपे गए पितृसत्तात्मक मूल्य ही होते हैं। हमारे देश को ठीक शीर्ष पर आज इसका प्रदर्शन देखना पड़ रहा है।                                                                                         

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