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रिश्वतखोरी और हथियारों की होड़

Thu, 17 Jan 2019 06:43 PM IST
Bharat Dogra भारत डोगरा
Updated Thu, 17 Jan 2019 06:43 PM IST
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Bribery and arms race
भारत डोगरा

एक ओर आधिपत्य के संबंधों के कारण दुनिया में हिंसा के बुनियादी कारण व्यापक स्तर पर मौजूद हैं, दूसरी ओर निरंतर अधिक विध्वंसकारी हथियारों की बढ़ती उपलब्धता के कारण हिंसा की प्रवृत्तियां अधिक विनाशक रूप ले रही हैं। छोटे-बड़े विभिन्न तरह के विनाशकारी हथियारों के तेज प्रसार में विश्व के हथियार उद्योग की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। यह एक मोटे मुनाफे का उद्योग है, जिसमें भ्रष्टाचार या अन्य उपायों से राजनीति को प्रभावित करने की भारी क्षमता है।


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ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल ने विभिन्न उद्योगों की इस आधार पर रैंकिंग की थी कि सबसे अधिक रिश्वत कौन-सा उद्योग देता है। इसमें हथियार उद्योग को दूसरा स्थान मिला। अमेरिकी वाणिज्य विभाग द्वारा जनरल एकाउंटिंग ऑफिस से प्राप्त जानकारी के अनुसार, दुनिया भर में तमाम तरह के व्यापारों में 50 प्रतिशत रिश्वत देने के मामले हथियार के व्यापार से जुड़े होते हैं। इस रिपोर्ट में बताया गया है कि जितने मूल्य का सौदा होता है, उसका कम से कम 10 प्रतिशत रिश्वत में जाता है। यह 10 प्रतिशत भी अरबों डालर का मामला है।

हथियारों की बिक्री से जुड़े भ्रष्टाचार की बड़ी राशि प्रायः चोरी छिपे विदेशी खातों में जमा की जाती थी, पर इसका खुलासा हो जाने के डर के कारण अब इसमें बदलाव आ रहा है और ऐसे उपाय खोजे गए हैं, जिससे इस भ्रष्टाचार को दबाना और सुनिश्चित हो सके।

टैंक, बड़ी तोपों, युद्धक विमान, पनडुब्बी आदि के कारोबार में बहुत साधन संपन्न बहुराष्ट्रीय कंपनियां लगी हैं, जिनकी पहुंच सीधे सत्ता के गलियारों में है। ये कंपनियां सत्ताधारियों को इस तरह प्रभावित करती हैं कि अरबों डालर के उनके सौदे होते रहे हैं, फिर चाहे इससे विश्व का वर्तमान व भविष्य असुरक्षित ही क्यों न हो जाए।
 
इन कंपनियों व इनके दलालों के असर के कारण नि:शस्त्रीकरण के वे प्रयास आगे नहीं बढ़ पाते, जिनकी विश्व को बहुत जरूरत है। पर हथियारों से जुड़े निहित स्वार्थ व इनके गठजोड़ के राजनीतिज्ञ ऐसी असुरक्षा फैलाते हैं, जिनमें महंगे हथियार बहुत जरूरी प्रतीत होते हैं।

विश्व के सबसे विनाशकारी हथियारों को नियंत्रित करने के अंतरराष्ट्रीय समझौते आगे बढ़ने के बजाय पीछे जा रहे हैं। दूसरी ओर, छोटे और हल्के हथियारों में भी ऐसे तकनीकी बदलाव आते रहे हैं, जिनसे इनकी विनाशक क्षमता बढ़ जाए। विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा तैयार की गई ‘हिंसा व स्वास्थ्य पर विश्व रिपोर्ट’ के अनुसार, गोलियों के अधिक तेजी से, अधिक शीघ्रता से व अधिक दूरी तक फायर करने की क्षमता बढ़ी है व इन हथियारों की विनाशकता बढ़ी है।
 
एमनेस्टी इंटरनेशनल व ऑक्सफेम ने एक रिपोर्ट ‘ध्वस्त जीवन’ में कहा है, 'किसी भी अन्य हथियार की अपेक्षा छोटे हथियार अधिक लोगों को मारने, घायल करने, विस्थापित करने, उत्पीड़ित करने, अगवा करने व बलात्कार करने के लिए उपयोग होते हैं। लगभग 60 प्रतिशत छोटे हथियार सैन्य व पुलिस दलों से बाहर के क्षेत्र में हैं। केवल सैन्य उपयोग के लिए एक वर्ष में 14 अरब गोलियों का उत्पादन किया गया-यानी विश्व की कुल आबादी के दोगनी से भी ज्यादा गोलियों का उत्पादन।'

हथियारों पर बढ़ते खर्च के कारण अनेक देशों में लोगों की बुनियादी जरूरतें पूरी करने की क्षमता कम होती है। अरबों डालर के हथियारों के सौदे होते हैं, जबकि आबादी का बड़ा हिस्सा साफ पेयजल जैसी बुनियादी सुविधाओं से वंचित रहता है या कुपोषण से पीड़ित होता है।

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