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आप के मंथन से बदली राजनीति

Fri, 03 Apr 2015 07:39 PM IST
एम के वेणु
एम के वेणु Updated Fri, 03 Apr 2015 07:39 PM IST
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Brainstorm of AAP changed the politics

पिछले वर्ष लोकसभा चुनाव के दौरान वाराणसी के एक मामूली से फ्लैट में मैंने अरविंद केजरीवाल से मुलाकात की थी, जहां वह अपने चुनाव प्रबंधकों के साथ ठहरे थे। मैंने उनसे पूछा था कि बिना किसी संगठनात्मक ढांचे के आम आदमी पार्टी कैसे पूरे देश में चुनाव का प्रबंध कर रही है। तब केजरीवाल ने मुझे बताया था कि वस्तुतः 'आप' एक विचार, एक आंदोलन है, जो निश्चित ही असंगठित एवं मुक्त रूप से विस्तार कर अपनी जड़ जमाएगा। इस विचार या आंदोलन को संगठनात्मक ढांचा प्रदान करने का कोई भी प्रयास इसके बेपरवाह रवैये को सीमित करने के समान होगा, जिसके कारण इसने लोगों के मन में अपनी जगह बनाई।

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असल में केजरीवाल ने अपनी उस भविष्यवाणी को साबित किया, जब उन्होंने कहा था कि अगर आप ज्योंही आंदोलन को एक औपचारिक पार्टी संगठन का ढांचा देते हैं, तो चीजें वही नहीं रहतीं। पार्टी में चल रहा मौजूदा सत्ता संघर्ष और प्रशांत भूषण व योगेंद्र यादव के अनुचित तमाशे से, जिसके चलते उन्हें विभिन्न निर्णय लेने वाली समितियों से निकाल दिया गया, आप के विचार के आसपास पिछले डेढ़ वर्षों से निर्मित रहस्य और जादू को बुरी तरह नुकसान पहुंचा है। आप ने जिस तरह से राष्ट्रीय चेतना पर तेजी से जगह बनाई, फिर लोकसभा चुनाव के बाद उसे अस्तित्व संकट से जूझना पड़ा और फिर दिल्ली चुनाव में वह शून्य से शिखर तक पहुंची, वह किसी कहानी की तरह लगता है।
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आप को दिल्ली में मिली सफलता का राजनीतिक महत्व राष्ट्रीय राजधानी से बाहर भी महसूस किया गया, क्योंकि इतने बड़े पैमाने पर मिली जीत को आम तौर पर मोदी-शैली की राजनीति के एक बड़े प्रतिघात के रूप में देखा गया था।
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इस आश्चर्यजनक जीत के बाद आप के नेतृत्व में हमने सबसे क्षुद्र सत्ता संघर्ष देखा, जो अब तेजी से उस उच्च नैतिक आधार के लिए खतरा साबित हो रहा है, जिसे आप ने अपनाया था। मुख्यधारा की पार्टियों के आप के कटु आलोचकों ने भी स्वीकारा कि वे अपनी पार्टियों के पारंपरिक सांगठनिक ढांचे से जूझ रहे हैं। हालांकि केजरीवाल को आभास था कि जैसे ही आप अपना संगठनात्मक ढांचा तैयार करेगी, इसे भी उसी तरह के अंदरूनी सत्ता संघर्ष का सामना करना पड़ेगा, लेकिन उन्होंने सोचा नहीं होगा कि यह इतनी जल्दी हो जाएगा। चूंकि केजरीवाल अब भी पार्टी का चेहरा हैं, इसलिए वह इस आंदोलन को बचाने के लिए अन्य वरिष्ठ नेताओं की गंभीर पार्टी विरोधी गतिविधियों और पार्टी के अप्रिय प्रसंगों की सार्वजनिक सफाई से परहेज करते हुए असाधारण उदारता का परिचय दे सकते थे। आखिरकार दिल्ली की जीत से उम्मीद बंधी थी कि यह पार्टी देश के कुछ अन्य उत्तरी राज्यों में व्यवस्थित ढंग से अपने प्रभाव का विस्तार करने में सक्षम होगी। इस संभावना को एक गंभीर झटका लगा है।

आप अब किसी भी दूसरी पार्टियों की तरह ही दिखती है, जिनमें पार्टी के भीतर बहुकोणीय सत्ता संघर्ष होता है। अब तक मुख्यधारा की अन्य पार्टियों से तुलना करते हुए आप को एक अलग पैमाने से देखा जाता था। आप की राजनीति से एक खास मासूमियत और तीन वर्ष पहले शुरू हुए आंदोलन की बेपरवाह ऊर्जा जुड़ी थी। लेकिन अब यह बदल सकता है।

भाजपा या कांग्रेस में जब व्यक्तित्व आधारित सत्ता संघर्ष होता है, तो उसे सामान्य रूप से लिया जाता है। यहां तक की मीडिया में भी उसकी खास चर्चा नहीं होती। वर्ष 2013 में जब नरेंद्र मोदी ने निर्मम तरीके से पार्टी के वरिष्ठ नेता को दरकिनार कर भाजपा के प्रचार अभियान की कमान अपने हाथ में ली, तो राजनीतिक पर्यवेक्षकों ने उसकी प्रशंसा ही की थी। उस पर कोई नैतिक निर्णय नहीं दिया गया था। इसी तरह, कांग्रेस के विभिन्न गुटों के बीच सत्ता संघर्ष को भी सामान्य रूप से देखा जाता है। लेकिन जब वही सत्ता संघर्ष आप में होता है, तो सबकी नजरें टेढी हो जाती हैं, क्योंकि आप अलग होने का दावा करती है।

सांख्यिकीय विश्लेषण में हम आम तौर पर 'सरलीकरण' शब्द का इस्तेमाल करते हैं। सरलीकरण का मतलब होता है, औसत व्यवहार के करीब। हो सकता है कि भारतीय राजनीति में आप सरलीकरण की प्रक्रिया से गुजर रही हो। यदि ऐसा होता है, तो वैकल्पिक राजनीति देने की जो इसकी विशिष्टता है, वह धीरे-धीरे खत्म हो जाएगी। आप के भविष्य पर अभी कोई अंतिम फैसला देना जल्दबाजी होगी, क्योंकि यह देखना बाकी है कि यह अपने वायदों को कैसे पूरा करती है।

राजनीति में कुछ भी संभव है। यह भी संभव है कि थोड़े समय बाद केजरीवाल, प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव मिलकर काम करने का निर्णय लें। कांग्रेस जैसी स्थापित पार्टियों में भी ऐसा हो चुका है, जहां प्रणब मुखर्जी और पी चिदंबरम जैसों की पार्टी से बाहर जाने के बाद वापसी हुई थी। यह निष्कर्ष भी नहीं निकालना चाहिए कि आप में विभाजन ने वैकल्पिक राजनीति की संभावना को स्थायी रूप से खत्म कर दिया है। आप का जन्म भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के व्यापक मंथन और इस सवाल पर बहस से हुआ है कि राष्ट्रीय संसाधनों का उपयोग जनहित में किया जा रहा है या उससे कुछ लोगों की जेबें भर रही हैं। कई मायनों में राजनीति में आप के दखल से राजनीति के संचालन में कुछ स्थायी बदलाव आया है।


इसने कांग्रेस और भाजपा जैसी पार्टियों को, जिन्होंने मान लिया था कि सरकारी संस्थानों को कम पारदर्शी और आरामदायक तरीके से चलाया जा सकता है, ऐसा करने पर सोचने को मजबूर किया है। बीते तीन वर्षों में ऐसी कुछ मान्यताएं विचलित भी हुई हैं और इसमें आप के उभार का जरूर कुछ योगदान है। आप की मौजूदा दुर्दशा को भले ही मुख्यधारा की पार्टियां टकटकी लगाकर देखती हों, पर निजी तौर पर वे गंभीरता से इसका अध्ययन करती हैं कि आप उनकी नाकामी को ही प्रदर्शित कर रही है। इसलिए वे भी अपने व्यवहार में परिवर्तन को मजबूर हो रहे हैं। एक राजनीतिक दल के रूप में आप का भविष्य क्या होगा, यह मायने नहीं रखता, पर ये बदलाव बने रहेंगे। राजनीतिक मंथन जितना व्यापक होगा, उससे केजरीवाल, मोदी या सोनिया गांधी जैसे नेताओं का व्यक्तिगत भविष्य भी तय होता जाएगा।

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