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कौन, कहां, कैसे, किधर से कतरा कर निकल गया

Sat, 01 Jun 2013 09:22 PM IST
सूर्यकांत नागर
सूर्यकांत नागर Updated Sat, 01 Jun 2013 09:22 PM IST
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एक समय था जब आत्मकथा और संस्मरण लेखन न तो साहित्य का अहम हिस्सा था और न उसे इतनी लोकप्रियता प्राप्त थी। पिछले कुछ सालों में आत्मकथात्मक संस्मरणों के लेखन का चलन बढ़ा है।

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कुछ को छोड़ दें, जिनमें पीने-पिलाने और यौन संबंधों की चर्चा का ही आधिक्य है, शेष अपनी उदात्तता और श्रेष्ठता के कारण पठनीय और मननीय सिद्ध हुए हैं। आत्मकथा  साहित्य की कठिन ही नहीं, संवेदनशील विधा भी है।
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आत्मकथा लिखना दो धारी तलवार पर चलने जैसा है। अपने हाथों अपना सर्जिकल ऑपरेशन करने जैसा। स्वयं को महिमामंडित करते हुए कुछ झूठ भी परोसे जा सकते हैं। कई बार लेखक साहित्यिक पांडित्य का रौब जमाने और वरिष्ठों से अपना सान्निध्य सिद्ध करने के लिए अति व्यग्र हो जाता है।
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हाल ही में कथाकार-संपादक बलराम की आत्मकथात्मक संस्मरणों की किताब ‘माफ करना यार’ आई है। इसमें उन्होंने समकालीन, साहित्यकारों-पत्रकारों के साथ साझा किए अपने अनुभवों के बारे में लिखा है। इनमें परिवेश, परिस्थितियां और उनसे उठे सवाल प्रमुख हैं।

इस संदर्भ में तीन बातों को खासतौर पर रेखांकित किया जा सकता है- (एक) बलराम को जहां भी द्वैत दिखा, उसे निर्वसन करने में उन्होंने संकोच नहीं किया, लेकिन ऐसा करते हुए भी वे शालीन और मर्यादित बने रहे। (दो) जिन लोगों की आलोचना की, उनके उज्ज्वल पक्ष की सराहना भी पूरे मन से की। (तीन) लेखक ने स्वयं को आत्मकथा का केंद्र बिंदु नहीं बनाया।

जहां तक संभव हुआ, ‘मैं’ से दूरी बनाए रखी। लेखक ने राजेंद्र यादव, कमलेश्वर, नंदन, विद्यानिवास मिश्र, विष्णु खरे, प्रभाकर श्रोत्रिय,रवींद्र कालिया, काशीनाथ सिंह, भारती जी, चित्रा मुद्गल आदि साहित्यकारों के व्यक्तित्व-कृतित्व पर बेबाक टिप्पणियां की हैं।  यह बात साफ हुई कि बलराम मित्रों की खुलकर भरपूर मदद करते हैं, बिना मांगे।
आज जब टांग खींचने की वृत्ति अधिक है, साहित्यिक मित्रों को मंच प्रदान करना बलराम की खास खूबी है।

आत्मकथाकार ने आम संस्मरणों से भिन्न शैली और भाषा का प्रयोग किया है, जिसकी वजह से संस्मरण रोचक और पठनीय बन गए। लेखक के कथाकार रूप ने इसमें उनकी बहुत मदद की। पुस्तक में जहां एक ओर संपादकों -सह संपादकों की आपसी खींचतान, अहं और तानाशाही का जिक्र है, वहीं दूसरी तरफ अखबारी दुनिया में चलने वाली घिनौनी राजनीति का उल्लेख भी है।

वरिष्ठ संपादकों तक को घुटन, गुटबाजी और प्रबंधन के अनावश्यक हस्तक्षेप के बीच कैसे काम करना पड़ता है, इसके सटीक ब्यौरे किताब में हैं। चूंकि लेखक खुद इस प्रवाह का हिस्सा रहा है, अत: संस्मरणों की प्रामाणिकता असंदिग्ध है।
 
अधीनस्थों के साथ किए जाने वाले अमानवीय व्यवहार से संपादकों की कथित संवेदनशीलता पर भी प्रश्न चिन्ह लगा है। इस बात की ओर भी लेखक ने इंगित किया है कि जब एक साहित्यकार दैनिक अखबार का संपादक बनता है तो उसका नजरिया विशुद्ध, व्यावसायिक पत्रकार के नजरिए से भिन्न होता है।


कुछ कृतियों की विस्तृत समीक्षा से पता चलता है कि रचनाकार ने केवल हवा में तीर नहीं चलाए हैं। अलग-अलग समय लिखे इन अनुभवों में कुछ स्थलों पर दोहराव है, जो शायद संदर्भों को जोड़ने के लिए जरूरी रहा हो। जो भी हो प्रकारांतर कृति समकालीन साहित्य और पत्रकारिता के पूरे परिदृश्य से परिचित कराती है।

माफ करना यार, लेखक-बलराम
प्रकाशक-सामयिक प्रकाशन
मूल्य- 360 रुपए

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