संघ के एजेंडे पर लौटती भाजपा
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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा ने यह तय कर लिया है कि 2014 के चुनाव का प्रचार अभियान उन्हें सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को बढ़ाने के ही आधार पर चलाना है। उन्हें इसमें हिंदू वोट बैंक को पुख्ता करने की उम्मीद नजर आ रही है। भाजपा की चुनाव घोषणापत्र समिति के नवनिर्वाचित अध्यक्ष ने पिछले दिनों एक संवाददाता सम्मेलन में साफ कर दिया कि हम राम जन्मभूमि पर मंदिर का निर्माण चाहते हैं। इस पर हमारे विचारों से कोई समझौता नहीं हो सकता है। उन्होंने आगे यह भी कहा कि भाजपा के बुनियादी मुद्दों से कोई समझौता नहीं किया जाएगा। ये मुद्दे हैं-अयोध्या में भव्य मंदिर का निर्माण, संविधान के अनुच्छेद-370 को निरस्त करना, जो जम्मू-कश्मीर राज्य को विशेष दर्जा देता है, समान नागरिक संहिता लागू कराना, गो तथा रामसेतु की रक्षा (यानी समुद्री परिवहन मार्ग निकाले जाने का विरोध) और गंगा को स्वच्छ करना।
यानी संघ के उस बुनियादी एजेंडा पर भाजपा लौट रही है, जो धर्मनिरपेक्ष, जनतांत्रिक, आधुनिक भारतीय गणराज्य को, उसकी कल्पना के एक घोर असहिष्णु फासीवादी हिंदू राष्ट्र में तब्दील करने का एजेंडा है। सच्चाई यह है कि जनता ने इसे स्वतंत्रता हासिल होने के मौके पर ही शिकस्त दे दी थी और एक गणतांत्रिक संविधान को अपनाया था। इसके बाद भी इन ताकतों ने अपनी कोशिशें नहीं छोड़ी हैं। उनका यह सपना हमारे देश की सभ्यतागत प्रगति से और निरंतर उन्मुक्त हो रही भारत की कल्पना के ठीक विपरीत है। अगर अंग्रेजों ने अपनी औपनिवेशिक लूट के लिए इस देश के भूभाग को एक साथ बांधा था, तो आजादी की लंबी लड़ाई ने, हमारी जनता की चेतना और देश की एकता को चट्टानी बनाया था। स्वतंत्रता संघर्ष की जीत और उसके फलस्वरूप सामंती रजवाड़ों के भारतीय गणराज्य में घुल-मिल जाने से यह देश बना है, जो अनेक जातीयताओं का है, फिर भी एकता के सूत्र में बंधा हुआ है।
भारतीय सभ्यता तो खुद ही इस महादेश से गुजरे विभिन्न रुझानों के साझा विकास का फल है। जैसा कि जवाहरलाल नेहरू ने डिस्कवरी ऑफ इंडिया में लिखा था-भारत एक प्राचीन पांडुलिपि है, जिस पर विचार तथा स्वप्नों की परत पर परत अंकित होती गई हैं और फिर भी उनमें से कोई भी परत, उससे पहले जो अंकित किया गया था, उसे पूरी तरह से छिपा या मिटा नहीं पाती है। कविगुरु रवींद्रनाथ भी कहते हैं-आर्य और अनार्य, द्रविड़ तथा चीनी, सिथियन, हूण, पठान, म़ुगल सब घुल-मिलकर एक इकाई में विलीन हो गए हैं, और यह इकाई भारत है। ऐसे गंगा-जमुनी सभ्यतागत विकास के लिए जरूरी है कि सामाजिक तथा धार्मिक आचारों की समृद्ध विविधता को केवल स्वीकार ही नहीं किया जाए, बल्कि उनके बीच सक्रिय अंतर्क्रिया भी हो।
इस धारा के विपरीत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, जो आजादी की लड़ाई से पूरी तरह गायब ही रहा था, स्वतंत्रता संग्राम के साथ अपना रिश्ता जोड़ने के लिए सिर्फ एक ही नाम ले सकता है। यह नाम वीडी सावरकर का है। जाने-माने इतिहासकार रमेश चंद्र मजूमदार ने हिंदुत्ववादी प्रवृत्ति के प्रति अपनी तमाम सहानुभूति के बावजूद अपनी कृति, पीनल सैटलमेंट्स इन अंडमान्स में दर्ज किया है कि किस तरह सावरकर ने कालापानी से अपनी रिहाई के लिए ब्रिटिश हुकूमत से सौदेबाजी की थी। उन्हीं सावरकर ने हिंदू महासभा के अपने अध्यक्षीय भाषण में पहली बार यह विचार प्रस्तुत किया था कि भारत में दो राष्ट्र हैं-हिंदू और इस्लामी! उसके पूरे दो वर्ष बाद, मोहम्मद अली जिन्ना ने अपना द्विराष्ट्र सिद्धांत पेश कर ब्रिटिश शासकों की मदद से उस प्रक्रिया को शुरू किया था, जो भारत के विभाजन तक गई थी।
इस तरह जब राष्ट्रीय मुख्यधारा एक सर्वसमावेशी आधुनिक गणराज्य की स्थापना की ओर बढ़ रही थी, तब संघ और दूसरी हिंदुत्ववादी ताकतों द्वारा देश में एक हिंदू राष्ट्र कायम करने की तैयारी की जा रही थी। उनके सामने यह भी स्पष्ट था कि इस परियोजना को धार्मिक विद्वेष तथा घृणा के जरिये ही आगे बढ़ाया जा सकता है।
यूपीए की पहली पारी की सरकार के जमाने से ही संसद में लंबित पड़े सांप्रदायिक हिंसा-विरोधी विधेयक के खिलाफ भाजपा प्रवक्ता की हाल की बौखलाहट से इस प्रवृत्ति को आज के संदर्भ में देखा जा सकता है। भाजपा का यह कहना संदेह ही पैदा करता है कि यह विधेयक सांप्रदायिक आधार पर समाज को बांटने की कोशिश है। साफ है कि वह सांप्रदायिक हिंसा के पीड़ितों को किसी तरह की राहत मुहैया कराने, उनका पुनर्वास करने या उन्हें न्याय दिए जाने के खिलाफ है।
पिछले दिनों विश्व हिंदू परिषद ने ईसाई मिशनरियों द्वारा इलाहाबाद में आयोजित किए जा रहे एक पांच दिवसीय आयोजन के खिलाफ यह कहते हुए आंदोलन छेड़ दिया कि इसका इस्तेमाल धर्मांतरण कर लोगों को ईसाई बनाने के लिए किया जाएगा। भाजपा की स्थानीय इकाई इसके समर्थन में थी। धार्मिक विद्वेष का यह प्रदर्शन ध्रुवीकरण को तीखा करने और सांप्रदायिक तनाव पैदा करने के लिए ही किया जा रहा है, जो भारत के गंगा-जमुनी मानस के ही खिलाफ जाता है। सांप्रदायिकता भारतीय संस्कृति के गंगा-जमुनी विकास के सार को ही खत्म कर देना चाहती है। इस संदर्भ में यह जरूरी है कि वे सभी देशभक्त भारतीय, जो आधुनिक भारत के धर्मनिरपेक्ष जनतांत्रिक आधार को अपने दिलों में संजोए रखना चाहते हैं, एकजुट होकर इस चुनौती का सामना करें। सांप्रदायिकता के खिलाफ जनता की एकता को मजबूत करने की जरूरत है।