{"_id":"9ec665ffd47b0126529f7f3d8a28a692","slug":"big-size-big-problems-hindi","type":"story","status":"publish","title_hn":"बड़ा आकार बड़ी मुश्किलें ","category":{"title":"Opinion","title_hn":"नज़रिया ","slug":"opinion"}}
बड़ा आकार बड़ी मुश्किलें
रामचंद्र गुहा
Updated Sun, 07 Dec 2014 03:48 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
जांच आयोग अक्सर सरकार के ऐसे औजार होते हैं, जिनका इस्तेमाल सरकार संकट को शांत करने के लिए करती है, ताकि उसे कुछ समय मिल जाए। यह बात इतिहासकार ज्ञानेश कुदैस्य ने राज्य पुनर्गठन आयोग की रिपोर्ट के नए संस्करण के परिचय में लिखी है। यह रिपोर्ट पहली बार वर्ष 1955 में प्रकाशित हुई थी।
विज्ञापन
राज्य पुनर्गठन आयोग (संक्षेप में एसआरसी) का गठन उस अनवरत मांग के बाद किया गया था, जिसमें यह कहा गया था कि औपनिवेशिक समय में गठित प्रांतों को अब भाषा के आधार पर नए सिरे से गठित किया जाए। उस आयोग के तीन सदस्य थे-कानूनविद एस फजल अली, सामाजिक कार्यकर्ता हेमवती कुंजरू और इतिहासकार तथा राजनयिक के एम पणिक्कर। इस आयोग ने देश भर का दौरा किया, हजारों गवाहों की जांच की और सैकड़ों लोगों की लिखित गवाही ली। भाषा के आधार पर राज्यों के बंटवारे संबंधी इसकी रिपोर्ट 30 सितंबर, 1955 को सौंपी गई। इसकी सिफारिशों को काफी हद तक स्वीकार किया गया; अगले एक दशक तक तेलुगू, तमिल, मलयालम, कन्नड, मराठी और गुजराती बोलने वाले लोगों के हितों की रक्षा करने वाले राज्य अस्तित्व में आए। अन्य आयोगों की तरह राज्य पुनर्गठन आयोह मात्र समय काटने का एक औजार भर नहीं था, बल्कि भारतीय राष्ट्रवाद के विकास में भी इसका निर्णायक प्रभाव पड़ा। कुदैस्य ने ठीक ही लिखा है कि सिर्फ एक और आयोग ने एसआरसी की तरह 'भारत के राजनीतिक जीवन पर निर्णायक छाप' छोड़ी, और वह है-मंडल आयोग।
विज्ञापन
इस विषय में दिलचस्पी रखने वाले सुधी पाठकों से मेरा अनुरोध है कि वे राज्य पुनर्गठन आयोग की पुनः प्रकाशित रिपोर्ट की एक प्रति जरूर खरीदें। यहां मैं इस रिपोर्ट के उस परिशिष्ट पर रोशनी डालना चाहता हूं, जिसे के एम पणिक्कर ने लिखा है, और जिस पर लोगों का ध्यान कम ही गया है। इस परिशिष्ट का शीर्षक है, 'नोट ऑन उत्तर प्रदेश।’
विज्ञापन
पणिक्कर की मानें, तो 'संघ के सफल रूप में कार्य करने के लिए जरूरी यह है कि उसकी सभी इकाइयां समान रूप से संतुलित हों।’ उत्तर प्रदेश का विशाल आकार इस सिद्धांत का उल्लंघन करता है। वर्ष 1951 की जनगणना के अनुसार इस राज्य की जनसंख्या 6.3 करोड़ थी, यानी देश की कुल आबादी का छठा हिस्सा। तब दूसरा सर्वाधिक आबादी वाला राज्य बिहार चार करोड़ आबादी के साथ काफी पीछे था।
किसी एक इकाई या प्रांत को अनुचित महत्व न देने संबंधी प्रावधान अमेरिका में लागू किए गए, इसलिए वहां हर राज्य दो सीनेटरों को ही संसद में भेजता है; फिर चाहे उस प्रांत का आकार और वहां की जनसंख्या कितनी भी क्यों न हो। मगर दुर्भाग्य से, भारतीय संविधान में ऐसा कोई प्रावधान नहीं किया गया। नतीजतन, वर्ष 1955 में लोकसभा के 499 सांसदों में 86 सांसद उत्तर प्रदेश से थे, जबकि राज्यसभा के 216 सांसदों में 31 इसी राज्य के थे।
पणिक्कर ने लिखा है, 'बड़ी इकाई होने के कारण मिल रहे रुतबे का भविष्य में दुरुपयोग किया जा सकता है, जिसका अन्य सभी घटक इकाइयों द्वारा विरोध किया जाएगा।' आधुनिक सरकारों पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने लिखा है, 'कम या ज्यादा, सरकार उसी तंत्र से नियंत्रित होती है, जिसके पास मतों के आधार पर अंकों की मजबूत संख्या होती है।'
पणिक्कर अचंभित थे कि 'आखिर किसी इकाई को इस स्थिति में रखना, कि वह अनावश्यक रूप से राजनीतिक प्रभाव रखे, क्या वांछनीय था।' उत्तर प्रदेश के राजनीतिक प्रभुत्व की वजह से देश के अन्य राज्यों में 'अविश्वास और असंतोष की भावना' पैदा हो चुकी थी। यह न सिर्फ दक्षिण के राज्यों की नाराजगी की वजह था, बल्कि पंजाब और बंगाल भी खफा थे। अपनी व्यापक यात्रा के दौरान राज्य पुनर्गठन आयोग के सदस्यों को लगातार वर्तमान शासन प्रणाली की इस विसंगति के बारे में शिकायतें सुनने को मिलीं कि 'अखिल भारतीय मामलों में भी किस प्रकार से उत्तर प्रदेश का वर्चस्व दिखाई देता है।'
इसलिए पणिक्कर ने यह कहा कि उत्तर प्रदेश को दो हिस्सों में बांटना अनिवार्य है। राज्य के उत्तर-पश्चिम हिस्से को अलग कर मध्य प्रदेश से मिलाकर एक अलग ‘आगरा’ राज्य बनाया जा सकता है, जिसकी अनुमानित जनसंख्या 2.4 करोड़ होगी, जबकि विभाजन के बाद उत्तर प्रदेश की जनसंख्या 4.1 करोड़ होती है। यह बंटवारा भारतीय संविधान की उस बुनियादी कमजोरी को सुधारना होगा, जो पणिक्कर के मुताबिक है, 'एक इकाई और बाकियों के बीच मौजूद असाधारण असमानता।'
हालांकि यह मामला राजनीतिक वजहों से अधर में लटका रहा, मगर पणिक्कर ने इसका उल्लेख किया है कि 'उत्तर प्रदेश में कुशल प्रशासन की राह में इस राज्य का अव्यवस्थित आकार रुकावट के रूप में खड़ा है।'
यह आज भी हो रहा है। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार, उत्तर प्रदेश की जनसंख्या 19.9 करोड़ है, जबकि दूसरी सर्वाधिक जनसंख्या वाले राज्य महाराष्ट्र की आबादी करीब 11.2 करोड़ है। उत्तर प्रदेश के आर्थिक और सामाजिक संकेतकों से स्पष्ट है कि सूबे का बड़ा आकार इस राज्य की शासन व्यवस्था के पटरी पर न होने की कितनी बड़ी वजह है। हालांकि वर्ष 2000 में इसके पहाड़ी जिलों को काटकर उत्तराखंड का गठन किया गया है, बावजूद इसके राज्य का बंटवारा न सिर्फ इसके अपने हितों के लिए, बल्कि राष्ट्र हित के लिए भी महत्वपूर्ण है। मगर क्या ऐसा संभव होगा? एकमात्र प्रमुख नेता, जिन्होंने इसकी खुलकर वकालत की है, वह हैं, मायावती। उनकी सरकार ने वर्ष 2011 में उत्तर प्रदेश को विभाजित करने का एक प्रस्ताव विधानसभा से पारित किया था। दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी छोटे राज्यों की बात तो करती है, मगर पिछले लोकसभा चुनाव के बाद से, जिसमें उसे मिली भारी जीत में उत्तर प्रदेश की प्रमुख भूमिका थी, वह इस सवाल पर चुप्पी साधे हुए है।
ऐसे में, राज्य का बंटवारा कैसे किया जा सकता है? 'हरित प्रदेश' की मांग काफी दिनों से की जा रही है, जिसमें मुजफ्फरनगर, मेरठ और अन्य पश्चिमी जिलों को शामिल करने की बात है। पूर्वी जिलों को मिलाकर 'पूर्वांचल' बनाया जा सकता है। लखनऊ के आसपास के जिले 'अवध' हो सकते हैं। सांस्कृतिक पहचान के धनी अवध की तरह ही दक्षिण-पश्चिमी जिलों को मध्य प्रदेश के पड़ोसी जिलों से मिलाकर 'बुंदेलखंड' बनाया जा सकता है।
यहां यह स्पष्ट कर देने की जरूरत है कि भ्रष्टाचार, अनैतिकता और पार्टी लाइन से इतर राजनेताओं की अदूरदर्शिता जैसे कुछ अन्य कारक भी हैं, जिनकी वजह से उत्तर प्रदेश में गरीबी और कुशासन ने अपने पैर पसारे हैं। मगर प्रशासनिक और राजनीतिक इकाई के रूप में उत्तर प्रदेश का लगातार एक राज्य बने रहना निश्चय ही उसके पिछड़ेपन की एक बड़ी वजह है। उल्लेखनीय है कि इंडोनेशिया और ब्राजील जैसे देश भी, जिनकी जनसंख्या कमोबेश उत्तर प्रदेश की तरह ही है, क्रमशः 34 और 26 राज्यों में बंटे हुए हैं।
उत्तर प्रदेश चाहे दो, तीन या चार राज्यों में बंटे या न बंटे, इस पर बहस हो सकती है। मगर अविभाजित उत्तर प्रदेश सूबे के लोगों को कचोटता तो है ही, देश के लिए भी सिरदर्द है।