बैंकों को अब बदलना होगा
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
इस सूची में भी हमारी जगह चीन, दक्षिण अफ्रीका और ब्राजील के बाद ही है। पिछले दिनों वैश्विक रेटिंग एजेंसी मुडीज ने कहा कि भारतीय बैंकों के लिए दुनिया का नजरिया नकारात्मक बना हुआ है। घरेलू औद्योगिक एवं व्यावसायिक वातावरण सुधारने में बैंकों का उपयुक्त योगदान नहीं मिल रहा है। देश की आर्थिक वृद्धि में सुस्ती, ऊंची ब्याज दर और रुपये में कमजोरी के कारण बैंकों की एनपीए (गैर निष्पादित संपत्ति) बढ़ रही है।
वस्तुतः इस समय भारतीय बैंकों के सामने पांच बड़ी मुश्किलें हैं। एक, रिजर्व बैंक की कठोर मौद्रिक नीति, दो, वित्तीय प्रस्तुतीकरण सुधारने के लिए एनपीए को कम बताना। तीन, विदेशी बैंकों से प्रतिस्पर्धा में पीछे रह जाना, चार, ग्राहक सेवा में पीछे रह जाना और पांच बैंकिग सुधारों के लिए नए बेसेल-3 मानकों का जनवरी 2013 से लागू होना।
निस्संदेह भारत के राष्ट्रीयकृत एवं सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के पास कुल बैंकिंग परिसंपत्तियों का तकरीबन 70 फीसदी हिस्सा है और उनकी हालत पतली है। ये बैंक छोटे-मध्यम उद्योगों और छोटे व्यवसायियों की तुलना में बड़े उद्यमियों को तवज्जो देते हैं। सरकारी क्षेत्र के कई बैंकों के 28 से 30 फीसदी कारोबारी ऋण ऐसे कर्जदारों के पास हैं, जिनसे न्यूनतम ब्याज प्राप्त हो रहा है। यह बात बाजार मूल्यांकन से जाहिर भी होती है। निजी बैंकों का बाजार मूल्यांकन सरकारी बैंकों की तुलना में चार गुना है।
इतना ही नहीं, बैंकों के ऋण को सुरक्षित रखने से संबंधित प्रोविजन कवरेज रेशो (पीसीआर) के प्रति सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक समुचित ध्यान नहीं दे रहे हैं। वर्ष 2008 में लेहमन ब्रदर्स से जुड़े संकट के गहराने के बाद रिजर्व बैंक ने पीसीआर को बढ़ाकर 70 फीसदी कर दिया था, लेकिन सितंबर 2011 के बाद इस पीसीआर की अनिवार्यता वापस ले ली गई है। अब पिछले एक-दो वर्षों के दौरान बैंकों के पास कॉरपोरेट सेक्टर के कर्ज री-स्ट्रक्चरिंग की तादाद काफी तेजी से बढ़ी है।
चूंकि कॉरपोरेट कंपनियों के लिए मुनाफा कमाना मुश्किल हो रहा है। ऐसे में कई मामलों में यह पाया गया है कि कई बैंक कॉरपोरेट कंपनियों के लिए 15-20 फीसदी ज्यादा मुनाफा दर्शाकर कर्ज री-स्ट्रक्चरिंग का कार्य उदार शर्तों पर कर रहे है। ऐसे में बैंक एनपीए के लिए कम प्रावधान दिखा रहे हैं।
देश के बैंकों को विदेशी बैंकों से मिल रही निवेश की चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। देश में कार्यरत लगभग 41 विदेशी बैंक अधिक सरलता और कम ब्याज दर पर ऋण दे रहे हैं। पिछले महीने लोकसभा में बैंकिंग संशोधन विधेयक-2011 के पारित हो जाने से रिजर्व बैंक के लिए नए बैंकिंग लाइसेंस जारी करने का रास्ता साफ हो जाएगा। इससे विदेशी बैंकों के आने की आशंका बढ़ेगी और निजी बैंकों में निवेशकों के वोटिंग अधिकार भी बढ़ने से सार्वजनिक बैंकों की चुनौतियां बढ़ेंगी।
भारतीय बैंकों की एक मुश्किल ग्राहकों की संतुष्टि से भी जुड़ी है। कुछ वर्षों के दौरान बैंकिंग में तमाम आधुनिक सुविधाएं देने के बावजूद देश में बैंकों के प्रति ग्राहकों का विश्वास घटा है। इनके अलावा हमारे बैंकों की एक और मुश्किल नए बेसिल-3 मानकों को जनवरी, 2013 से लागू किया जाना भी है। इससे अर्थव्यवस्था के उत्पादक क्षेत्रों की कर्ज की जरूरत पूरी होने के साथ ही अर्थव्यवस्था में कायम दबाव को कम करने में भी मदद मिलेगी। इससे सरकारी बैंकों के देसी और विदेशी परिचालन को भी सहारा मिलेगा।
इन मानकों को लागू करने के पीछे उद्देश्य यह है कि भारतीय बैंकिंग की वैश्विक बैंकिंग तंत्र के परिप्रेक्ष्य में खामियां और कम हों। लेकिन इन मानकों का क्रियान्वयन ऐसे वक्त में आरंभ हो रहा है, जब देश का बैंकिंग तंत्र पहले से ही दबाव में है। ऐसे में मंत्रिमंडल ने 10 जनवरी को वित्त वर्ष 2013-14 से लेकर 2018-19 के बीच बेसेल-3 नियमों के अनुरूप पूंजी पर्याप्तता अनुपात को सुनिश्चित करने के लिए जरूरत के मुताबिक पूंजी मुहैया कराने के जिस फैसले पर सैद्धांतिक मुहर लगाई है, उसके लिए बैंकों को अपनी तैयारी सुनिश्चित करनी चाहिए। बेसेल-3 दरअसल, वित्तीय जोखिम को कम करने के लिए पूंजी पर्याप्तता के वैश्विक बैंकिग प्रावधान हैं।
ऐसे मुश्किल भरे बैंकिंग दौर में एक ओर शीघ्रतापूर्वक भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) द्वारा बैंकों के लिए तरलता की स्थिति निर्मित करनी होगी, वहीं दूसरी ओर, सार्वजनिक बैंकों को भी अपने क्रियाकलापों और कार्य नीतियों में सुधार करना होगा। बैंकों को एक कदम आगे बढ़कर ग्राहकों की जरूरतों को समझना होगा, साथ ही उनकी सुविधाओं का ध्यान रखना होगा। उन्हें पर्याप्त एनपीए व्यवस्था की तरफ ध्यान देना होगा। बड़े उद्यमियों की तरह छोटे उद्योगों एवं छोटे व्यवसायियों को भी सरलतापूर्वक ऋण देने और उनकी कठिनाइयां दूर करने का प्रयास करना होगा। साथ ही बैंकों को वैश्विक बैंकिंग चुनौतियों का सामना करने के लिए मजबूत बनना पड़ेगा।
ऐसे वक्त में जब चुनौतियां मुश्किल होती जा रही हैं, विदेशी बैंकों से प्रतिस्पर्धा के परिप्रेक्ष्य में भारत में बैंकों को ऋण कारोबार व जमा राशि बढ़ाने के लिए अपने आकार और पहुंच, दोनों का ही विस्तार करना आवश्यक है। बैंकिंग क्षेत्र में सरकार का प्रयास रहना चाहिए कि कुछ ऐसे बड़े और सक्षम बैंक खड़े किए जाएं, जो विश्व स्तर पर किसी भी बड़े बैंक के समक्ष कड़ी से कड़ी प्रतिस्पर्धा में भी टिक सकें।