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सियासी भंवर में बांग्लादेश: समय से पहले चुनाव की मांग, मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार के सामने कठिन चुनौतियां
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बांग्लादेश में प्रदर्शन करते अल्पसंख्यक
- फोटो :
अमर उजाला
विस्तार
अपनी सरकार के खिलाफ भारी विरोध प्रदर्शन के बीच जब बीते अगस्त में शेख हसीना बांग्लादेश से भाग गईं, तो उनकी धुर राजनीतिक विरोधी और दो बार की प्रधानमंत्री बेगम खालिदा जिया की प्रतिक्रिया थी, ‘हमें लोकतांत्रिक बांग्लादेश बनाना होगा।’ इससे बांग्लादेश पर नजर रखने वाले लोग हैरान रह गए, जिन्हें यह उम्मीद थी कि जिया शेख हसीना के मुल्क भागने पर खुश होंगी, जिन्होंने उन्हें 2018 से जेल में रखा और कथित रूप से उचित चिकित्सा देखभाल से वंचित रखा था। शायद, पीड़ा ने जिया को इतना समझदार बना दिया है कि अब वह फिर से राजनीतिक गतिविधि शुरू कर सकती हैं, और एक निष्पक्ष चुनाव में जीत की भी उम्मीद कर सकती हैं।
चार दशकों से अधिक समय तक सक्रिय रहने के कारण, वह जानती होंगी कि राजनीति और चुनाव उनके देश में व्यावहारिक रूप से हर चीज को संचालित करते हैं। उनकी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) ने मांग की कि भारत में निर्वासन में रह रहीं हसीना को वापस लाया जाए और उनके शासन के दौरान कई प्रदर्शनकारियों की मौत और भ्रष्टाचार के लिए उन पर मुकदमा चलाया जाए। लेकिन न तो जिया और न ही बीएनपी इस मांग का समर्थन करते हैं कि हसीना की अवामी लीग पर प्रतिबंध लगाया जाए और उसे चुनाव लड़ने से वंचित रखा जाए। राजनीतिक तर्क बताता है कि बेगम जिया चाहेंगी कि अवामी लीग के फिर से पांव जमाने से पहले चुनाव हो जाएं। बीएनपी महासचिव मिर्जा फखरुल इस्लाम ने कहा कि अवामी लीग राजनीतिक दल है और अगर वे चुनाव लड़ते हैं, तो जनता फैसला करेगी।
वास्तव में इस मुद्दे पर बीएनपी का रुख जमात-ए इस्लामी और अन्य इस्लामी समूहों से अलग है। इस्लामी समूह चाहते हैं कि अवामी लीग पर प्रतिबंध लगा दिया जाए और उसे चुनाव लड़ने नहीं दिया जाए। महत्वपूर्ण बात यह है कि यह उन छात्र नेताओं के विचारों से अलग है, जिन्होंने विरोध प्रदर्शनों का नेतृत्व किया और वर्तमान में प्रोफेसर मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार में प्रमुख पदों पर हैं। सरकार ने चुनाव सुधारों का अध्ययन करने और सिफारिश करने के लिए एक समिति नियुक्त की है, जो दीर्घकालिक प्रक्रिया है। यह मोहम्मद यूनुस के लिए दुविधा की स्थिति है, जो सुधारों के लिए उत्सुक हैं, लेकिन इसे प्रमुख खिलाड़ियों के बीच ‘आम सहमति’ के लिए छोड़ने पर तैयार हैं। उन्होंने द डेली स्टार अखबार से कहा, ‘हम कुछ भी थोप नहीं रहे हैं। हम सिर्फ व्यवस्थाएं बना रहे हैं। और अगर राजनीतिक दल तय करते हैं कि सुधार जरूरी नहीं हैं, तो चुनाव और भी जल्दी हो सकते हैं। हम शासकों की तरह काम नहीं कर रहे हैं। हम यहां सिर्फ सुविधाकर्ता की भूमिका निभा रहे हैं।’
साक्षात्कार में उन्होंने कहा कि सुधारों पर आम सहमति बनाने की कोशिश करते हुए सरकार पार्टी के ‘आकार’ के अनुसार पक्ष और विपक्ष का फैसला करेगी। छात्र और इस्लामी समूह, खासकर जमात, इसे किस तरह से लेते हैं, यह देखना होगा। जमात के लोगों ने 1971 में बांग्लादेश के उदय का विरोध किया था। मुल्क की आजादी के बाद जमात पर प्रतिबंध लगा दिया गया, जिसे सैन्य शासन के दौरान हटा लिया गया, लेकिन बाद में फिर हसीना सरकार ने प्रतिबंध लगा दिया। एक और पहलू यह है कि जमात बीएनपी की सहयोगी थी और वर्ष 2001-2006 के दौरान जिया की सरकार में उसके दो नेता महत्वपूर्ण मंत्री पदों पर थे। रिकॉर्ड पर आधारित एक सीधा आकलन यह दर्शाता है कि अवामी लीग को हराने के लिए बीएनपी को जमात एवं अन्य इस्लामी समूहों के साथ हाथ मिलाना होगा। क्या जिया उनके साथ हाथ मिलाने के लिए राजी होंगी?
इससे उन्हें अवामी लीग के मुकाबले कम लाभ होगा, जो मुल्क की सबसे बड़ी पार्टी बनी हुई है। हसीना के पलायन के बाद अवामी लीग को गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ा। इसके कई कार्यकर्ताओं को मार दिया गया या उन्हें घरों और दफ्तरों से भगा दिया गया। लीग ने पहले भी ऐसी स्थितियों का सामना किया है। हसीना की गैर-मौजूदगी और किसी परिजन के सक्षम नेतृत्व के अभाव के बावजूद अवामी लीग खुद को पुनर्जीवित करने की कोशिश कर रही है। हालांकि हाल में बैठकें आयोजित करने के इसके प्रयासों को अनुमति नहीं दी गई। जहां तक हसीना का सवाल है, यूनुस सरकार ने दबाव बनाए रखने की कोशिश की है। यूनुस और उनके अधिकारियों ने बार-बार कहा है कि वे उनके प्रत्यर्पण की मांग करेंगे।
भारत और बांग्लादेश के बीच एक प्रत्यर्पण संधि मौजूद है, लेकिन उसमें एक प्रावधान है, जो किसी पक्ष को ‘राजनीतिक कारणों से’ प्रत्यर्पण की अनुमति नहीं देता है। हसीना के खिलाफ हत्या और अन्य गंभीर अपराधों के आरोप में कई मामले दर्ज किए गए हैं। उन पर ‘युद्ध अपराधों’ के लिए मुकदमा चलाने की भी मांग की गई है, ठीक उसी तरह, जैसे उनकी सरकार द्वारा नियुक्त न्यायाधिकरण ने 1971 के आंदोलन के दौरान पाकिस्तानी सेना का सहयोग करने के आरोप में जमात के कई लोगों और एक वरिष्ठ बीएनपी नेता पर मुकदमा चलाकर दोषी ठहराया था और फांसी पर लटका दिया था। ढाका ने अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायाधिकरण (आईसीटी) और इंटरपोल से भी संपर्क किया है। यह मानते हुए कि भारत उन्हें वापस भेजने पर सहमत हो जाएगा या उनका प्रत्यर्पण आईसीटी या किसी अन्य अंतरराष्ट्रीय हस्तक्षेप से हो जाएगा, हसीना की बांग्लादेश वापसी बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन को जन्म दे सकती है। अगर ऐसा होता है, तो यह अवामी लीग को उत्साहित कर सकता है। क्या ऐसी स्थिति में भी बीएनपी चुनाव करवाना चाहेगी, यह स्पष्ट नहीं है।
बांग्लादेश की नाजुक राजनीतिक स्थिति का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि हाल ही में राष्ट्रपति शहाबुद्दीन ने खुलासा किया कि हसीना का कोई त्यागपत्र उनके पास नहीं है। इससे सभी संबंधित लोग परेशान हो गए और राष्ट्रपति को हटाने तक की मांग करने लगे। लेकिन उन्हें पद से हटाया नहीं जा सकता, क्योंकि नए राष्ट्रपति का चुनाव करने के लिए संसद ही मौजूद नहीं है। अमेरिकी डेमोक्रेटिक पार्टी ने उनका सम्मान किया था और उन्होंने अपने अमेरिकी दौरे में रिपब्लिकन पार्टी के साथ रिश्ते बनाने की कोशिश नहीं की। डोनाल्ड ट्रंप यूनुस के शासन के तहत धार्मिक अल्पसंख्यकों पर ‘बर्बर हमलों’ की कड़ी निंदा करते हुए ट्वीट करने के लिए मजबूर हुए। यूनुस ने इसे ‘निराधार’ और ‘प्रचार’ बताते हुए कहा कि यह बात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से बातचीत के दौरान कही गई थी। लेकिन ऐसी घटनाओं के जारी रहने की खबरों के कारण उनकी स्थिति कमजोर है। समय से पहले चुनाव की मांग उनकी मुश्किलें और बढ़ा रही है।