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Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Bad times, Uncle Sam AKA Trump is trapped; how is Iran fighting back despite suffering heavy losses?

अब आया ऊंट पहाड़ के नीचे: बुरा टैम, अंकल सैम; आखिर भारी नुकसान उठाने के बाद भी ईरान कैसे कर रहा है पलटवार?

Thu, 19 Mar 2026 07:37 AM IST
Pavan सुधीश पचौरी, वरिष्ठ साहित्यकार
सुधीश पचौरी, वरिष्ठ साहित्यकार Published by: Pavan Updated Thu, 19 Mar 2026 07:37 AM IST
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सार
अमेरिका को इस तरह फंसा देख बहुत-से लोगों को मजा भी आ रहा है कि अब आया ऊंट पहाड़ के नीचे, पर बहुत-से परेशान भी हैं कि जब अठारह दिन में ही दुनिया में तेल और गैस का संकट हो गया, तो आगे क्या न होगा? आखिर भारी नुकसान उठाने के बाद भी ईरान पलटवार कैसे कर रहा है?
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Bad times, Uncle Sam AKA Trump is trapped; how is Iran fighting back despite suffering heavy losses?
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप - फोटो : ANI

विस्तार

कहां तो चले थे ‘मागा’ बनाने, यानी ‘मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’ और कहां अब वह ‘होर्मुज स्ट्रेट’ में रास्ता ‘मांग’ रहे हैं। कल तक सर जी दुनिया के सबसे बड़े ‘मारते खां’ थे, अब ‘भागते खां’ नजर आते हैं और भारी बर्बादी के बाद भी ईरान है कि ताल ठोक रहा है कि आजा लड़ ले...हम आखिरी दम तक लड़ेंगे... सच! अंकल सैम, जितना मुंह था, उससे बड़ा कौर खाएगा। अब न खाए बन रहा है, न उगलते। भई गति सांप छछुंदर केरी! अंकल सैम बुरे फंसे।


अमेरिका को इस तरह फंसा देख बहुत-से लोगों को मजा भी आ रहा है कि अब आया ऊंट पहाड़ के नीचे, पर बहुत-से परेशान भी हैं कि जब अठारह दिन में ही दुनिया में तेल और गैस का संकट हो गया, तो आगे क्या न होगा? अपने बड़बोले जी कल तक हांक रहे थे कि मैंने आठ युद्ध रोके हैं, वही अब इस्राइल के साथ ईरान पर थोपे युद्ध को खत्म नहीं कर पा रहे हैं।  


अंकल सैम में हमें कई बार ‘हॉलीवुड’ के ‘सुपरमैन’, ‘स्पाइडरमैन’, ‘हीमैन’, ‘डर्टी हैरी’, ‘रेंबो’ और ‘कैप्टन अमेरिका’ तथा ‘बैटमैन’ के ‘जोकर’ व ‘मोगेंबो’ का ‘मिक्स’ नजर आता है, जिसने दुनिया को हॉलीवुड का ‘सेट’ समझ लिया है, जहां से वह दुनिया को बचाने के बहाने अपनी ‘गनबोट डिप्लोमेसी’ के जरिये उस पर ‘टोटल कंट्रोल’ कर सकता है। कुछ वक्त पहले, जो जिस-तिस को धमकाते फिरते थे कि मेरी नहीं मानी, तो टैरिफ लगाकर बर्बाद कर दूंगा, आज दुनिया के देश इस हेकडी पर मन ही मन हंसते हुए मौके के इंतजार में हैं कि कब ‘हंप्टी-डंप्टी’ जी नीचे गिरें। अपनी दुनिया दुर्भाग्य से आज ऐसे कथित महाबली के सामने है, जो गब्बर की तरह एक दिन धमकाता है कि खबरदार जो रूस से तेल खरीदा और अगले दिन कहने लगता है कि रूस से खरीद सकते हो, जैसे उसके कहे बिना कोई पानी नहीं पिएगा।  

अंकल सैम इसी मायने में लोगों को डरावने से अधिक मनोरंजक लगते हैं-कभी जेलेंस्की को बगल में बिठा कर ऐसे डांटते दिखते हैं, मानो वह बच्चा हो... ऐसे ही कभी पाकिस्तान के प्रधानमंत्री को भरी सभा में तीन बार ‘उठक-बैठक’ करा देते हैं और वे किसी बालक की तरह ऐसा करते दिखते भी हैं। पर जब से भारी नुकसान उठाने के बाद ईरान ने पलटवार शुरू किया है, तब से अमेरिकी दुर्जेयता की सारी धज बिखर गई है और अब तो ‘नाटो’ देशों से गुहार करते दिखते हैं कि ‘होर्मुज स्ट्रेट’ के लिए अपने-अपने जहाज भेजो... लेकिन ‘नाटो’ वाले सीधे ‘नो’ कहकर इस युद्ध से अपना पल्ला झाड़ रहे हैं। साफ है, अब दुनिया में अमेरिका की ‘रिट’ चलनी बंद हो रही है। कहां तो आए थे ईरान की ‘सत्ता बदलने’ व उसकी ‘न्यूक्लियरबाजी’ को ‘नष्ट’ करने, पर शीर्ष इस्लामी नेतृत्व के खात्मेे के बाद भी न अंकल सैम ईरान की इस्लामी सत्ता को बदल पाए, न ‘न्यूक्लियरबाजी’ को ही नष्ट कर पाए।

पहले आदरणीय गाते रहे कि ‘मैं चाहे ये करूं, मैं चाहे वो करूं.. मेरी मर्जी...’, कि हम दुनिया के तेल के मालिक बनेंगे...सो एक दिन वेनेजुएला के ‘मादुरो’ को उठा लिए और वेनेजुएला के तेल पर कब्जा कर लिए, फिर इस्राइल के साथ मिलकर सोचा कि ईरान को भी ‘वेनेजुएला’ बना देंगे, पर ईरान ने वेनेजुएला बनने से इन्कार कर दिया और खाड़ी में अमेरिका के मित्र देशों पर प्रत्याक्रमण करके बता दिया कि युद्ध भले तुमने शुरू किया हो, खत्म हम करेंगे... बुरा टैम, अंकल सैम! अपने अहंकार में अंकल सैम ‘सैमुअल हंटिंगटन’ की द क्लैश ऑफ सिविलाइजेशंस की सीख को ही भूल गए कि शीतयुद्ध के बाद का यह दौर ‘धार्मिक, सांस्कृतिक व सभ्यतामूलक संघर्षों’ के युद्ध का दौर है।

देखा जाए तो, ईरान इन दिनों एक धार्मिक-सांस्कृतिक-सभ्यतामूलक युद्ध ही लड़ रहा है। हो सकता है, अमेरिका के लिए यह प्रकटतः ‘आर्थिक-राजनीतिक व सामरिक’ युद्ध हो, लेकिन ईरान के लिए यह एक ‘धार्मिक सभ्यतामूलक युद्ध’ ही है। सैमुअल हंटिंगटन की उक्त पुस्तक आज की ‘बहुध्रुवीय दुनिया’ के देशों के बीच बढ़ते नए तनावों और विवादों को समझने-समझाने में काफी हद तक मददगार नजर आती है। हंटिंगटन का कहना है कि शीतयुद्ध के बाद के दौर में देशों, राज्यों या राष्ट्रों के बीच झगड़ों की अपेक्षा जनता के बीच सांस्कृतिक व सभ्यतामूलक झगड़े हुआ करेंगे...संसार में सात-आठ ‘धार्मिक व सांस्कृतिक सभ्यताएं’ हैं, जिनके बीच की ‘फॉल्ट लाइनें’ उनके ‘संबंधों’ को तय करती हैं। हंटिंगटन का यह भी कहना है कि पश्चिम को अब दुनिया के देशों को आधुनिक व जनतांत्रिक बनाने के लिए अपनी ‘दादागीरी’ करने की आदत छोड़ देनी चाहिए, क्योंकि अब जो भी तनाव या संघर्ष होंगे, वे सांस्कृतिक सभ्यतागत पहचानों के बीच ‘कॉम्पिटिशन’ के परिणाम  होंगे। इसीलिए, जैसे ही ईरान पर हमला हुआ, बहुत-से देशों में रहने वाली इस्लामी जनता ने ईरान पर हमले को ‘पश्चिमी क्रूसेड’, यानी ‘पश्चिम के धार्मिक युद्ध’ की तरह देखना शुरू कर दिया और जवाब में ‘जिहाद’ की भावना का इजहार करना भी शुरू कर दिया है।

बहुत-से कट्टरतावादियों व धार्मिक तत्ववादियों की नजर में अमेरिका और उसकी संस्कृति ‘शैतान’ का प्रतीक है। अमेरिका के ‘ट्विन टावरों’ को ध्वस्त करने के पीछे यही अवधारणा थी। आज भी बहुत-से धार्मिक तत्ववादी अमेरिका को ‘इस्लामोफोबिस्ट’ मानते हैं। इसलिए, यह लड़ाई अमेरिका के लिए प्रकटतः भले ‘आर्थिक-राजनीतिक-सामरिक’ हो, लेकिन ईरान के लिए ‘धार्मिक, सांस्कृतिक व सभ्यतामूलक’ ही है। इसीलिए, जिस युद्ध को अमेरिका चार-पांच दिन में खत्म हुआ मानता था, वह अभी तक चल रहा है। जब दुनिया इतने से ही त्राहि-त्राहि करने लगी है, तो आगे संकट और बढ़ना है। इसीलिए, ईरान बिना कहे अमेरिका के मित्रों की बांह मरोड़कर दुनिया पर दबाव बना रहा है कि वे अमेरिका को हतोत्साहित करें और शांति समझौते के लिए दबाव डालें।

इस युद्ध को हम अगर आर्थिक-राजनीतिक युद्ध की तरह देखेंगे, तो हम यह नहीं समझ पाएंगे कि इतनी भारी बमबारी के बावजूद ईरान हथियार क्यों नहीं डाल रहा? वह इसीलिए हथियार नहीं डाल रहा, क्योंकि वह स्वयं ‘पैन इस्लामिक विश्व’ का एक हिरावल दस्ता है। ईरान पर इस हमले ने दुनिया के ‘शियाओं’ और ‘सुन्नियों’ के मतभेदों को भी पीछे कर दिया है, क्योंकि दोनों की वृहत्तर पहचान तो इस्लाम ही है, जिस पर आज पश्चिम का हमला हो रहा है। जो इस युद्ध के ‘सांस्कृतिक’ मानी समझते हैं, वे यही कहते हैं कि ईरान के लिए यह नया ‘कर्बला’ है। जब पुराने ‘कर्बला’ को वे आज तक नहीं भूले, तो इस नए ‘कर्बला’ को कैसे भूलेंगे? - edit@amarujala.com
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