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कमजोर रवैये से देश नहीं चलता

Fri, 03 May 2013 09:37 PM IST
हिमांशु मिश्र
हिमांशु मिश्र Updated Fri, 03 May 2013 09:37 PM IST
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attitude not undermine country says

पाकिस्तान में सरबजीत की नृशंस हत्या से देश में गुस्से का माहौल है। इस मामले में हमारी सरकार से क्या चूक हुई और भविष्य में क्या किया जाना चाहिए, इस संदर्भ में सेवानिवृत्त मेजर जनरल जीडी बक्शी से हिमांशु मिश्र ने बातचीत की-

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सरबजीत मामले में हमसे आखिर कहां चूक हो गई?

चूक तो इसे तब कहेंगे, जब सरकार ने कुछ किया हो। दबाव बनाने की सरकार की आधी-अधूरी रणनीति और कूटनीतिक लापरवाही के कारण सरबजीत की जगह उसकी लाश आई। सरकार अब भी दावा कर रही है कि उसने सरबजीत को बचाने की कोशिश की। मगर सवाल यह है कि अगर उसके इन तमाम कोशिशों का नतीजा सरबजीत की लाश है, तो इससे यह साबित हो जाता है कि सरकार की कोशिशों में कोई दम नहीं था। मेरा अपना मानना है कि सरकार ने शुरू से ही सरबजीत को जिंदा वापस लाने का ईमानदार प्रयास नहीं किया। अब जब पूरे देश में लोग गुस्से में हैं, तो सरकार अपने बचाव में लचर दलीलें दे रही है।
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आपके हिसाब से सरकार को क्या करना चाहिए था?

अंतरराष्ट्रीय राजनीति ताकत और धमक से चलती है, कायरता से नहीं। आपके पास ताकत है, तो उसे दिखाना भी बेहद जरूरी है। मतलब अगर दांत है, तो कभी-कभी काटना भी होगा। इससे दुश्मन को यह एहसास होगा कि पड़ोसी के दांत दिखाने भर के लिए नहीं हैं। अफसोस यह है कि देश के पास ताकत तो है, पर सरकार के पास दृढ़ इच्छाशक्ति नहीं है। हकीकत यह है कि अगर आप पलटवार नहीं करेंगे, तो दुश्मन आपको कमजोर मानकर मनमानी पर उतर आएगा। सरकार की कायरता के कारण हमारे साथ यही हो रहा है। चाहे चीन हो या पाकिस्तान, श्रीलंका हो या बांग्लादेश, यहां तक की नेपाल भी भारत को आंखें दिखा रहा है।
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आखिर समस्या कहां है?
जैसा मैंने पहले ही कहा, मुख्य समस्या दृढ़ इच्छाशक्ति का अभाव और आम आदमी की जान की सरकार की नजर में कोई कीमत नहीं होना है। बीती सदी के अस्सी के दशक से पाकिस्तान हमारे सिर पर नाच रहा है। आतंकवाद के सहारे उसने इस दौरान हजारों लोगों की जान ले ली। सैनिकों का सिर काटकर ले गए। सरबजीत से पहले चमेल सिंह को मार डाला। मगर सरकार चुपचाप बैठी तमाशा देखती रही। अगर शुरू से ही तीखा और आक्रामक प्रतिकार हुआ होता, तो हमें आज सरबजीत की लाश नहीं देखनी पड़ती। सीधे शब्दों में कहूं, तो सरबजीत देश और सरकार की लचर राजनीति का शिकार हो गया।

भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए क्या करना चाहिए?
सबसे पहले तो रीढ़ की हड्डी की जरूरत है। इसके अभाव के कारण ही हमारी सरकारों की निगाह में न तो देश के सम्मान की कोई अहमियत है, न आम आदमी, किसानों और फौज की जान की कोई कीमत। ऐसी घटनाओं को रोकने की पहली और अंतिम शर्त आक्रामकता है। आप भाषण से नहीं, कार्रवाईयों के जरिये सख्त संदेश दीजिए कि बस, बहुत हो चुका। देश अब उकसाने वाली कार्रवाईयों को किसी कीमत पर बर्दाश्त नहीं करेगा।


कहीं आपका इशारा सैन्य विकल्प आजमाने का तो नहीं है?
सैन्य विकल्प आजमाने का अर्थ हमेशा युद्ध नहीं होता। युद्ध से खुद डरने के बदले पड़ोसियों को यह सख्त संदेश देना जरूरी है कि ऐसे मामलों में देश किसी भी सीमा तक जाने के लिए पूरी तरह तैयार बैठा है। ऐसा नहीं करेंगे, तो पाकिस्तान आपको इसी तरह मुंह चिढ़ाता रहेगा, चीन आपकी सीमा के अंदर आकर आंखें दिखाएगा। जहां तक सैन्य तैयारियों की बात है, तो भारतीय सेना किसी से कमजोर नहीं है।

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