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मादाम सर्रात के घर में रचना संसार की कुछ बातें
कैलाश वाजपेयी/वरिष्ठ लेखक और चिंतक
Updated Mon, 28 Apr 2014 03:17 AM IST
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अभिनय कठपुतली का सा, मगर भाषा खंडित यानी पैंटोमाइम, मगर सवाक्। अगर आप इस तरह की किसी दुनिया के रचना संसार के आसपास हैं, तो आप नथाली सर्रात के रचना संसार के आसपास हैं। पीछे कहीं कुछ घटित हो रहा है। एक गुम स्थिति में उठती हैं कुछ आवाजें, कुछ वाक्य लहराते हुए आते हैं। बीच-बीच में उफ या हल्की सी झड़प आभास करवाती है कि कोई किसी से उलझ गया है। कहीं कुछ पात्र हैं, जो नामहीन हो गए हैं। ये सारे पात्र नथाली सर्रात की सृष्टि हैं, जिनसे आप शब्दों के माध्यम से मिलेंगे।
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शब्दों और वाक्यों को जब आप उनके नाम से नहीं जोड़ पाएंगे, तो आपको खीझ होगी। आपकी ग्रहण चेतना और आपके आकृति ज्ञान ने घटनाओं को व्यक्ति से, वाक्यों से, नामों से, कार्य को कारण से जोड़ना सीखा है। मगर, नथाली सर्रात की दुनिया में नाम और आकार गुम हैं, सिर्फ शब्द हैं। खंडित वाक्य, जो पूर्वापर संबंध की विविक्ति के बावजूद एक कथानक की सृष्टि करते हैं।
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उदाहरण के लिए दो आवाजें हैं- एक कहती है, ''तुम तो बस बीहड़ हो, एक बार कोशिश तो कर सकते थे।'' दूसरी उत्तर देती है- “मैं इतने असमंजस में था कि ये दोनों आवाजें पति-पत्नी की हैं।”
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फ्रांसिसी भाषा में क्योंकि विशेषण, निपात, प्रत्यय आदि लिंगानुसार लगाए जाते हैं और क्रिया भी संज्ञा के लिंग के आधार पर रूप परिवर्तित करती है, इसलिए बिना नाम के यह अंदाज लगा पाना कठिन है कि इन स्वरों का आपसी रिश्ता क्या है। मगर, प्रारंभ से अंत तक जब किसी कृति में नामहीन आवाजों और मनोवेगों का ही फैलाव हो, तो उलझन होती है। जैसे-कुछ खो गया है, यह तो याद है, मगर क्या खो गया है, यह याद न आए।
यह सारा वातावरण नथाली सर्रात के उपन्यासों का है, जो फ्रांस में नए उपन्यास के नाम से जाना जाता है। सार्त्र ने उनके उपन्यास की भूमिका लिखते हुए उसे अ-उपन्यास कह दिया, तभी से यह नाम चल पड़ा।
मास्को छोड़ते हुए रूसी कवि आंद्रई वोजनेसेस्की ने मादाम के लिए अपनी कविताओं का एक रिकॉर्ड दिया था। इसीलिए हमें उनके आवास 12 रुपियरले दी सर्वी तक आना पड़ा। स्वागत कक्ष से जुड़ा खाली कमरा था, एक तरफ किताबें सजी थीं, लिखने की मेज पर कई कागज फड़फड़ा रहे थे। पीली स्कर्ट पहने मादाम ने भीतर आने को कहा। पास ही एक सोफा पड़ा था। इशारा किया, हम बैठ गए। सन्नाटा था, सन्नाटे में घुला यश, हमें ‘बिटवीन लाइफ एंड डेथ’ का कथानक याद आया। यह उन्हीं का चर्चित उपन्यास है।
इसे लिखने से लेकर कृति के प्रकाशन और उसकी समीक्षा तक की प्रक्रिया को समेटने वाला रिकॉर्ड हमने मादाम सर्रात को दिया। उन्होंने पूछा - “कैसा है आंद्रई?” हमने मास्को का विवरण भी दिया। मादाम सर्रात ने बताया, वे भी वहीं पैदा हुईं थी। फिर कैसे वे पेरिस ले आई गईं, कैसे पली-बढ़ीं, कैसे पढ़ाई के लिए लंदन गईं आदि-आदि। हमें सामने की दीवार पर एक आले में दोहरी आंखें दीख पड़ीं। मादाम झट उठीं और उस बिल्ली के बच्चे को उठा लाईं, ऊनी नमदे से बना बिल्ली का एक बच्चा। ‘इसे मैं स्पेन से लाई थी, इसका नाम है गातो। यह बिल्ला है मेरी प्रेरणा का आधार। हमेशा नहीं, कभी-कभी।’
मादाम के पति घर पर नहीं थे। मादाम ने बताया, वही मेरे एकमात्र पाठक या श्रोता रहे हैं। हमने मन ही मन उस महापुरुष को प्रणाम किया, जो मादाम की कृतियों का पहला ड्राफ्ट सुनता है। हमने मादाम से फ्रांस के नए साहित्यान्दोलन ‘त्यल क्यल’ के विषय में पूछा। अब मादाम खिन्न दिखीं। कहने लगीं उनको पढ़ना खासा जानलेवा है।
मादाम ने नए लेखकों का मुद्दा इस तरह पेश किया- ‘त्यल क्यल’ के लेखकों का कहना है- हम जो भी लिखते हैं, यह फ्रांसिसी समाज उसे झट पचा जाता है। बुर्जुआजी हमें जल्दी ही अपने ड्राइंग रूम में सजा देती हैं। अब हम ऐसा नहीं होने देंगे। हमने पूछा, आपने कभी भारत देखा? वे बोलीं, 'मैं एक बार कोलकाता गई थी-बाप रे, बंगाली लेखक हमारे साहित्य के बारे में क्या नहीं जानते! हमने कहा, 'यही तो रोना है, हम आपके बारे में सब जानते हैं, जबकि आपको हमारी गहराई का कुछ पता नहीं।'
हम जब चलने लगे, तो नथाली ने हमें एक छोटा सा बिल्ला उपहार में दे दिया। कहा, 'काम आएगा। इस शहर में बहुत बिल्लियां हैं।' हमें उनके शब्दों की भाव-व्यंजना में कुछ याद रही कुछ नहीं।