सरहद पर नाकाम सियासत

मारूफ रजा Updated Tue, 16 Oct 2012 09:36 PM IST
article of maruf raza on indo-china war
पचास वर्ष पहले 19 अक्तूबर, 1962 की आधी रात को चीन ने नेफा में भारत की अग्रिम चौकी पर हमला किया था और पंडित नेहरू की 'अग्रिम नीति' (पंचशील नीति) को धता बताया था। उस सैनिक हार के अपमान ने पंडित जी के आदर्शवाद को ध्वस्त कर दिया था और आधी शताब्दी बाद भी भारत की सेना उससे चिढ़ती है।

महीने भर चली वह लड़ाई भारत के लिए स्याह दिन थे। देश का राजनीतिक एवं सैन्य नेतृत्व विफल हो गया। यहां तक कि हमारे कनिष्ठ सैन्य अधिकारी और जवान बीमार थे और युद्ध के लिए सुसज्जित नहीं थे। गोला-बारूद खत्म होने पर उन्हें निहत्थे और पत्थरों से लड़ाई लड़नी पड़ी!

थाग-ला रिज के पास नामका चू में, जहां यह लड़ाई शुरू हुई थी, हिमालयन ब्लंडर के लिए मशहूर ब्रिगेडियर जेपी दलवी की कमान में सात इंफेंट्री ब्रिगेड का नरसंहार किया गया। यह तब हुआ, जब 2 राजपूत बटालियन वीरतापूर्ण डटी रही थी, जिसका चीनी सैनिकों ने सफाया कर दिया। मगर आखिर तक लोहा लेने वालों में मेजर शैतान सिंह (जिन्हें मरणोपरांत परमवीर चक्र दिया गया) और लद्दाख में चुसुल के निकट रेजांग-ला में लड़ने वाली उनकी कुमाऊं रेजिमेंट थी, जिसके 114 जवानों को सम्मानित किया गया।

मरते दम तक उन लोगों ने सात चीनी हमलों को रोका और कई दिनों तक बर्फ में जमे रहे। यदि ऐसा संकल्प होता और सेना का शीर्ष नेतृत्व नेहरू के अहंकारी रक्षा मंत्री कृष्ण मेनन (जिन्होंने घोषणा की थी कि वह अकेले चीनियों से निपट सकते हैं) के प्रतिरोध में खड़ा होता और उन्हें युद्ध के सूक्ष्म प्रबंधन से रोका होता, तो शायद तवांग, वलांग, से-ला और बोमडि-ला को बचाया जा सकता था।

युद्ध का असली कारण 1914  में हुए शिमला सम्मेलन में पेश सीमा के नक्शे का चीन द्वारा जारी विरोध था। इस नक्शे के अनुसार तिब्बत की सीमा पश्चिम में अक्साई चीन (लद्दाख में) और जिनजियांग के बीच तथा पूर्व में अरुणाचल प्रदेश की सीमा तक है। यह एक औपनिवेशिक विरासत है, जिसे मानने से माओत्से तुंग ने मना कर दिया था। इसके साथ ही तिब्बत में भारत की राजनयिक एवं खुफिया विफलता भी इसके लिए जिम्मेदार थी।

इस युद्ध से एक दशक पहले चीन ने भारत के इस सुझाव को मानने से इनकार कर दिया था कि तिब्बत को स्वतंत्र और दोनों देशों के बीच बफर जोन के रूप में रहने दिया जाए। वस्तुतः 1960 में चाउ एन लाइ ने एक सीमा समझौते की पेशकश की थी, जिसे नेहरू ने खारिज कर दिया। इसलिए माओ ने भारत को सबक सिखाने का फैसला किया।

उसके बाद जो हुआ, वह हमारे लिए सैन्य भगदड़ के समान था। चीनियों ने सबसे पहले पूरब में नामका चू के पास बम-ला और थग-ला तथा पश्चिम में चुसुल में रेजांग-ला पर हमला किया। हालांकि जमीन पर हमारे कई जवान अंत तक लड़े, पर अकसर वरिष्ठ कमांडरों ने उन्हें नीचा दिखाया।

कृष्ण मेनन ने सेना प्रमुख जनरल थापर और अन्य कमांडरों की उपेक्षा की और अपने तरीके से लड़ने का फैसला किया। यहां तक कि वायु सेना का ज्यादातर उपयोग हताहतों को ढोने में किया गया, हमले के लिए नहीं। और फिर 21 नवंबर, 1962 को चीनी सेना की एकतरफा वापसी से युद्ध खत्म हो गया।

उस युद्ध की आधी शताब्दी बाद भी नई दिल्ली इससे अनजान है कि कहां गलती हुई और उसके लिए कौन दोषी थे। सचाई भारतीय सेना के दो अधिकारियों- लेफ्टिनेंट जनरल हेंडरसन ब्रूक्स और ब्रिगेडियर प्रेम भगत द्वारा तैयार रिपोर्ट में छिपी है, जिसे साउथ ब्लॉक में एक कोठरी में बंद कर दिया गया है।

जाहिर है, मुट्ठी भर लोगों ने ही हेंडरसन ब्रूक्स रिपोर्ट पर नजर डाली है, जिसमें भाजपा नेता जसवंत सिंह, इतिहासकार नेवल मैक्सवेल (जो युद्ध के लिए नई दिल्ली को दोषी मानते हैं ) और गोपनीयता की शपथ लेने वाले रक्षा मंत्रालय के इतिहास प्रभाग के लोग शामिल हैं। लगता है कि हम अपने अतीत से सबक नहीं लेना चाहते। डर है (कम से कम कांग्रेसियों को) कि यह रिपोर्ट पंडित जी की छवि खराब कर देगी। हालांकि हार का सबसे ज्यादा दोष कृष्ण मेनन पर जाना चाहिए।

वर्ष 1962 के बाद से भारत-चीन सीमा पर कम से कम दो बार भारतीय सेना ने दिखा दिया है कि वह उन काले दिनों की छाया से उबर चुकी है। पहली घटना 1967 की है, जब 2 ग्रेनेडियर्स के जवानों ने नाथू-ला पोस्ट से हटने से इनकार कर दिया था, जबकि उनके ऊपर चीनियों ने गोलीबारी भी की थी। पच्चीस वर्ष पूर्व चीन को कहीं अधिक कड़ा संदेश दिया गया।

 1962 में भारतीय वायुसेना का इस्तेमाल घायलों को ले जाने के लिए किया गया था, वहीं 1986 में सैन्य प्रमुख जनरल सुंदरजी ने समदोरोंग चू पर चीन द्वारा किए जा रहे निर्माण को करारा जवाब देने के लिए फौरन वायुसेना का इस्तेमाल किया था। जब राजीव गांधी ने अपने मंत्रियों की सलाह पर कहा कि भारतीय सेना को पीछे लौट जाना चाहिए, तो सुंदरजी ने ऐसा करने से इनकार कर दिया।

उन्होंने अपने इस्तीफे तक की पेशकश कर दी थी। अंततः चीनी सेना को पीछे हटना पड़ा। इस प्रसंग में चीन से निपटने के लिए एक सबक निहित है। आज हालांकि हमारे सीमा क्षेत्र उपेक्षित रहते हैं, लेकिन हमारे सैनिक देश की रक्षा करने में सक्षम हैं। लेकिन सबसे बड़ा सवाल है कि क्या भारत के राजनीतिक नेतृत्व के पास चीन से आंख मिलाने की क्षमता है। जवाब है, शायद नहीं। इस मामले में हम आज भी वहीं हैं, जहां पचास वर्ष पहले थे।

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