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चीनी बैंक पर अमेरिकी शंका

Sat, 04 Jul 2015 02:30 AM IST
रहीस सिंह
रहीस सिंह Updated Sat, 04 Jul 2015 02:30 AM IST
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जून के अंतिम सप्ताह में बीजिंग का पीपुल्स ग्रेट हॉल जब एक ऐसी संस्था के गठन का प्रतीक बना, जो ब्रेटन वुड्स (1944 में स्थापित वित्तीय संस्था) के साथ प्रतियोगिता के लिए निर्मित हुई हो, तो आधी दुनिया के एक बड़े हिस्से ने इसका स्वागत किया, लेकिन अमेरिका और जापान ने शंकाएं जाहिर करते हुए इसका विरोध किया।

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50 सदस्यों के हस्ताक्षरों के साथ आरंभ हो रहे चीनी नेतृत्व वाले एशियन इन्फ्रास्ट्रक्चर इनवेस्टमेंट बैंक (एआईआईबी) की शुरुआती अधिकृत पूंजी 50 अरब डॉलर होगी, जिसमें सबसे बड़ी हिस्सेदारी और सबसे ज्यादा वोटिंग अधिकार वाला देश चीन होगा।
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ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या चीन का उद्देश्य विशुद्ध एशियाई विकास का है या फिर वह इसके जरिये अपनी कूटनीतिक और आर्थिक महत्वाकांक्षाएं पूरी करना चाहता है? क्या अमेरिका और जापान की शंका जायज है?
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इसे वैश्विक अर्थव्यवस्था में एक नए अध्याय की शुरुआत मानी जानी चाहिए।

चूंकि इसके सदस्य देश दुनिया के पांच क्षेत्रों (यानी एशिया, यूरोप, लैटिन अमेरिका, अफ्रीका और ओसिआनिया) को कवर करते हैं, इसलिए न केवल एशियाई विकास बल्कि वैश्विक विकास में इसकी महत्ता को आसानी से समझा जा सकता है।

चीन 30.34 प्रतिशत के साथ इस बैंक का सबसे बड़ा महारथी होगा। भारत 8.4 अरब डॉलर की हिस्सेदारी के साथ दूसरे स्थान पर होगा, जबकि रूस तथा जर्मनी क्रमशः तीसरे व चौथे स्थान पर होंगे।

चूंकि इस बैंक को अन्य वित्तीय संस्थानों, विशेषकर एशियाई विकास बैंक और विश्व बैंक के पूरक संस्थान के रूप में स्थापित किया गया है और इसका उद्देश्य एशिया-प्रशांत क्षेत्र में अवसंरचना परियोजनाओं का वित्तपोषण करना होगा, इसलिए यह माना जा सकता है कि आने वाले समय में एशियाई देशों में बुनियादी ढांचे से जुड़ी बड़ी परियोजनाओं के लिए आवश्यक वित्त उपलब्ध होगा।

इस स्थिति में यह उम्मीद की जा सकती है कि यह एशिया के सामाजिक-आर्थिक आधार को बदलने में सहयोगी साबित होगा।

हालांकि अमेरिका ने इस नई संस्था के गवर्नेंस मानकों पर  सवाल उठाया है। वाशिंगटन के विरोध के बावजूद अमेरिका के अधिकांश सहयोगी, जैसे-आस्ट्रेलिया, ब्रिटेन, जर्मनी, इटली, फिलीपींस, दक्षिण कोरिया आदि ने इसकी सदस्यता ग्रहण की है।

यह चीन की कूटनीतिक जीत तो है ही, लेकिन इससे भी आगे बढ़कर यह चीन के आर्थिक उद्देश्यों को पूरा करने का एक हथियार भी प्रतीत होता है।

चीन अपने घर से दूर बिल्डिंग इन्फ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्र में स्थापित होना चाहता है। इसके दिग्गज इंजीनियर चीन से बाहर एशिया और अफ्रीका में बंदरगाहों, सड़कों व शहरों का निर्माण करने की तीव्र महत्वाकांक्षा रखते हैं।

इस स्थिति में स्वाभाविक है कि 21वीं सदी में एशिया को बीजिंग के मास्टर प्लान के अनुसार निर्मित करने के लिए यह बैंक चीन कंपनियों को धन मुहैया कराने का एक बेहतर जरिया बन सकता है।


तात्पर्य यह हुआ कि चीनी वर्चस्ववाद का युग उसी तरह से अब शुरू हो सकता है, जैसे कि ब्रेटन वुड्स के बाद अमेरिका का शुरू हुआ था।

फिलहाल इस संस्था में भी छिपे हुए बहुत से पेच हैं, जिनका खुलासा आने वाले समय में होना है। अब देखना यह है कि भारत इसमें अपनी भूमिका किस प्रकार से निभाता है और एशियाई अर्थव्यवस्था में चीन के साथ अपने कद को किस तरह से आगे बढ़ाने का प्रयास करता है।

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