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सैनिकों से सीखें सेवा का जज्बा

Mon, 01 Jul 2013 02:13 PM IST
Updated Mon, 01 Jul 2013 02:13 PM IST
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army helps uttarakhand flood victims

देवभूमि है उत्तराखंड का दूसरा नाम, तो देवों ने शायद खुद हस्तक्षेप करके हमको पिछले दिनों दिखाए भारत के दो चेहरे। एक घिनौना, वाहियात, शर्मनाक। और दूसरा सुनहरा, बहादुर, शानदार।

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पहले इस चमकते चेहरे की बात करते हैं, जो हमको दिखा हमारे सुरक्षा बलों के जवानों की बहादुरी में। जिस दिन वायुसेना का वह बदकिस्मत हेलीकॉप्टर गिरा पर्वतों से टकराकर पिछले सप्ताह, ऐसा लगा इस देश के कई लोगों को, जिनमें मैं भी हूं, कि जैसे अपने घर के कोई थे मरने वाले।
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इसलिए कि जब से उत्तराखंड में तबाही शुरू हुई है, तब से हमको अपने साहस के ऐसे उदाहरण दिखाए हैं सेना और वायुसेना के जवानों ने, कि तारीफ उनकी जितनी भी की जाए, थोड़ी है।
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बेहद खतरनाक होने के कारण बरसात के मौसम में पहाड़ों पर हेलीकॉप्टर टूरिस्ट सेवा बंद कर दी जाती है। ऐसे मौसम में उत्तराखंड में अपनी जान से खेल रहे थे हेलीकॉप्टर वाहक। उस हेलीकॉप्टर के गिरने के बाद भी लेकिन नहीं रोका उन्होंने यात्रियों को बचाने का काम।

उन्होंने हेलीकॉप्टर उन जंगलों में उतारे, जहां उतारने की कोई व्यवस्था नहीं थी। उतारने के बाद जी-जान से मदद की उन यात्रियों की, जो बेहाल थे, जिनके परिजन मर चुके थे सहायता का इंतजार कर-करके। सवाल यह है कि अगर इन बेहाल लोगों की कहानियां दर्शाने के लिए पहुंच सकते थे टीवी पत्रकार, तो वहां के स्थानीय विधायक और सांसद कहां थे।

कई यात्रियों ने रोते-रोते बताया कि कैसे भूख और प्यास से उनका इतना बुरा हाल था कि पचास रुपये के बिस्कुट उन्होंने दो हजार रुपये में खरीदे और पानी की बोतल खरीदी हजार रुपये में। कुछ जगहों पर चाय की दुकानों के मालिकों ने लंगर खोले यात्रियों के लिए, लेकिन कहीं से नहीं मिली खबर कि विधायक या सांसद ने ऐसा किया।

देहरादून में टीवी पर दिखे मुझे दो सांसद आपदा आने के बाद। हनुमंत राव कांग्रेस के और रमेश राठौर तेलगुदेशम के, और वह भी तब, जब हाथापाई शुरू हो गई थी उनके बीच। श्रेय लेना चाहते थे दोनों यात्रियों को घर पहुंचाने का। वाह रे भारत महान!

मेरी राय में जिस तरह से कांग्रेस ने नरेंद्र मोदी को बदनाम करने की कोशिश की, उसमें भी दिखता है इस देश का अति घिनौना चेहरा। नरेंद्र मोदी को उत्तराखंड जाने का उतना ही हक है, जितना राहुल गांधी को। वहां पहुंचकर उनको पूरा अधिकार था अपनी सरकार की तरफ से सहायता का आश्वासन देने का, लेकिन इससे इतनी तकलीफ हुई कांग्रेस को कि झूठा प्रचार करने पर उतर आए मनीष तिवारी और दिग्विजय सिंह जैसे वरिष्ठ कांग्रेस नेता।

उन्होंने टीवी पत्रकारों को बड़े जोश-ओ-खरोश से कहा कि मोदी झूठ बोल रहे हैं कि उन्होंने 15,000 यात्रियों को एक दिन में बचाया। मीडिया में भी इस पर काफी चर्चा हुई और मोदी को निशाना बनाया गया। मैंने ट्वीटर द्वारा जानने की जब कोशिश की कि मोदी ने इतने यात्रियों को बचाने की बात कब और कहां की थी, तो मालूम हुआ कि उन्होंने यह बात कही ही नहीं। यह गंदी राजनीति नहीं, तो क्या है?

कांग्रेस की याददाश्त कमजोर है, सो इस दल के सदस्य भूल चुके हैं बेलछी को। याद कीजिए जरा कि क्या हुआ था 1977 में? दिल्ली में जनता पार्टी का राज था उन दिनों और बिहार के बेलछी में दलितों का नरसंहार किया उस गांव के कुछ सवर्ण लोगों ने।

इंदिरा गांधी तब विपक्ष में थीं, लेकिन उन्होंने जब देखा कि प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई लापरवाही दिखा रहे हैं, तो वह फौरन रवाना हो गईं बेलछी के लिए अपने कुछ कांग्रेस साथियों को लेकर। उस साल भी गंगा में बाढ़ आई हुई थी, तो इंदिरा जी ने नदी पार किया हाथी पर सवार होकर। हाथी पर उनकी वह तस्वीर दुनिया भर के अखबारों में छपी और वहां से शुरू हुई इंदिरा गांधी की सत्ता में वापस आने की यात्रा।


उत्तराखंड में बर्बादी इतनी हुई है कि देश की हर राज्य सरकार से सहायता मिले, तो भी कम पड़ेगी। गंदी राजनीति करने का यह समय नहीं है। समय है देवभूमि को आबाद करने का। इस काम में इस राज्य के हर सांसद और विधायक को लग जाना चाहिए। वे अपने चुनाव क्षेत्रों में जाएं और उन लोगों की मदद करें, जिनका सब कुछ लुट गया है।

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