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जड़ता की यह स्थिति टूटे तो कैसे

Mon, 22 Oct 2012 06:25 PM IST
अनुराग अन्वेषी
अनुराग अन्वेषी Updated Mon, 22 Oct 2012 06:25 PM IST
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aricle of anurag anveshi on khap panchayat
हरियाणा और देश के दूसरे हिस्सों से बलात्कार की लगातार खबरें स्तब्ध करने वाली हैं। बलात्कार की वारदात पर अंकुश लगाने के लिए खाप पंचायतें कभी शादी की उम्र घटाने की सलाह दे रही हैं, तो कभी फास्ट फूड को कोस रही हैं। हर ऐसी खबर के बाद यह समाज पुलिस की निष्क्रियता पर मर्सिया पढ़ रहा है। और बेचारी लड़की-अकेली क्यों गई थी, किसी को साथ क्यों नहीं ले गई, इसकी सहमति तो नहीं थी–जैसे सवालों से जूझ रही है।
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जहां तक खाप पंचायतों का सवाल है, तो आज भले ही वे गलत वजहों से चर्चा में हैं, लेकिन इससे इनकार नहीं कि पिछले सैकड़ों वर्षों से समाज को शृंखलाबद्ध रूप मे चलाने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। इसीलिए खाप पंचायतें जब बलात्कार के लिए फास्ट फूड को जिम्मेदार ठहराती हैं या कम उम्र में शादी को इसका समाधान बताती हैं, तो हैरत होती है। जबकि ऐसे कई मामले हैं, जिनमें बलात्कार का आरोप बुजुर्गों पर है और अबोध बच्चियां उनकी शिकार बनी हैं।
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जिम्मेदार राजनीतिक पदों पर बैठे एकाधिक महानुभावों ने हरियाणा में रोंगटे खड़े कर देने वाले गैंगरेप के मामलों को आपसी सहमति का भी उदाहरण बताया है, जो उनकी संवेदनहीनता के बारे में ही ज्यादा बताता है। इस तरह के बयान समाज की झूठी इज्जत बचाए रखने की कोशिश से ज्यादा कुछ नहीं। इससे विकृत मानसिकता को और बल मिलेगा।
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दरअसल, भारतीय समाज पुरुष वर्चस्व वाला समाज है। यहां औरतों से परदे के भीतर रहने की अपेक्षा तो की ही जाती है, उनके साथ हुए अत्याचार को भी दबा देने में बुद्धिमानी समझी जाती है, खासकर तब, जब शोषित होने वाला समाज के निचले वर्ग से हो। गौर कीजिए, पुरुषवर्चस्ववादी समाज का यही उच्च वर्ग अपनी लड़कियों के भाग जाने या अपने से अलग समाज में शादी कर लेने को न सिर्फ इज्जत से जोड़ता है, बल्कि ऐसी घटनाओं के खिलाफ हिंसक हो जाता है।

वैसी स्थिति में उसे अपनी ही संतानों को मार डालने में भी किसी किस्म का पछतावा नहीं होता। तब वह इन घटनाओं को दबाने की भी कोई कोशिश नहीं करता, क्योंकि इन्हें वह अपनी इज्जत पर हमला मानता है। उसके लिए इज्जत वही है, जो उसके समाज ने सैकड़ों वर्ष पहले तय किया है। इस इक्कीसवीं सदी में इज्जत की परिभाषा बदली नहीं, और न ही उसके समाज ने इसे बदलने की कोई चेष्टा की।

दोनों ही स्थितियों में औरत की कोई विशेष भूमिका समाज में नहीं है। उसे बचपन से ही यह सिखाया जाता है कि वह दूसरे की थाती यानी अमानत है। उसके शोषण की शुरुआत घर से ही हो जाती है। खान-पान, खेल-कूद और पढ़ाई-लिखाई में उसकी हिस्सेदारी उसके भाई से कम रहती है, क्योंकि उसे कौन-सी नौकरी करनी है। उसे स्त्रियोचित तमाम गुण सिखाए जाए हैं। उसे बताया जाता है कि तेज दौड़ना, खिलखिलाकर हंसना या फिर पलटकर सवाल करना स्त्रियों के लिए उचित नहीं।

इन सारी नसीहतों को घुट्टी की तरह पीकर वह संकोच, दब्बूपन और कायरता के सांचे में ढलती हुई जीती-जागती मूर्ति बनती है। हमारा मर्दवादी समाज अपनी गढ़ी हुई इस मूर्ति पर सीना तानकर कहता है, देखो, इसमें लज्जा है, शील है, सहनशीलता है। स्त्री पर पुरुष का हक जैसी धारणाएं स्त्री को भयमुक्त होकर खुली हवा में सांस नहीं लेने देतीं। उसे अकेले बाहर जाने नहीं दिया जा सकता। उसे जींस नहीं पहनना चाहिए।


उसे मोबाइल का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। उसे फिल्म देखने नहीं जाना चाहिए। अपने घर-परिवार से अलग उसकी कोई दुनिया होनी नहीं चाहिए। जिस हरियाणा में कल्पना चावला जैसी शख्सियत हुईं, वहां लड़कियों के प्रति यह सुलूक स्तब्ध करता है। जड़ता की यह स्थिति टूटनी चाहिए। लेकिन यह टूटेगी कैसे? जो राजनेता कभी समाज में जागृति लाने का काम करते थे, उन्होंने अपनी भूमिका केवल चुनाव में वोट मांगने तक सीमित कर ली है। उनमें से किसी के पास साहस नहीं है कि वे लड़कियों के हक में बोलें। क्या कोई जनांदोलन राजनीतिक भ्रष्टाचार के बजाय इस सामाजिक जड़ता में झांकने और इसे दूर करने की भी सुध लेगा?

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