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आतंकवाद का मददगार अमेरिका
रहीस सिंह
Updated Fri, 12 Apr 2013 10:48 PM IST
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मार्क मैजेटी की नई किताब द वे ऑफ द नाइफ से जो तथ्य सामने आए हैं, उससे न केवल अमेरिका-पाकिस्तान संबंधों की असलियत फिर सामने आई है, बल्कि यह भी पता चला है कि अमेरिका अपने हितों के लिए आतंकवाद को किस तरह संरक्षण दे सकता है। यानी आतंकवाद के खिलाफ अमेरिकी युद्ध की प्रतिबद्धता वहीं तक है, जहां तक उसके हित जुड़े हों। फिर भारत-अमेरिकी रणनीतिक साझेदारी का मतलब क्या है?
मार्क मैजेटी ने अपनी किताब में वैसे तो सीआईए और मिलिटरी इंडस्ट्रियल कांप्लेक्स के बीच संबंधों और सीआईए की कारगुजारियों को सामने लाने का काम किया है। इसमें सीआईए की रणनीति का खुलासा है, जिसमें उसकी ड्रोन नीति पर भी फोकस किया गया है।
किताब के मुताबिक, पाकिस्तान में ड्रोन हमले अलोकप्रिय रहे, जिससे वहां के 18 करोड़ लोगों में अमेरिका के खिलाफ गुस्सा पैदा हुआ, जिसे इस्लामाबाद ने राष्ट्रीय गुस्से में परिवर्तित करने की युक्ति अपनाई और बार-बार अमेरिका को चेतावनी दी कि वह पाकिस्तान की संप्रभुता का सम्मान करते हुए ड्रोन हमले तत्काल बंद करे।
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लेकिन किताब से पता चलता है कि पाकिस्तान संप्रभुता के सम्मान या अमेरिका के विरोध का सिर्फ प्रहसन कर रहा था, क्योंकि यह सब इस्लामाबाद की सहमति पर ही हो रहा था। लेकिन शर्त यह थी कि ये हमले पाकिस्तान के परमाणु ठिकानों और कश्मीरी आतंकवादियों के लिए पाक अधिकृत कश्मीर में चलाए जा रहे प्रशिक्षण शिविरों पर नहीं किए जाएंगे। यानी अमेरिका अफगानिस्तान सीमा पर तो ड्रोन हमले करे, लेकिन उन शिविरों को न छुए, जहां भारत-विरोधी आतंकवादियों को प्रशिक्षित किया जाता है।
यह बार-बार बताया जाता है कि अमेरिका आतंकवाद के विरुद्ध नहीं, बल्कि अपने हितों के लिए युद्ध लड़ रहा है। इसलिए आतंकवाद के खिलाफ लड़ते हुए वह उस आतंकवाद का मित्र भी बन सकता है, जिससे उसके अपने हितों को लाभ पहुंच रहा हो। एक खुलासा यह है कि सीआईए ने ऑपरेशन साइक्लोन के तहत पाकिस्तान में इस्लामी प्रशिक्षण विद्यालय स्थापित करने के लिए चार अरब डॉलर खर्च किए थे।
इसके तहत युवा कट्टरपंथियों को वर्जीनिया में सीआईए के जासूसी प्रशिक्षण शिविर में भेजा गया था, जहां अल-कायदा के भावी सदस्यों को ‘विध्वंस का कौशल’ सिखाया जाता था। फ्रेडरिक ग्रेयर की रिपोर्ट हो या एड्रियन लेवी और कैथरीन स्काटक्लार्क की पुस्तक डिसेप्शन पाकिस्तान द यूनाइटेड स्टेट्स ऐंड द ग्लोबल वेपन कांसपिरेसी, क्रिस्टीन फेयर का आकलन हो या फिर मार्क मैजेटी की यह किताब, सभी सहमत हैं कि अमेरिका ने आतंकवाद को समाप्त करने में नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से उसे बढ़ाने में सहयोग किया है।
वह जानता था कि पाकिस्तान को हर साल मिलने वाली आर्थिक मदद का बड़ा हिस्सा चोरी-छिपे रक्षा कार्यक्रमों में खर्च किया जाता है। यानी जिमी कार्टर से लेकर जॉर्ज बुश या अब ओबामा तक-सभी राष्ट्रपति पाक परमाणु कार्यक्रम और रक्षा रणनीति की तरफ से आंखें मूंदे रहे, जबकि सभी को पता था कि पाकिस्तान का परमाणु शक्ति बनना एशिया की शांति के लिए सबसे बड़ा खतरा साबित होगा।
प्रो. जॉन केनेथ गॉलब्रेथ ने 1960 के दशक में ही कहा था कि सशस्त्र सेना या हथियार बनाने वाली कंपनियां निर्णय लेकर अमेरिकी संसद और जनता को उनकी सूचना मात्र देती हैं। इसकी पुष्टि 1963 में आइजन हावर ने भी यह कहकर कर दी थी कि वास्तविक शक्ति पर्दे के पीछे है। वह शीतयुद्ध का दौर था, लेकिन अब तो वह स्थिति भी नहीं है।
आज पाक समर्थित आतंकवादी समूह कश्मीर को युद्ध का मोर्चा मानते हैं, जबकि अमेरिका इस तथ्य को नजरंदाज कर इस्लामाबाद को फिर से सैन्य उपकरण देने के लिए रास्ता साफ कर चुका है। अफसोस यह है कि भारतीय राजनय इस तथ्य पर उतना गंभीर नहीं दिखता, जितना कि उसे होना चाहिए। अब यह पूछने का समय आ गया है कि आतंकवाद के खिलाफ युद्ध के नाम पर अमेरिकी प्रशासन ने काबुलीवाले और मरजीना के देश का जो ध्वंस किया है, वह वास्तव में है क्या!
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मार्क मैजेटी ने अपनी किताब में वैसे तो सीआईए और मिलिटरी इंडस्ट्रियल कांप्लेक्स के बीच संबंधों और सीआईए की कारगुजारियों को सामने लाने का काम किया है। इसमें सीआईए की रणनीति का खुलासा है, जिसमें उसकी ड्रोन नीति पर भी फोकस किया गया है।
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किताब के मुताबिक, पाकिस्तान में ड्रोन हमले अलोकप्रिय रहे, जिससे वहां के 18 करोड़ लोगों में अमेरिका के खिलाफ गुस्सा पैदा हुआ, जिसे इस्लामाबाद ने राष्ट्रीय गुस्से में परिवर्तित करने की युक्ति अपनाई और बार-बार अमेरिका को चेतावनी दी कि वह पाकिस्तान की संप्रभुता का सम्मान करते हुए ड्रोन हमले तत्काल बंद करे।
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लेकिन किताब से पता चलता है कि पाकिस्तान संप्रभुता के सम्मान या अमेरिका के विरोध का सिर्फ प्रहसन कर रहा था, क्योंकि यह सब इस्लामाबाद की सहमति पर ही हो रहा था। लेकिन शर्त यह थी कि ये हमले पाकिस्तान के परमाणु ठिकानों और कश्मीरी आतंकवादियों के लिए पाक अधिकृत कश्मीर में चलाए जा रहे प्रशिक्षण शिविरों पर नहीं किए जाएंगे। यानी अमेरिका अफगानिस्तान सीमा पर तो ड्रोन हमले करे, लेकिन उन शिविरों को न छुए, जहां भारत-विरोधी आतंकवादियों को प्रशिक्षित किया जाता है।
यह बार-बार बताया जाता है कि अमेरिका आतंकवाद के विरुद्ध नहीं, बल्कि अपने हितों के लिए युद्ध लड़ रहा है। इसलिए आतंकवाद के खिलाफ लड़ते हुए वह उस आतंकवाद का मित्र भी बन सकता है, जिससे उसके अपने हितों को लाभ पहुंच रहा हो। एक खुलासा यह है कि सीआईए ने ऑपरेशन साइक्लोन के तहत पाकिस्तान में इस्लामी प्रशिक्षण विद्यालय स्थापित करने के लिए चार अरब डॉलर खर्च किए थे।
इसके तहत युवा कट्टरपंथियों को वर्जीनिया में सीआईए के जासूसी प्रशिक्षण शिविर में भेजा गया था, जहां अल-कायदा के भावी सदस्यों को ‘विध्वंस का कौशल’ सिखाया जाता था। फ्रेडरिक ग्रेयर की रिपोर्ट हो या एड्रियन लेवी और कैथरीन स्काटक्लार्क की पुस्तक डिसेप्शन पाकिस्तान द यूनाइटेड स्टेट्स ऐंड द ग्लोबल वेपन कांसपिरेसी, क्रिस्टीन फेयर का आकलन हो या फिर मार्क मैजेटी की यह किताब, सभी सहमत हैं कि अमेरिका ने आतंकवाद को समाप्त करने में नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से उसे बढ़ाने में सहयोग किया है।
वह जानता था कि पाकिस्तान को हर साल मिलने वाली आर्थिक मदद का बड़ा हिस्सा चोरी-छिपे रक्षा कार्यक्रमों में खर्च किया जाता है। यानी जिमी कार्टर से लेकर जॉर्ज बुश या अब ओबामा तक-सभी राष्ट्रपति पाक परमाणु कार्यक्रम और रक्षा रणनीति की तरफ से आंखें मूंदे रहे, जबकि सभी को पता था कि पाकिस्तान का परमाणु शक्ति बनना एशिया की शांति के लिए सबसे बड़ा खतरा साबित होगा।
प्रो. जॉन केनेथ गॉलब्रेथ ने 1960 के दशक में ही कहा था कि सशस्त्र सेना या हथियार बनाने वाली कंपनियां निर्णय लेकर अमेरिकी संसद और जनता को उनकी सूचना मात्र देती हैं। इसकी पुष्टि 1963 में आइजन हावर ने भी यह कहकर कर दी थी कि वास्तविक शक्ति पर्दे के पीछे है। वह शीतयुद्ध का दौर था, लेकिन अब तो वह स्थिति भी नहीं है।
आज पाक समर्थित आतंकवादी समूह कश्मीर को युद्ध का मोर्चा मानते हैं, जबकि अमेरिका इस तथ्य को नजरंदाज कर इस्लामाबाद को फिर से सैन्य उपकरण देने के लिए रास्ता साफ कर चुका है। अफसोस यह है कि भारतीय राजनय इस तथ्य पर उतना गंभीर नहीं दिखता, जितना कि उसे होना चाहिए। अब यह पूछने का समय आ गया है कि आतंकवाद के खिलाफ युद्ध के नाम पर अमेरिकी प्रशासन ने काबुलीवाले और मरजीना के देश का जो ध्वंस किया है, वह वास्तव में है क्या!