फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Ailment is biger than vyapam

व्यापम से बड़ी है बीमारी

Wed, 22 Jul 2015 08:09 PM IST
वरुण गांधी
वरुण गांधी Updated Wed, 22 Jul 2015 08:09 PM IST
विज्ञापन
Ailment is biger than vyapam

आधुनिक भारत में परीक्षा में धांधली फलता-फूलता धंधा है। प्रवेश और नौकरियों से संबंधित परीक्षाओं में जुगाड़ की कला भी लगातार विकसित हुई है। बिहार में हमने बोर्ड परीक्षा के दौरान स्कूल की दीवारों पर परीक्षार्थियों के संबंधियों को रेंगते देखा है। बिहार के शिक्षा मंत्री कहते हैं कि जब तक अभिभावकों का सहयोग नहीं मिलेगा, तब तक निष्पक्ष परीक्षा का संचालन लगभग असंभव है, जबकि कई इसके लिए सिस्टम में बदलाव की बात कहते हैं, और किताब के साथ परीक्षा की अनुमति देने की वकालत करते हैं।

विज्ञापन


जब सिस्टम में इस तरह की हेराफेरी होती हो और छात्रों को फर्जी तरीके से प्रवेश दिलानेे जैसी कवायद खासी प्रसिद्ध हो, तो नवोन्मेष मजाक ही लगता है। महाराष्ट्र के सिर्फ एक जिले नांदेड़ में 350 स्कूलों के करीब 1.4 लाख छात्र फर्जी पाए गए। दिल्ली में नर्सरी एडमिशन घोटाला विशेष रूप से चिंतित करता है, जिसमें गरीब बच्चों के लिए आरक्षित सीटों पर फर्जी तरीके से साधन-संपन्न घरों के बच्चों का दाखिला कराया गया। एक अन्य उदाहरण मध्य प्रदेश व्यावसायिक परीक्षा मंडल (व्यापम) का है, जो अयोग्य उम्मीदवारों के साथ बिचौलियों, नेताओं और व्यापम के अधिकारियों की मिलीभगत को बेनकाब करता है। लिहाजा अगर देश के श्रम-बल को कुशल बनाना और नियोजित करना है, तो फर्जी तरीके से परीक्षा दिलाना, चोरी करवाना, उसके रिकॉर्ड में हेराफेरी करना, उत्तर पुस्तिका से छेड़छाड़ करना जैसे मुद्दों पर गंभीरतापूर्वक विचार करना होगा।
विज्ञापन


दाखिले में हो सुधार-किसी शैक्षणिक संस्थान में दाखिले की प्रक्रिया ऐसी होनी चाहिए, जो निष्पक्ष, पारदर्शी, गुणवत्तायुक्त और समावेश को सुनिश्चित करे। यानी दाखिले की प्रक्रिया निष्पक्ष और पारदर्शी होनी चाहिए। यह कोई जटिल समस्या नहीं है। यूजीसी- 2009 की कार्ययोजना में यह स्पष्ट है कि उच्च शिक्षण संस्थान अपने यहां प्रवेश-प्रक्रिया को न सिर्फ नोटिस बोर्ड पर चिपकाएं, बल्कि अखबारों और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया तथा सोशल मीडिया पर भी उसे प्रसारित करें। इसमें अकादमिक कलैंडर की जानकारी तो हो ही, सभी कोर्स में सीटों की संख्या, आवश्यक योग्यता, आवेदन संबंधी महत्वपूर्ण तारीखों और अन्य प्रासंगिक सूचनाओं का उल्लेख भी हो। शिक्षण शुल्क में छूट, छात्रवृत्ति और ऋण की उपलब्धता जैसी सूचनाएं अगर आर्थिक रूप से कमजोर तबके के छात्रों तक पहुंचेंगी, तो इससे लाभार्थियों की दक्षता ही बढ़ेगी। इतना ही नहीं, प्रवेश परीक्षा सवाल-जवाब पूछने जैसी कवायदों से कुछ बेहतर होनी चाहिए। जांचने से पहले उत्तर पुस्तिका में गोपनीय कोड अंकित किया जा सकता है। वहीं बायोमेट्रिक प्रणाली के जरिये फर्जी परीक्षार्थियों को पकड़ा जा सकता है। परीक्षा सुधार को लेकर 2005 में बने नेशनल फोकस ग्रुप के निष्कर्षों पर भी ध्यान दिया जा सकता है। उसने संक्षिप्त उत्तर वाले प्रश्नों (जो रटने को प्रेरित करते हैं) की जगह बेहतर तरीके से तैयार बहुवैकल्पिक प्रश्न पूछने की वकालत की है, जबकि ओपेन एंडेड क्वेश्चन (विस्तृत उत्तर वाले प्रश्न) बच्चों में सोचने-समझने और विश्लेषण करने की क्षमता की जांच करता है। इतना ही नहीं, आवेदन के लिए कॉलेजों की संख्या सीमित करने और बेहतरीन तीन विषयों के अंकों के आधार पर चयन और कट-ऑफ निकालने जैसे तरीकों को कॉलेजों की प्रवेश-प्रक्रिया का हिस्सा बनाया जाना चाहिए। अलग-अलग कॉलेजों में दाखिले को लेकर चलने वाले 'म्यूजिकल गेम' की जगह छात्रों को महज एक बार ही कॉलेज बदलने की छूट देने पर भी विचार किया जा सकता है।
विज्ञापन
विज्ञापन


भारत में उच्च शिक्षा मुख्यतः परीक्षा केंद्रित है। हर समेस्टर या अकादमिक वर्ष के अंत में होने वाली परीक्षाओं में नियत अंक, प्रतिशत या डिविजन लाने पर जोर देने के कारण छात्रों में कुछ सीखने, जानने या फिर खोज की प्रवृत्ति विकसित नहीं हो पाती। नतीजतन सार्वजनिक या निजी क्षेत्रों में रोजगार में उतरने से पहले ऐसे स्नातकों को फिर से परीक्षाओं और प्रशिक्षणों से गुजरना पड़ता है। इसके बजाय आंतरिक और बाह्य मूल्यांकन का एक विवेकपूर्ण संयोजन विकसित करना चाहिए। शिक्षकों की गुणवत्ता भी उल्लेखनीय रूप से गिरी है। कोठारी आयोग की अनुशंसा के मुताबिक, उच्च शिक्षा में अध्यापकों की शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाने की जरूरत है। साथ ही, नव नियुक्त शिक्षकों के लिए ओरियंटेशन प्रोग्राम भी किए जाने चाहिए। शोध के लिए दिए जा रहे आर्थिक अनुदान और इस अनुदान के नीतिगत ढांचे, दोनों में बदलाव जरूरी है।


संस्थानों का पुनर्गठन हो-राष्ट्रीय उच्चतर शिक्षा अभियान योजना विकेंद्रीकरण की बात कहती है, जिसके क्रियान्वयन में हम काफी पीछे हैं। आज भी यूजीसी सैकड़ों विश्वविद्यालयों और हजारों कॉलेजों का ही निरीक्षण करती है, जहां रचनात्मकता का दम घोंटा जाता है। चीन में उच्चतर शिक्षा हमसे कहीं ज्यादा लोकतांत्रिक नजर आती है। लिहाजा विश्वविद्यालय के ढांचे में व्यापक बुनियादी बदलाव की जररूत है। विश्वविद्यालयों को दी जा रही वित्तीय सहायता में वृद्धि एक अच्छा विचार हो सकता है। रही बात पारदर्शिता की, तो यह जवाबदेह तंत्र विकसित करके और नियमित ऑडिटिंग करके सुनिश्चित की जा सकती है। विश्वविद्यालय का प्रशासन विशुद्ध शैक्षिक होना चाहिए, जिसे पूर्ण स्वायत्तता मिली हो और वित्तीय सहायता में भी कोई कटौती न हो। मानव संसाधन मंत्रालय और यूजीसी को नीति निर्धारण के बजाय आईआईटी अथवा आईआईएम के निदेशकों और विश्वविद्यालयों के कुलपतियों के चयन से खुद को अलग करने की जरूरत है। विश्वविद्यालयों को सशक्त बनाए बगैर और उसकी पारदर्शिता सुनिश्चित किए बिना हमारे छात्रों को, खासकर विपन्न तबके से आने वालों को, अपना सर्वोच्च देने में मुश्किल आएगी। यह तस्वीर बदलने की जरूरत है।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed