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अनोखी दुनिया का शपथपत्र

Sat, 23 Feb 2013 11:14 PM IST
नई दिल्ली
नई दिल्ली Updated Sat, 23 Feb 2013 11:14 PM IST
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affidavit of unique world

फायदों के खेल में लोगों को आम आदमी की सच्ची आवाज से वाकिफ कराने वाले बेहद कम ही लोग हैं। मशहूर व्यंग्यकार और जान-माने पत्रकार अनुज खरे का नाम ऐसे ही कुछेक गिने-चुने लोगों में गिनाया जा सकता हैं। युवा व्यंग्यकार अनुज खरे का हाल में प्रकाशित व्यंग्य संग्रह ‘परम श्रद्धेय मैं खुद’ इस बात की एक बानगी माना जा सकता है।

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‘चिल्लर चिंतन’ के बाद खरे का यह दूसरा व्यंग्य संग्रह है। खरे खुद मानते हैं कि कोई पत्ता न खड़के, किसी के अंदर हलचल न हो, कोई गुल न खिले, कोई व्यवस्था न बदले, कोई खेल न हो तो लिखने से भला क्या फायदा? फायदे का यही मर्म उनके व्यंग्य की धार में भी नजर आता है। लेखक की मान्यता है कि खतरे न हों तो जिंदगी बदरंग हो जाती है। लिहाजा दाद या दुत्कार की परवाह किए बिना उसने कलम चलाई है।
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रूटीन के क्रांतिकारियों की खबर लेनी हो या क्रांति की संभावनाओं को पिघलने के कगार पर देखना, टुंडे विचारों का ताबूत उठाना हो या अपना कद किताबों पर खडे़ होकर बढ़ाने वालों की ‘प्रशंसा’ करना, अनुज एकदम खरे साबित हुए हैं। उन्होंने निंदारस का लेटेस्ट वर्जन भी खोजा है और सिम्पैथी मैनेजमेंट को भी साधा है, वह लव का लोचा पकड़ पाने में कामयाब रहे हैं, तो मायके गई पत्नी को एक ठो भैरंट पत्र भी लिख मारे हैं। उनकी भाषा में मस्तमौलापन और चौकन्नी तन्मयता है, जो पकड़ लेती है कि कहे जा रहे शब्द का निहितार्थ क्या है।
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परम श्रद्धेय, मैं खुद (व्यंग्य संग्रह)
लेखक : अनुज खरे
सामयिक बुक्स, नई दिल्ली
मूल्य : 395 रुपये

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