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मुद्दा: श्रीलंका में भारतीय शहीदों की याद में, शांति और पारस्परिक सम्मान की एक नजीर

Mon, 06 Jan 2025 07:28 AM IST
शिव शुक्ला कर्नल संजय पांडे
कर्नल संजय पांडे Published by: शिव शुक्ला Updated Mon, 06 Jan 2025 07:28 AM IST
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सार
श्रीलंका में आईपीकेएफ द्वारा की गई कार्रवाई हमेशा शांति और पड़ोसियों के लिए पारस्परिक सम्मान के हमारे दर्शन का मानक बनी रहेगी।
 
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actions taken by IPKF in Sri Lanka always remain standard of our philosophy of mutual respect for neighbors
IPKF Memorial - फोटो : शोसल मीडिया

विस्तार

वर्ष 1987 के भारत-श्रीलंका समझौते के तहत भारतीय शांति सेना (आईपीकेएफ) की श्रीलंका में तैनाती भारत का पहला स्वतंत्र विदेशी राजनीतिक-सैन्य उद्यम था। यह भारत के बढ़ते क्षेत्रीय प्रभुत्व का परिचायक तो था ही, क्षेत्रीय अलगाववाद को दो देशों की आपसी सहमति से खत्म करने, दो पड़ोसी देशों का क्षेत्रीय और वैश्विक शांति बनाए रखने के दायित्वों का अद्वितीय अनुसरण एवं दक्षिण एशिया में बिना किसी अंतरराष्ट्रीय संस्था को शामिल किए शांति व्यवस्था बहाल करने की अद्भुत मिसाल रहा है।



इस पथप्रदर्शक राजनीतिक-सैन्य पहल को चाहे क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उतनी ख्याति नहीं मिली, पर यह भारतीय सेना के पराक्रम, अदम्य साहस, अदभुत रण कौशल, उत्कृष्ट बलिदान और उच्च सैन्य नेतृत्व की खूबियों के लिए भारतीय सैन्य इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में अंकित है। आईपीकेएफ ऑपरेशन जहां एक ओर सैन्य प्रशिक्षण पाठ्यक्रम का हिस्सा बन गया, वहीं भारतीय सैनिकों का बलिदान बटालियनों, रेजिमेंटों और सेना के लिए प्रेरणा का स्रोत है।


भारतीय सेना की एक प्रतिष्ठित एवं जांबाज बटालियन 11, गढ़वाल राइफल्स को भी भारतीय शांति सेना का हिस्सा बनकर 1987 में श्रीलंका के उत्तर-पूर्व में सबसे दुर्गम व उग्रवाद प्रभावित क्षेत्र मुल्लईतिवु में काम करने का मौका मिला। बटालियन त्रिंकोमाली में उतरकर मुल्लईतिवु तक पैदल मार्च करके तीन-चार दिनों में पहुंची थी। इस लंबे मार्च के दौरान ही लिट्टे ने बटालियन के साथ सुरक्षा के लिए चल रहे दो बीएमपी को बारूदी सुरंग से उड़ा दिया था। 11, गढ़वाल राइफल्स इस इलाके में पहुंचने वाली सबसे पहली बटालियन थी। बटालियन ने अपने अदम्य साहस व रण कौशल का परिचय देते हुए लिट्टे के शिविरों को खोज-खोजकर नष्ट किया, जो जाफना पर कब्जा होने के बाद घने जंगल के बीच बना नया जाफना के रूप में जाना जाता था। अपने 15 महीने के कार्यकाल में बटालियन ने तत्परता से काम करते हुए लिट्टे की कमर तोड़ दी थी। हालांकि बटालियन को भी काफी नुकसान उठाना पड़ा और लिट्टे जैसे प्रशिक्षित कैडर के साथ लड़ने में काफी कुछ सीखने को भी मिला।

बटालियन अपना हाई एल्टीट्यूड का कार्यकाल पूरा करके नए मिलिट्री स्टेशन पहुंची ही थी कि उसे चेन्नई में अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा ड्यूटी के लिए जाने का हुक्म मिला। शुरुआती नुकसान के बावजूद बटालियन ने अपने पराक्रम का अभूतपूर्व परिचय देते हुए अपरिचित भू-भाग, अपरिचित वातावरण व भाषा के बावजूद, जंगलों में लिट्टे के महिला शिविर को बर्बाद किया। आईपीकेएफ की वापसी के बाद लिट्टे अपने को इन्हीं कैंपों को पुनर्जीवित कर श्रीलंकाई सेना से लड़ रही थी। उन क्षेत्रों में  लिट्टे के 14 कैंपों की पहचान की गई है और वहां पर बारूदी सुरंग हटाने का कार्य अब भी चल रहा है।

आईपीकेएफ के ऑपरेशन के दौरान 11, गढ़वाल राइफल्स बटालियन के काफी जवानों ने अपने प्राणों की आहुति दी थी। उन दिनों मृत सैनिकों को वापस मुख्य भूमि में भेजने का प्रावधान नहीं था। बटालियन के सभी मृतकों की अंत्येष्टि श्रीलंका में ही की गई थी। उन शहीदों और बटालियन के अविस्मरणीय समर्पण एवं कौशल की यादों को समेटे बटालियन के पांच अधिकारी अपनी धर्म पत्नियों  के साथ, अपने छूटे हुए साथियों को श्रद्धांजलि देने के लिए नवंबर, 2024 में श्रीलंका गए थे।

छत्तीस साल बाद 11, गढ़वाल राइफल्स के वे अधिकारी, जिन्होंने आईपीकेएफ असाइनमेंट के दौरान अपने साथियों को खोया था, इस यात्रा में अपने दिवंगत साथियों के अंत्येष्टि स्थल पर पुष्प अर्पण कर प्रार्थना सभा भी की। ये अधिकारी श्रीलंकाई सेना की मदद से वानी जंगल के उन स्थानों पर भी गए, जहां उन्होंने लिट्टे के शिविरों पर हमला किया था। इस यात्रा के दौरान बटालियन के अधिकारियों ने पलटन के युवा अधिकारी 2/लेफ्टिनेंट मोहन जैकब की कब्र को भी श्रीलंकाई सेना की मदद से ढूंढ़ निकाला और वहां भी प्रार्थना की। इसी तरह अन्य गढ़वाली वीरों द्वारा दी गई आहुति के कई स्थलों पर शोक सभा कर उन्हें श्रद्धांजलि दी गई।

यात्रा के अंतिम पड़ाव (कोलंबो) पर मैंने भी आईपीकेएफ स्मारक पर पुष्पांजलि अर्पित की। भारतीय सेना के सभी शहीद जवानों के प्रति श्रद्धांजलि अर्पित कर बटालियन के अधिकारियों ने अपने खोए हुए सैनिकों का न सिर्फ सम्मान बढ़ाया है, बल्कि उनके बलिदान और वीरता की गाथाओं को पुनर्जीवित कर दिया है।

श्रीलंका में आईपीकेएफ द्वारा की गई कार्रवाई हमेशा शांति और पड़ोसियों के लिए पारस्परिक सम्मान के हमारे आंतरिक दर्शन का मानक बनी रहेगी। भारतीय सैन्य इतिहास का आईपीकेएफ पर एक अलग खंड प्रकाशित किया जाना चाहिए, जिसमें उनके कार्यों पर प्रकाश डाला जाए। उन शहीद सैनिकों को श्रद्धांजलि देने के लिए एक उपयुक्त तारीख भी निर्धारित की जानी चाहिए।

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