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विकास का हिसाब: प्राकृतिक आधार को सुरक्षित रखना कसौटी, नई रणनीति से जीडीपी के आकलन में पर्यावरणीय नुकसान अहम
Tue, 20 Oct 2026 05:02 AM IST
न्यूज डेस्क
अमर उजाला, नई दिल्ली।
अमर उजाला, नई दिल्ली।
Published by: न्यूज डेस्क
Updated Tue, 20 Oct 2026 05:02 AM IST
सार
सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय की पर्यावरणीय-आर्थिक लेखांकन संबंधी नई रणनीति जीडीपी के आकलन में पर्यावरणीय क्षतियों का निर्धारण करने संबंधी अहम पहल है। आखिर विकास की असली कसौटी यही है कि वह अपने प्राकृतिक आधार को भी सुरक्षित रखे।
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जलवायु परिवर्तन, संकट की आहट।
- फोटो : अमर उजाला प्रिंट
विस्तार
पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक विकास को अक्सर एक-दूसरे के विरोधी के रूप में देखा जाता है, जबकि किसी भी देश की दीर्घकालिक समृद्धि इस बात पर निर्भर करती है कि वह अपने प्राकृतिक संसाधनों का कितना विवेकपूर्ण उपयोग करता है और पारिस्थितिकी तंत्र से मिलने वाले संकेतों को कितनी गंभीरता से लेता है।
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भारत के सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय की पर्यावरणीय-आर्थिक लेखांकन संबंधी नई रणनीति 2026-30 इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है। इसका मूल उद्देश्य देश की प्राकृतिक संपदा, पारिस्थितिकी तंत्र की सेवाओं और आर्थिक गतिविधियों के बीच संबंधों को एक व्यवस्थित लेखांकन ढांचे में दर्ज करना है, ताकि विकास की वास्तविक कीमत और प्रकृति के योगदान को बेहतर ढंग से समझा जा सके।
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यह पहल इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) जैसे प्रचलित आर्थिक संकेतक देश में उत्पादित वस्तुओं और सेवाओं का मूल्य तो बताते हैं, लेकिन यह नहीं बताते कि इस उत्पादन के दौरान प्राकृतिक संसाधनों का कितना क्षरण हुआ अथवा पर्यावरण को हुए नुकसान की कीमत कितनी बड़ी थी। वास्तव में, किसी देश की आर्थिक प्रगति का आकलन केवल इस आधार पर नहीं किया जा सकता कि उसकी अर्थव्यवस्था कितनी तेजी से बढ़ रही है। यह भी देखना होगा कि इस वृद्धि की नींव कितनी टिकाऊ है।
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यदि औद्योगिक उत्पादन बढ़ाने के लिए भूजल का अत्यधिक दोहन हो, खनन के कारण जंगल नष्ट हों या शहरी विस्तार के लिए आर्द्रभूमियों को पाट दिया जाए, तो तत्काल आर्थिक गतिविधियां बढ़ सकती हैं, लेकिन भविष्य की आर्थिक और सामाजिक लागत भी बढ़ती जाती है। पारंपरिक राष्ट्रीय लेखांकन में इन नुकसानों की पूरी तस्वीर सामने नहीं आती। पर्यावरणीय-आर्थिक लेखांकन इसी कमी को दूर करने का प्रयास है। खास बात यह है कि इस रणनीति की भूमिका सिर्फ पर्यावरण संरक्षण तक सीमित नहीं है।
मंत्रालय का अनुमान है कि पर्यावरणीय लेखांकन से सतत विकास लक्ष्यों (एसडीजी) के नौ लक्ष्यों से संबंधित करीब 40 वैश्विक संकेतकों के आकलन में मदद मिल सकती है। नया रोडमैप कार्बन भंडार, जैव विविधता और पर्यावरण से संबंधित आर्थिक गतिविधियों को भी अपने दायरे में लाता है। हालांकि यह इतना आसान नहीं होगा।
भारत में कई वर्षों से राज्यों के स्तर पर पर्यावरणीय लेखांकन संबंधी अध्ययन किए जा रहे हैं, लेकिन पद्धतियों व प्रक्रियाओं के फर्क की वजह से एक सुसंगत राष्ट्रीय तस्वीर नहीं बन सकी है। ऐसे में अगले पांच वर्षों में आंकड़ों के संग्रह, सत्यापन और राज्यों के बीच समन्वय के लिए एक तुलनीय मानक विकसित करना आवश्यक होगा। इस रणनीति की असली परीक्षा आंकड़ों के संग्रह और प्रकाशन तक सीमित नहीं होगी, बल्कि यह होगी कि वे नीतिगत फैसलों को किस हद तक प्रभावित करते हैं।