आप को किस पर भरोसा
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यों तो दिल्ली की विधानसभा इस देश की सबसे छोटी विधानसभाओं में से एक है। इसकी 70 सीटों के लिए हो रही प्रतिस्पर्धा अब राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक बहस का केंद्र बन गई है, क्योंकि 2011 से दिल्ली भ्रष्टाचार विरोधी जनवादी आंदोलन का गढ़ बनी हुई है। यहीं इंडिया एगेंस्ट करप्शन नामक गैर सरकारी संगठन ने इस आंदोलन का नेतृत्व संभाला। इसी आंदोलन की कोख से आम आदमी पार्टी (आप) का जन्म हुआ। इसके बाद तो राजनीतिक पासा कुछ ऐसा पलटा कि 15 वर्षों से जिस दिल्ली पर कांग्रेस का बोलबाला रहा था, उसकी करारी हार हुई। भले ही पहली बार आम आदमी पार्टी को बहुमत से कम सीटें मिलीं, जिसके कारण अरविंद केजरीवाल ने 49 दिनों में ही इस्तीफा दे दिया था। लेकिन वर्ष 2015 के विधानसभा चुनाव में आप ने भारी बहुमत से जीत दर्ज की। राष्ट्रीय दमखम वाली भाजपा और कांग्रेस, दोनों को करारी शिकस्त मिली, जबकि उससे कुछ ही महीने पहले भारी बहुमत के साथ नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने केंद्र में सरकार बनाई थी।
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केजरीवाल सरकार ने भ्रष्टाचार विरोध के साथ-साथ लोगों के जीवन में महत्वपूर्ण परिवर्तन लाने और पारदर्शी सरकार चलाने का वादा किया था। अब उनकी सरकार के कार्यकाल के पांच वर्ष पूरे हो चुके हैं और आप अपनी उपलब्धियों के बल पर फिर से सत्ता में लौटने का मंसूबा बनाए हुई है। क्या रहेंगे इस चुनाव के मुद्दे और इस छोटे से नगर-राज्य के चुनाव का राष्ट्रीय राजनीति पर कैसा असर पड़ेगा? इन्हीं प्रश्नों के विस्तार में चुनावी चर्चा सिमट जाती है।
जहां तक केजरीवाल की वापसी का सवाल है, इस प्रश्न पर आम चर्चा में लोग उनकी सरकार की उपलब्धियों का जिक्र करते हैं। अनियमित कॉलोनियों में कई तरह की नियमित सुविधाएं उपलब्ध कराना, जिसमें पानी की सुविधा, सीवर लाइन बिछाना, सरकारी स्कूली शिक्षा में सुधार, मोहल्ला क्लिनिक और 200 यूनिट तक की बिजली मुफ्त दिया जाना शामिल है। गौरतलब है कि अनधिकृत कॉलोनियों में वह केवल कागजी पट्टा बांटने का काम नहीं कर रहे। उनकी पार्टी तथा विधायक, कार्यकर्ता इत्यादि निरंतर टैंकर माफिया और भूमाफिया का विरोध करते हैं और गरीब बाशिंदों की पेयजल की समस्याओं को दूर करने की पुरजोर कोशिश करते हैं। जो सरकारी स्कूल अब तक गंदगी का ढेर बने पड़े थे, वहां अच्छे फर्नीचर, कंप्यूटर और स्मार्ट बोर्ड की सुविधा उपलब्ध है। यही नहीं, शिक्षकों को सिंगापुर ले जाकर पठन-पाठन की अच्छी विधियों से अवगत कराया गया है। कहने का तात्पर्य यह कि नागरिक सुविधाओं के मामले में पार्टी ने अच्छी पकड़ बनाई है। कई जगह मतदाता यह भी कहते हैं कि जिन मुद्दों पर एमसीडी के अधिकारियों और चयनित प्रतिनिधियों को कुछ करना चाहिए था, वहां वास्तव में आप ही कुछ कर रही है। कुल मिलाकर यह लगता है कि एमसीडी में भाजपा की नाकामियां मतदाताओं को स्पष्ट दिख रही हैं। जहां तक विधानसभा में भाजपा और कांग्रेस के बीच दूसरे और तीसरे स्थान की प्रतिस्पर्धा का सवाल है, इस बारे में फिलहाल कुछ कहा नहीं जा सकता है। पिछली बार भाजपा मात्र तीन सीटों के साथ दूसरे स्थान पर रही थी, तो कांग्रेस का खाता भी नहीं खुला था। इस बार कांग्रेस कुछ कर भी पाएगी या नहीं, कुछ कहा नहीं जा सकता।
भाजपा के पक्ष में कहा जा सकता है कि लोकसभा चुनाव में सभी सात सांसद भाजपा के ही चुने गए थे। यह विधानसभा चुनाव भी भाजपा राष्ट्रवादी और राष्ट्रीय मुद्दों पर ही लड़ना चाहती है। अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी करना, राम मंदिर, तीन तलाक और अब नागरिकता संशोधन कानून (सीएए)भाजपा की केंद्र सरकार की प्रमुख उपलब्धियां हैं। लेकिन विधानसभा चुनाव के लिहाज से भाजपा की एक कमजोरी यह है कि प्रदेश भाजपा अध्यक्ष मनोज तिवारी बहुत प्रबल दावेदार नहीं माने जाते हैं। जो भाजपा केंद्र का चुनाव प्रधानमंत्री मोदी के चेहरे के आधार पर लड़ती और जीतती रही है, उसके पास दिल्ली में कोई कद्दावर चेहरा नहीं है। मगर भाजपा के पास संसाधनों की कमी नहीं है और मोदी-शाह की जोड़ी कोई कसर बाकी नहीं छोड़ना चाहेगी। आने वाले दिनों में यह आशा की जा रही है कि विभिन्न राज्यों से कई कद्दावर भाजपा नेता दिल्ली चुनाव में अपना दम भरेंगे। महिला मतदाताओं को विशेष रूप से आकर्षित करने के लिए स्मृति ईरानी भी प्रचार में जुड़ेंगी। अब देखना यह है कि इस दमखम के साथ मैदान में उतर कर किस हद तक भाजपा अपनी रणनीति से आम आदमी पार्टी को घेर पाएगी।
उधर कांग्रेस ने भी इस बार मैदान में हारुन युसूफ, अरविंदर सिंह लवली, परवेज हाशमी, ए. के. वालिया जैसे अपने कई पुराने और कद्दावर नेता उतारे हैं, जिनका अपना पुराना जनाधार है। लेकिन सवाल यही है कि क्या दिल्ली की जनता पुराने नेताओं की राजनीतिक लाज बचाने का काम करेगी या अपने मुद्दों को देखेगी!
जहां तक राष्ट्रीय स्तर पर इन चुनावों के नतीजे के असर का सवाल है, इस बारे में कई तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं। हाल में हुए राज्य विधानसभाओं के चुनाव में भाजपा अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाई है। और यह स्पष्ट नहीं है कि राष्ट्रीय मुद्दों को लेकर वह आखिर दिल्ली के नागरिकों को बिजली, पानी, सड़क, स्कूल, अस्पताल जैसी स्थानीय सुविधाएं कैसे मुहैया कराएगी? जिन राष्ट्रवादी मुद्दों के बल पर भाजपा ने लोकसभा चुनाव में जीत हासिल की, वे शायद विधानसभा चुनाव में कारगर नहीं हैं। इसके अलावा, सीएए के मुद्दे पर दिल्ली में काफी धरना-प्रदर्शन हुए हैं। जामिया और जेएनयू में तो हिंसा की वारदात भी हुई है। राजनीतिक दल इन मुद्दों से कतराते नजर आए हैं। मगर राष्ट्रीय परिदृश्य दिल्ली से कहीं ज्यादा विस्तृत है। और ऐसा नहीं लगता है कि दिल्ली में अगर आप जीत भी गई, तो इससे राष्ट्रीय राजनीति में बहुत ज्यादा बदलाव आएगा।
भाजपा ने जदयू से गठबंधन पक्का कर लिया है और बिहार में वह जिन दलों के साथ गठबंधन करके चुनाव लड़ना चाहती है, वे सभी दल दिल्ली चुनाव में भाजपा के साथ हाथ आजमा रहे हैं। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि चुनावी प्रतिस्पर्धा में कैसी बयानबाजी होती है और मतदाता किन मुद्दों को महत्वपूर्ण मानते हैं। फैसला तो अंततः जनता के विवेक और अभिरुचि पर ही निर्भर है।